9 सितम्बर 2025 नेपाल के इतिहास में एक बड़े राजनीतिक संकट की तिथि बन गई। प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया। यह इस्तीफ़ा उस समय आया जब सरकार द्वारा लगाए गए सोशल मीडिया प्रतिबंध के खिलाफ जेनरेशन-ज़ेड (Gen Z) के नेतृत्व में हुए प्रदर्शनों ने उग्र रूप ले लिया।
प्रतिबंध हटाए जाने के बावजूद प्रदर्शन शांत नहीं हुए, बल्कि और हिंसक हो गए। अब तक 20 लोगों की मौत हो चुकी है और 250 से अधिक लोग घायल हो चुके हैं। लगातार बिगड़ते हालातों और सेना की सलाह के बाद ओली ने अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया।
संकट की पृष्ठभूमि: सोशल मीडिया बैन से शुरू हुआ आंदोलन
नेपाल सरकार ने कुछ सप्ताह पहले फेसबुक, एक्स (ट्विटर) और यूट्यूब जैसे प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध लगा दिया था। सरकार का तर्क था कि ये कंपनियाँ स्थानीय प्राधिकरणों के साथ पंजीकृत नहीं हैं और उन्होंने देश के इंटरनेट नियमों का पालन नहीं किया।
हालांकि, इस फैसले ने युवाओं में गहरा आक्रोश पैदा किया। जेनरेशन-ज़ेड, जो शिक्षा, रोजगार, संवाद और सामाजिक सक्रियता के लिए डिजिटल माध्यम पर निर्भर है, ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला माना।
प्रतिबंध हटाने के बाद भी गुस्सा कम नहीं हुआ। लोग केवल डिजिटल एक्सेस की बहाली ही नहीं, बल्कि सरकार के इस्तीफ़े की मांग पर अड़ गए।
विरोध और बढ़ती मांगें
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प्रदर्शन की शुरुआत काठमांडू से हुई और जल्द ही पूरे देश में फैल गई।
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युवाओं और छात्रों ने सोशल मीडिया एक्सेस को लोकतांत्रिक अधिकार बताया और कहा कि सरकार की नीतियाँ जनता की स्वतंत्रता का दमन कर रही हैं।
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भीड़ ने प्रधानमंत्री ओली के इस्तीफ़े और सरकार को बर्खास्त करने की मांग की।
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प्रतिबंध हटाने के बावजूद, प्रदर्शन और हिंसक होते गए।
इस्तीफ़े तक का घटनाक्रम
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8 सितम्बर 2025: प्रदर्शन हिंसक हो गए। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पों में 20 लोगों की मौत और 250 से अधिक घायल हुए।
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9 सितम्बर 2025: प्रधानमंत्री ओली ने शांति की अपील की और स्थिति संभालने के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाने की घोषणा की।
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इसी बीच नेपाल सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिग्देल ने ओली से मुलाकात की और साफ़ कहा कि “राजनीतिक समाधान के बिना सैन्य कार्रवाई संभव नहीं।” उन्होंने व्यवस्था बहाल करने के लिए प्रधानमंत्री से इस्तीफ़ा देने की सलाह दी।
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उसी शाम ओली ने पद छोड़ दिया और कहा कि वे “राजनीतिक समाधान को आसान बनाने” के लिए हट रहे हैं।
हिंसा का चरम
इस्तीफ़े से पहले और बाद में नेपाल में हिंसा और अराजकता का माहौल रहा।
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सरकारी दफ़्तर खाली कराए गए: सुरक्षा कारणों से मंत्रियों और अधिकारियों को भैसेपाटी आवासीय परिसर से हेलिकॉप्टर के जरिए त्रिभुवन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे ले जाया गया।
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हवाई अड्डा बंद: प्रदर्शनकारियों द्वारा ड्रोन, पटाखों और लेज़र लाइट से हमले की धमकियों के चलते सभी उड़ानें रद्द कर दी गईं।
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संसद भवन में आगजनी: गुस्साई भीड़ ने नेपाल की संसद को आग के हवाले कर दिया।
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शीर्ष नेताओं के घरों पर हमले: प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और कई अन्य वरिष्ठ नेताओं के घरों में तोड़फोड़ की गई।
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सिंहदरबार पर हमला: नेपाल के महत्वपूर्ण मंत्रालयों और आवासीय दफ़्तरों पर भीड़ ने धावा बोला।
संभावित परिणाम और राजनीतिक अनिश्चितता
ओली के इस्तीफ़े के बाद नेपाल गहरे राजनीतिक संकट में फंस गया है।
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संभावित शरण: सूत्रों का कहना है कि ओली दुबई में शरण ले सकते हैं, ताकि बढ़ते गुस्से और संभावित कानूनी कार्रवाई से बच सकें।
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राजनीतिक अस्थिरता: नेपाल में सत्ता का शून्य बन गया है। संसद और प्रमुख संस्थान हिंसा की चपेट में आ चुके हैं, जिससे नए नेतृत्व का गठन कठिन हो सकता है।
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सेना की भूमिका: नेपाल सेना फिलहाल एकमात्र संगठित शक्ति है जो व्यवस्था को स्थिर कर सकती है। लेकिन सेना प्रमुख ने स्पष्ट कर दिया है कि वे सीधे सत्ता संभालने की बजाय राजनीतिक समाधान का समर्थन करेंगे।
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युवाओं की भूमिका: यह आंदोलन दर्शाता है कि नेपाल की नई पीढ़ी अब राजनीतिक बदलाव की मुख्य धुरी बन चुकी है। उनके बिना किसी भी राजनीतिक समझौते की कल्पना मुश्किल है।
व्यापक असर
नेपाल का यह संकट केवल आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव भी हो सकते हैं।
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दक्षिण एशिया में नेपाल की स्थिति पहले से ही नाजुक रही है। इस संकट से भारत और चीन जैसे पड़ोसी देशों की कूटनीतिक रणनीतियाँ प्रभावित हो सकती हैं।
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वैश्विक स्तर पर यह संदेश गया है कि डिजिटल अधिकार और स्वतंत्रता अब किसी भी लोकतांत्रिक समाज के केंद्र में हैं।
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अंतरराष्ट्रीय समुदाय नेपाल की स्थिति पर करीबी नजर रख रहा है और हिंसा को रोकने के लिए संयम बरतने की अपील कर रहा है।

