महाराष्ट्र ने 14 सितम्बर 2025 को एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक क्षण का साक्षी बना, जब पिंपरी-चिंचवड़ के मोशी-बोरहादेवाड़ी क्षेत्र में धर्मवीर छत्रपति संभाजी महाराज की 180 फुट ऊँची कांस्य प्रतिमा — ‘हिंदूभूषण प्रतिमा’ — का सम्मान अब तक के सबसे विशाल ढोल-ताशा समारोह के साथ किया गया। यह आयोजन न केवल मराठा वीरता और बलिदान को श्रद्धांजलि था, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता को जन-जन तक पहुँचाने का एक जनांदोलन भी बन गया।
स्मारक का परिचय : हिंदूभूषण प्रतिमा
‘हिंदूभूषण प्रतिमा’ का निर्माण पुणे महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण (पीएमआरडीए) के अंतर्गत मोशी-बोरहादेवाड़ी में किया गया है। यह प्रतिमा धर्मवीर छत्रपति संभाजी महाराज के गौरवमयी जीवन और बलिदान को अमर करने के लिए स्थापित की जा रही है।
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कुल ऊँचाई : 180 फुट (140 फुट प्रतिमा + 40 फुट आधार)
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विशिष्टता : यह संभाजी महाराज की विश्व की सबसे ऊँची पूर्णाकृति प्रतिमा है।
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परिसर का नाम : शंभू सृष्टि स्मारक परिसर
इस स्मारक परिसर में केवल एक प्रतिमा ही नहीं, बल्कि मराठा इतिहास की जीवंत प्रस्तुति के लिए कई और विशेषताएँ जोड़ी गई हैं। इनमें शामिल हैं :
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10 फुट की हम्बीरराव मोहिते की प्रतिमा
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16 मराठा सरदारों और मावलों की प्रतिमाएँ
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मराठा इतिहास के दृश्यों को दर्शाती कांस्य भित्तिचित्र श्रृंखला
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सांस्कृतिक कार्यक्रमों हेतु मुक्त आकाश रंगमंच
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संभाजी महाराज के जीवन की कथा प्रस्तुत करने वाला आधुनिक होलोग्राफिक सभागार
इस परियोजना की परिकल्पना विधायक महेश लांडगे ने की थी, और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के मार्गदर्शन में इसे मूर्त रूप दिया जा रहा है। यह स्मारक केवल स्थापत्य नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना का केंद्र बनने जा रहा है।
महाराष्ट्र की सबसे बड़ी ढोल-ताशा सलामी
14 सितम्बर 2025 का दिन इतिहास में इसलिए दर्ज हो गया क्योंकि इस दिन पिंपरी-चिंचवड़ ने अब तक का सबसे भव्य ढोल-ताशा समारोह देखा।
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स्थान : धर्मवीर छत्रपति संभाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय औद्योगिक प्रदर्शनी केंद्र, मोशी
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भागीदारी : 3,000 से अधिक ढोल, 1,000 ताशे और सैकड़ों भगवे ध्वज
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आयोजनकर्ता : हिंदूभूषण स्मारक ट्रस्ट एवं ढोल-ताशा फेडरेशन
गगनभेदी तालों और भगवे ध्वजों की लहराती छटा ने वातावरण को अद्वितीय बना दिया। यह कार्यक्रम न केवल एक सांस्कृतिक आयोजन था, बल्कि संभाजी महाराज की गौरवमयी विरासत को संगीत और परंपरा के माध्यम से श्रद्धांजलि देने का अनुपम प्रयास भी था।
मुख्य उद्देश्य
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भगवे ध्वज का सम्मान – जो मराठा पराक्रम और आत्मसम्मान का प्रतीक है।
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संभाजी महाराज को संगीतमय श्रद्धांजलि – उनके बलिदान और शौर्य का स्मरण।
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सांस्कृतिक पहचान को सुदृढ़ करना – परंपरागत ढोल-ताशा कला के माध्यम से युवाओं को विरासत से जोड़ना।
यह आयोजन महाराष्ट्र का अब तक का सबसे बड़ा ढोल-ताशा कार्यक्रम माना गया, जिसने सांस्कृतिक अस्मिता को एकजुट कर जनांदोलन का स्वरूप दिया।
आगामी विशेषता : शस्त्र पूजन
यह भव्य आयोजन केवल एक दिन तक सीमित नहीं है। स्मारक परिसर में आगामी 2 अक्टूबर 2025 को प्रतिमा की तलवार का शस्त्र पूजन किया जाएगा। यह पारंपरिक अनुष्ठान मराठा सैन्य परंपरा की निरंतरता और आधुनिक युग में भी प्राचीन रीति-रिवाजों की जीवंतता का प्रतीक होगा।
धर्मवीर छत्रपति संभाजी महाराज : बलिदान और शौर्य की गाथा
संभाजी महाराज, छत्रपति शिवाजी महाराज के ज्येष्ठ पुत्र थे। उन्हें ‘धर्मवीर’ की उपाधि इसलिए दी गई क्योंकि उन्होंने मुग़ल साम्राज्य के दमनकारी प्रयासों के विरुद्ध हिंदू धर्म और स्वराज्य की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया।
उनकी वीरता, साहस और धर्मनिष्ठा मराठा साम्राज्य की शक्ति और आत्मसम्मान का प्रतीक है। ‘हिंदूभूषण प्रतिमा’ इसी गौरवशाली परंपरा को मूर्त रूप देती है और भावी पीढ़ियों को स्मरण कराती है कि स्वराज्य और स्वतंत्रता की राह बलिदान और संघर्ष से होकर गुजरती है।
सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व
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सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक : यह प्रतिमा और उससे जुड़े आयोजन महाराष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना को नई ऊँचाई देते हैं।
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परंपरा और आधुनिकता का संगम : ढोल-ताशा जैसे पारंपरिक संगीत को आधुनिक आयोजन शैली के साथ प्रस्तुत करना युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम बनता है।
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पर्यटन और पहचान : यह स्मारक आने वाले समय में न केवल महाराष्ट्र बल्कि पूरे देश के लिए पर्यटन और गौरव का केंद्र बनेगा।

