केंद्र सरकार ने वर्ष 2028 में आयोजित होने वाले COP-33 सम्मेलन
केंद्र सरकार ने वर्ष 2028 में आयोजित होने वाले COP-33 सम्मेलन

केंद्र सरकार ने वर्ष 2028 में आयोजित होने वाले COP-33 सम्मेलन की तैयारी हेतु एक उच्चस्तरीय पैनल का गठन किया है।”

भारत ने वर्ष 2028 में प्रस्तावित 33वें संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP-33) की मेज़बानी के लिए तैयारियाँ आरंभ कर दी हैं। यह कदम भारत के वैश्विक जलवायु नेतृत्व और सतत विकास के प्रति प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है। इस वैश्विक आयोजन की तैयारियों के लिए केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा एक समर्पित COP33 प्रकोष्ठ (Cell) की स्थापना की गई है, जो आयोजन से संबंधित सभी आवश्यक प्रबंधन, समन्वय और रणनीतिक कार्यों का संचालन करेगा।


पृष्ठभूमि: COP क्या है?

कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज़ (COP), संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा कन्वेंशन (UNFCCC) की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था है। इसकी स्थापना 1992 में रियो अर्थ समिट के बाद की गई थी और इसका उद्देश्य वैश्विक जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिए बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करना है। वर्ष 2015 में पेरिस समझौते के लागू होने के बाद COP सम्मेलनों का महत्व और बढ़ गया है, जिसका मुख्य लक्ष्य वैश्विक तापमान वृद्धि को औद्योगीकरण-पूर्व स्तर से 1.5°C तक सीमित करना है।

हर वर्ष आयोजित होने वाले COP सम्मेलन, सदस्य देशों को जलवायु परिवर्तन के खिलाफ अपनी प्रतिबद्धताओं की समीक्षा, नए लक्ष्यों का निर्धारण और संयुक्त कार्यनीतियों के निर्माण का अवसर प्रदान करते हैं।


भारत के लिए COP-33 की मेज़बानी का महत्व

यदि भारत को COP-33 की मेज़बानी सौंपी जाती है, तो यह केवल एक राजनयिक उपलब्धि नहीं होगी, बल्कि यह भारत के लिए एक वैश्विक मंच भी बनेगा, जहाँ वह अपनी जलवायु-प्रयासों, नवीकरणीय ऊर्जा में प्रगति, वनीकरण कार्यक्रमों और सतत विकास पहलों को विश्व समुदाय के समक्ष प्रदर्शित कर सकेगा।

  • भारत के ऊर्जा संक्रमण प्रयास, जैसे सौर ऊर्जा मिशन, हरित हाइड्रोजन योजना, और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, को वैश्विक पहचान मिलेगी।

  • COP-33 के ज़रिए भारत वैश्विक नीतिगत विमर्श को दिशा देने की स्थिति में होगा, विशेषकर विकासशील देशों की जलवायु आवश्यकताओं और चुनौतियों को रेखांकित करने में।


प्रस्तावित COP33 प्रकोष्ठ की संरचना

MoEFCC के अंतर्गत गठित COP33 सेल इस आयोजन की निगरानी और समन्वय के लिए जिम्मेदार रहेगा। यह 11-सदस्यीय सेल संयुक्त सचिव (जलवायु परिवर्तन), विभिन्न निदेशकों और जलवायु सलाहकारों को सम्मिलित करता है। इसका कार्य होगा:

  • आयोजन स्थल का चयन और प्रबंधन

  • अंतरराष्ट्रीय भागीदारों के साथ समन्वय

  • कार्यक्रम की रूपरेखा तय करना

  • नीति दस्तावेजों की तैयारी

  • मीडिया व जनसंपर्क रणनीति तैयार करना


भारत की मेज़बानी दावेदारी को मिला समर्थन

भारत की COP-33 मेज़बानी की दावेदारी को 17वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स देशों का पूर्ण समर्थन प्राप्त हुआ है। संयुक्त राष्ट्र की क्षेत्रीय घूर्णन प्रणाली के अंतर्गत एशिया-प्रशांत क्षेत्र से भारत एक मजबूत उम्मीदवार बनकर उभरा है। यह प्रणाली हर वर्ष COP सम्मेलन की मेज़बानी के लिए विभिन्न क्षेत्रों को प्राथमिकता देती है, जिससे वैश्विक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होता है।


मुख्य उद्देश्य

COP-33 की मेज़बानी का भारत का उद्देश्य केवल एक आयोजन करना नहीं है, बल्कि यह एक रणनीतिक प्रयास है जिससे वैश्विक जलवायु एक्शन को और तेज़ किया जा सके। इसके अंतर्गत:

  • जलवायु प्रतिबद्धताओं की सक्रियता बढ़ाना

  • उत्तरदायित्व और पारदर्शिता को बढ़ावा देना

  • निम्न-कार्बन अर्थव्यवस्थाओं की ओर वैश्विक संक्रमण को गति देना

  • जलवायु वित्त और तकनीक हस्तांतरण पर ध्यान केंद्रित करना


संभावित प्रभाव और अवसर

यदि भारत को COP-33 की मेज़बानी मिलती है, तो इसके बहुआयामी लाभ होंगे:

  • भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा को मजबूती

  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए द्वार खुलेंगे

  • जलवायु अनुकूल निवेश को बढ़ावा मिलेगा

  • स्थानीय स्तर पर हरित रोजगार और तकनीकी विकास को गति

  • भारत के प्रदूषण नियंत्रण, नवीकरणीय ऊर्जा, सतत कृषि, और शहरी विकास मॉडल को वैश्विक पहचान


निष्कर्ष

भारत की COP-33 मेज़बानी की तैयारी केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की मेज़बानी नहीं है, बल्कि यह भारत के जलवायु नेतृत्व को परिभाषित करने का अवसर है। जलवायु परिवर्तन के वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत का दृष्टिकोण, “जलवायु न्याय”, “स्थानीय से वैश्विक समाधान”, और “साझा लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व” की नीति, COP-33 के माध्यम से और अधिक प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत की जा सकती है। इस दिशा में उठाया गया हर कदम, आने वाले समय में भारत को हरित कूटनीति (Green Diplomacy) का प्रमुख केंद्र बना सकता है।

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