भारत और जापान ने अपनी रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए क्रिटिकल मिनरल्स (महत्वपूर्ण खनिजों) पर सहयोग ज्ञापन (MoC) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह समझौता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टोक्यो यात्रा के दौरान आयोजित 15वें भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन में हुआ।
यह पहल स्वच्छ ऊर्जा, उन्नत तकनीकी विकास और संसाधन सुरक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों की गहराती साझेदारी का प्रतीक है। साथ ही यह समझौता वैश्विक ऊर्जा परिवर्तन और आर्थिक लचीलेपन को सुनिश्चित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
क्रिटिकल मिनरल्स क्यों हैं ज़रूरी?
आज की दुनिया में क्रिटिकल मिनरल्स किसी भी अर्थव्यवस्था और तकनीकी ढांचे की रीढ़ बन चुके हैं। इनमें रेयर अर्थ एलिमेंट्स, लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, ग्रेफाइट और टंगस्टन जैसे तत्व शामिल हैं। इनका उपयोग—
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बैटरियों (विशेषकर इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए),
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सेमीकंडक्टर्स,
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सोलर पैनल्स,
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विंड टर्बाइन,
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और उन्नत रक्षा प्रणालियों में किया जाता है।
जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन के लक्ष्यों को पूरा करने की दिशा में दुनिया आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे इन खनिजों की मांग तेजी से बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, 2040 तक लिथियम और कोबाल्ट जैसे खनिजों की मांग आज की तुलना में 4 से 6 गुना अधिक हो सकती है।
भारत और जापान दोनों ही इन खनिजों के मामले में आयात पर अत्यधिक निर्भर हैं। अब तक दुनिया के कुछ ही देश—जैसे चीन, ऑस्ट्रेलिया और कांगो—इन संसाधनों की आपूर्ति करते आए हैं। ऐसे में आपूर्ति पर अत्यधिक निर्भरता रणनीतिक कमजोरी बन सकती है। इसलिए यह साझेदारी दोनों देशों को विविध और टिकाऊ खनिज आपूर्ति श्रृंखला बनाने में मदद करेगी।
भारत-जापान खनिज समझौते की मुख्य विशेषताएँ
इस समझौते के तहत कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग पर सहमति बनी है—
1. रणनीतिक उद्देश्य
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भारत और तृतीय देशों में संयुक्त अन्वेषण और खनन परियोजनाएँ
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नियामक और नीतिगत सूचनाओं का आदान-प्रदान ताकि पारदर्शिता और स्थिरता बनी रहे
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गहरे समुद्र में खनन के लिए टिकाऊ और पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित पद्धतियों का उपयोग
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खनिजों की दीर्घकालिक उपलब्धता हेतु भंडारण और आपूर्ति रणनीतियाँ
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प्रसंस्करण, परिशोधन और तकनीकी हस्तांतरण में सहयोग
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भविष्य में आपसी सहमति से नए सहयोग प्रारूप अपनाने की संभावना
2. वैश्विक मूल्य श्रृंखला में स्थिति
इस समझौते से दोनों देशों को न केवल घरेलू जरूरतों की पूर्ति होगी, बल्कि वे वैश्विक ऊर्जा और तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला में भी एक महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर सकेंगे।
निवेश और नवाचार पर जोर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समझौते को केवल खनिज साझेदारी तक सीमित न बताते हुए इसे साझा आर्थिक दृष्टि का हिस्सा बताया। उन्होंने उल्लेख किया कि जापान अगले दशक में भारत में लगभग 10 ट्रिलियन येन का निवेश करेगा।
इस निवेश का एक बड़ा हिस्सा एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों) तथा स्टार्टअप इकोसिस्टम को मजबूत बनाने पर केंद्रित होगा। उद्देश्य यह है कि नवाचार और प्रौद्योगिकी आधारित विकास को बढ़ावा मिले और भारत को वैश्विक विनिर्माण और ऊर्जा आपूर्ति केंद्र के रूप में स्थापित किया जा सके।
दशक भर की साझेदारी के स्तंभ
प्रधानमंत्री मोदी ने शिखर सम्मेलन के दौरान भारत-जापान संबंधों की व्यापकता को रेखांकित करते हुए बताया कि यह साझेदारी अब आठ स्तंभों पर आधारित है:
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निवेश और नवाचार
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आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा
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पर्यावरणीय स्थिरता
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तकनीकी सहयोग
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स्वास्थ्य सेवा और गतिशीलता साझेदारी
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जन-से-जन संबंध
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राज्य और प्रांत स्तर का सहयोग
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खनिज सहयोग, जो भविष्य की आवश्यकताओं के लिए रणनीतिक महत्व रखता है
खनिज सहयोग का यह नया आयाम न केवल ऊर्जा संक्रमण और आपूर्ति सुरक्षा को सुनिश्चित करेगा, बल्कि भारत और जापान के बीच आपसी विश्वास और रणनीतिक तैयारी को भी और मजबूत करेगा।
सामरिक और वैश्विक महत्व
भारत-जापान का यह कदम सिर्फ द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है। इसका वैश्विक प्रभाव भी महत्वपूर्ण होगा:
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एशिया-प्रशांत क्षेत्र में ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिलेगी।
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चीन पर खनिज निर्भरता को कम करने का ठोस विकल्प सामने आएगा।
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दोनों देश वैश्विक ग्रीन एनर्जी और क्लीन टेक्नोलॉजी आपूर्ति श्रृंखला में अहम भूमिका निभा सकेंगे।
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इससे इंडो-पैसिफिक रणनीति के तहत आर्थिक लचीलापन और आपूर्ति विविधता को बढ़ावा मिलेगा।

