भारत में संवैधानिक पदों की नियुक्तियाँ न केवल एक प्रशासनिक आवश्यकता होती हैं, बल्कि वे देश के राजनीतिक ताने-बाने और संघीय ढांचे की स्थिरता का भी प्रतिबिंब होती हैं। इसी क्रम में 15 सितंबर 2025 को एक महत्वपूर्ण घटना तब घटी जब गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने महाराष्ट्र के राज्यपाल के रूप में अतिरिक्त प्रभार ग्रहण करते हुए शपथ ली।
यह शपथग्रहण समारोह मुंबई स्थित राजभवन में आयोजित हुआ, जहां बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर ने उन्हें पद की शपथ दिलाई। इस अवसर पर राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, न्यायपालिका के प्रतिनिधि, और रक्षा बलों के अधिकारी भी उपस्थित रहे।
आचार्य देवव्रत: शिक्षाविद से राज्यपाल तक
आचार्य देवव्रत का नाम भारतीय शैक्षिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक जगत में एक विशेष स्थान रखता है। वे मूलतः एक शिक्षाविद हैं, जो हरियाणा के कुरुक्षेत्र स्थित गुरुकुल में संस्कृत और वैदिक शिक्षा के प्रचार-प्रसार में सक्रिय रहे हैं। वे प्राकृतिक खेती, योग और आयुर्वेद के प्रबल समर्थक रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की “आत्मनिर्भर कृषि” नीति के भी समर्थक माने जाते हैं।
उनका प्रशासनिक सफर वर्ष 2015 में शुरू हुआ, जब उन्हें हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त किया गया। इसके बाद 2019 में वे गुजरात के राज्यपाल बनाए गए और तब से इस पद पर कार्यरत हैं।
अब उन्हें महाराष्ट्र के राज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है — एक ऐसा राज्य जो देश की आर्थिक राजधानी है और राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र भी।
यह बदलाव क्यों आवश्यक था?
यह नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल सी. पी. राधाकृष्णन को भारत का 15वां उपराष्ट्रपति चुना गया है। उनके पद छोड़ने के बाद महाराष्ट्र में राज्यपाल का पद अस्थायी रूप से रिक्त हो गया था। संवैधानिक रूप से राज्य में राज्यपाल का होना अनिवार्य है, विशेषकर ऐसे समय में जब विधानमंडल की गतिविधियाँ या कोई राजनीतिक अस्थिरता मौजूद हो।
ऐसे में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 153 के अंतर्गत गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत को महाराष्ट्र का अतिरिक्त प्रभार सौंपा।
अनुच्छेद 153: संवैधानिक आधार
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 153 स्पष्ट करता है कि “प्रत्येक राज्य का एक राज्यपाल होगा,” लेकिन इसमें यह भी प्रावधान है कि “एक ही व्यक्ति दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल हो सकता है।”
यह प्रावधान भारत की संघीय व्यवस्था में लचीलापन प्रदान करता है और संविधान की व्यावहारिकता को बनाए रखता है। बीते वर्षों में कई बार इसका उपयोग हुआ है — उदाहरण के लिए:
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तमिलनाडु और पुडुचेरी में एक ही राज्यपाल रहे हैं।
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मणिपुर और मिजोरम जैसे उत्तर-पूर्वी राज्यों में भी एक व्यक्ति ने दो राज्यों की जिम्मेदारी संभाली है।
राजनीतिक और प्रशासनिक महत्व
महाराष्ट्र जैसे राज्य का राज्यपाल केवल एक औपचारिक संवैधानिक पद नहीं है, बल्कि वहां की राजनीतिक स्थिति, विधानमंडल का कामकाज, और केंद्र-राज्य संबंध — इन सभी में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
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महाराष्ट्र में अक्सर राजनीतिक अस्थिरता और दल-बदल जैसे मुद्दे चर्चा में रहते हैं। ऐसे में राज्यपाल की भूमिका निष्पक्ष और संवैधानिक दिशा में बेहद अहम हो जाती है।
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इसके अलावा, राज्यपाल राज्य में विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी होते हैं और शिक्षा नीति के क्रियान्वयन में अहम भूमिका निभाते हैं, जो आचार्य देवव्रत जैसे शिक्षाविद् के लिए उपयुक्त क्षेत्र है।
शपथ संस्कृत में: सांस्कृतिक प्रतीकवाद
शपथ ग्रहण समारोह में एक और विशेष बात यह रही कि आचार्य देवव्रत ने संस्कृत भाषा में शपथ ली। यह न केवल उनकी वैदिक पृष्ठभूमि को दर्शाता है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक विविधता और पारंपरिक भाषाओं के प्रति सम्मान का भी प्रतीक है।
मुख्य बिंदु (संक्षेप में)
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| शपथ तिथि | 15 सितंबर 2025 |
| स्थान | मुंबई राजभवन |
| शपथ दिलाने वाले | बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर |
| नया पद | महाराष्ट्र के राज्यपाल (अतिरिक्त प्रभार) |
| पूर्व राज्यपाल | सी. पी. राधाकृष्णन (अब भारत के उपराष्ट्रपति) |
| संवैधानिक प्रावधान | अनुच्छेद 153 |
| वर्तमान जिम्मेदारियाँ | गुजरात और महाराष्ट्र दोनों के राज्यपाल |

