भारत ने अपने महान गायक, कवि और संगीतकार भूपेन हजारिका की 100वीं जयंती के अवसर पर जन्म शताब्दी समारोह का शुभारंभ कर दिया है। उन्हें 2019 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। अपनी सशक्त और आत्मीय आवाज़, सांस्कृतिक एकता और मानवता पर आधारित गीतों के कारण हजारिका आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में जिंदा हैं। यह शताब्दी समारोह उनके संगीत, सिनेमा और समाज के प्रति योगदान को याद करने और उनकी विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
भूपेन हजारिका कौन थे?
भूपेन हजारिका का जन्म 8 सितंबर 1926 को असम के सदिया नगर में हुआ था। वे केवल एक गायक ही नहीं, बल्कि गीतकार, कवि, संगीतकार, फिल्म निर्देशक और समाजसेवी भी थे। उनके गीतों में जीवन की सादगी, आम जनता के संघर्ष और मानवीय मूल्यों की गहरी झलक मिलती है। असम और पूर्वोत्तर भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं को उन्होंने अपने संगीत और सिनेमा के माध्यम से पूरे भारत और दुनिया तक पहुँचाया।
उनका निधन 5 नवंबर 2011 को हुआ, लेकिन उनका संगीत आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके जीवनकाल में था।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
भूपेन हजारिका ने बचपन में ही संगीत की ओर कदम बढ़ा दिया था। उनकी माँ उन्हें असमिया लोकगीत सुनाती थीं, जिससे उनमें संगीत के प्रति गहरी रुचि जगी। मात्र 10 वर्ष की आयु में ही उन्हें सांस्कृतिक दिग्गज ज्योतिप्रसाद अग्रवाला और बिष्णु प्रसाद राभा ने खोज लिया। 12 वर्ष की उम्र में उन्होंने पहला गीत रिकॉर्ड किया और धीरे-धीरे वे अपनी गहरी आवाज़ और भावपूर्ण शब्दों के लिए लोकप्रिय हो गए।
उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद वे उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गए और कोलंबिया विश्वविद्यालय से पीएचडी प्राप्त की। वहीं उनकी मुलाकात अमेरिकी गायक और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता पॉल रोब्सन से हुई। रोब्सन से प्रेरित होकर हजारिका ने संगीत को सामाजिक परिवर्तन और इंसानियत की आवाज़ बनाने का संकल्प लिया।
संगीत और रचनात्मक योगदान
भूपेन हजारिका मुख्य रूप से असमिया भाषा में लिखते और गाते थे, लेकिन उनके गीतों का अनुवाद हिंदी, बंगाली और कई अन्य भाषाओं में हुआ। उन्होंने जीवन की गहरी सच्चाइयों को सरल और आत्मीय शब्दों में ढाला।
उनके कुछ अमर गीत हैं:
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“बिस्तीर्णो पारोरे” – ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे आम जनता के संघर्ष और आशा का गीत।
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“मोई एति जाजाबोर” – एक यात्री के जीवन और अनुभवों की संवेदनशील प्रस्तुति।
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“मनुहे मनुहोर बाबे” – इंसानियत, समानता और भाईचारे का संदेश देने वाला गीत।
उनकी गायकी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश और परिवर्तन की ताकत थी। उनके गीत आज भी सांप्रदायिक सौहार्द और विश्व बंधुत्व की मिसाल माने जाते हैं।
सिनेमा और सांस्कृतिक धरोहर
भूपेन हजारिका ने न सिर्फ संगीत, बल्कि सिनेमा में भी अपना योगदान दिया। उन्होंने असमिया फिल्मों का निर्देशन किया और उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई। हिंदी और बंगाली फिल्मों जैसे ‘रुदाली’ और ‘दमन’ का संगीत आज भी याद किया जाता है।
सिनेमा में उनके योगदान के कारण उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार (1992) से सम्मानित किया गया।
राजनीति और संस्थागत योगदान
सिर्फ संगीत ही नहीं, भूपेन हजारिका ने सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में भी सक्रिय भूमिका निभाई। वे असम विधान सभा के सदस्य रहे और 1998 से 2003 तक संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष पद को संभाला। उनकी सोच हमेशा यह रही कि कला और संस्कृति समाज के विकास का आधार बन सकते हैं।
सम्मान और पुरस्कार
भूपेन हजारिका को उनके असाधारण योगदान के लिए जीवनकाल और मरणोपरांत कई पुरस्कार और सम्मान मिले:
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राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (1975)
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पद्मश्री (1977)
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पद्मभूषण (2001)
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दादा साहेब फाल्के पुरस्कार (1992)
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संगीत नाटक अकादमी फैलोशिप (2008)
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पद्मविभूषण (2012, मरणोपरांत)
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भारत रत्न (2019, मरणोपरांत)
उनकी स्मृति में भूपेन हजारिका सेतु (ढोला-सदिया पुल), डाक टिकट और मूर्तियाँ समर्पित की गईं।
अंतिम समय और विरासत
जीवन के अंतिम वर्षों में वे फिल्मकार कल्पना लाजमी के साथ जुड़े रहे और हिंदी फिल्मों में कई यादगार गीत दिए। 5 नवंबर 2011 को मुंबई में उनका निधन हुआ। उनके अंतिम संस्कार में असम और पूरे देश से लाखों लोग शामिल हुए, जो उनके प्रति जनता के गहरे प्रेम और सम्मान का प्रमाण था।
जन्म शताब्दी समारोह
भूपेन हजारिका की 100वीं जयंती पर भारतभर में विभिन्न सांस्कृतिक और संगीत समारोह आयोजित किए जा रहे हैं। इन आयोजनों का उद्देश्य उनकी रचनात्मकता और विचारों को नई पीढ़ी तक पहुँचाना है। यह केवल उनकी स्मृति का उत्सव नहीं, बल्कि संगीत और संस्कृति के जरिए समाज को जोड़ने के उनके संदेश को आगे बढ़ाने का प्रयास है।

