भारत ने अपने स्वच्छ ऊर्जा पोर्टफोलियो को और मजबूत करने के लिए 2025 में राष्ट्रीय भू-ऊर्जा नीति (National Geothermal Energy Policy) की शुरुआत की है। यह भारत की पहली नीति है, जो विशेष रूप से पृथ्वी की आंतरिक ऊष्मा से प्राप्त ऊर्जा, यानी भू-ऊर्जा (Geothermal Energy), के व्यापक और सतत उपयोग को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई है।
इस पहल को नेट जीरो उत्सर्जन लक्ष्य, ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा नवाचार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह नीति न केवल पर्यावरण संरक्षण को सशक्त बनाएगी, बल्कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में रोजगार, तकनीकी नवाचार और ऊर्जा निरंतरता को भी बढ़ावा देगी। प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से यह विषय ऊर्जा नीति, जलवायु लक्ष्य, पर्यावरण और सरकारी पहल के खंडों में अत्यंत प्रासंगिक है।
भू-ऊर्जा (Geothermal Energy) क्या है?
भू-ऊर्जा वह ऊष्मा है जो पृथ्वी की सतह के नीचे संग्रहित रहती है। यह ऊर्जा प्राकृतिक रूप से मिट्टी, चट्टानों और भू-गर्भीय तरल पदार्थों में संग्रहीत होती है।
भू-ऊर्जा के उपयोग
भू-ऊर्जा का उपयोग कई क्षेत्रों में किया जा सकता है:
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बिजली उत्पादन – तापीय ऊर्जा को टर्बाइन और जेनरेटर के माध्यम से बिजली में परिवर्तित किया जा सकता है।
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हीटिंग और कूलिंग सिस्टम – भवनों में ऊर्जा-कुशल तापमान नियंत्रण।
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ग्रीनहाउस कृषि – किसानों के लिए नियंत्रित जलवायु में फसलों की बेहतर पैदावार।
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समुद्री जल लवण-निर्मूलन (Desalination) – पानी की कमी वाले क्षेत्रों में मीठे पानी की आपूर्ति।
विशेष लाभ:
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24×7 उपलब्ध, यानी निरंतर और भरोसेमंद ऊर्जा।
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सौर और पवन ऊर्जा की तरह मौसम पर निर्भर नहीं।
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स्वच्छ और पर्यावरण अनुकूल, CO₂ उत्सर्जन न्यूनतम।
राष्ट्रीय भू-ऊर्जा नीति की मुख्य विशेषताएँ
यह नीति विभिन्न प्रयासों को एकीकृत करने, अनुसंधान एवं विकास (R&D) को प्रोत्साहित करने और सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से बनाई गई है।
प्रमुख प्रावधान
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नियामक और विकासात्मक भूमिका
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नव और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) केंद्रीय निकाय के रूप में नीति का संचालन करेगा।
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नीति के तहत भू-ऊर्जा परियोजनाओं के लिए मानक और मार्गदर्शन तय किया जाएगा।
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सहयोग और वैश्विक साझेदारी
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अंतःमंत्रालयी समन्वय और संयुक्त उद्यम।
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अंतरराष्ट्रीय तकनीकी विशेषज्ञों और संस्थानों के साथ सहयोग।
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प्रौद्योगिकी और नवाचार
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हाइब्रिड सिस्टम जैसे भू-ऊर्जा + सौर ऊर्जा का विकास।
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छोड़े गए तेल और गैस कुओं का पुनः उपयोग करके भू-ऊर्जा निष्कर्षण।
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स्वदेशी तकनीकों और पायलट प्रोजेक्ट्स के लिए प्रोत्साहन।
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पब्लिक-प्राइवेट इकोसिस्टम
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स्टार्टअप्स, उद्योग और शोध संस्थानों को जोड़ने वाला मजबूत ढांचा।
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निवेशकों को परियोजनाओं में भागीदारी के लिए प्रोत्साहन।
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स्थानीय नवाचार और शिक्षा
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अकादमिक और उद्योग संबंध।
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तकनीकी प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण।
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ग्रामीण युवाओं और स्थानीय कारीगरों के लिए रोजगार अवसर।
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भारत में पहचाने गए भू-ऊर्जा प्रांत
भारत ने लगभग 10 भू-ऊर्जा प्रांतों की पहचान की है, जिनमें ऊष्मीय क्षमता अधिक है।
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हिमालय क्षेत्र – उच्च तापमान और भू-गर्भीय गतिविधि।
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कंबे बेसिन – राजस्थान और गुजरात के भूगर्भीय संरचनाएँ।
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अरावली श्रृंखला – राजस्थान के कई भागों में उपलब्ध संसाधन।
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महानदी बेसिन – छत्तीसगढ़ और ओडिशा।
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गोदावरी बेसिन – तेलंगाना और आंध्र प्रदेश।
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अन्य क्षेत्र – सोहाना, पश्चिमी तट, सोन-नर्मदा-ताप्ती क्षेत्र और दक्षिण भारत के क्रैटॉन।
अनुमानित क्षमता: लगभग 10 गीगावाट (GW) ऊर्जा उत्पादन।
नीति का महत्व
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ऊर्जा सुरक्षा और स्वदेशी उत्पादन
भारत की ऊर्जा मांग लगातार बढ़ रही है। भू-ऊर्जा से स्थानीय और निरंतर ऊर्जा उपलब्ध होगी। -
नेट जीरो उत्सर्जन लक्ष्य में योगदान
स्वच्छ और कार्बन-न्यून ऊर्जा उत्पादन। -
रural और आर्थिक विकास
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ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में रोजगार।
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स्थानीय उद्योग और ग्रीन टेक्नोलॉजी का विकास।
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तकनीकी नवाचार
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भारतीय तकनीकी क्षमता का विकास।
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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को भू-ऊर्जा क्षेत्र में अग्रणी राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करना।
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भविष्य की दिशा
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अगले 5 वर्षों में भूतापीय ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना।
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पायलट प्रोजेक्ट्स और भूतापीय ऊर्जा पार्कों का निर्माण।
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स्टार्टअप्स और शोध संस्थानों के साथ सहयोग और नवाचार को प्रोत्साहित करना।
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ग्रामीण और सीमांत क्षेत्रों में स्थानीय ऊर्जा वितरण और रोजगार।
स्थैतिक तथ्य
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नीति का नाम: राष्ट्रीय भू-ऊर्जा नीति (National Geothermal Energy Policy)
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लॉन्च करने वाला: नव और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE)
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नीति का लक्ष्य: विभिन्न क्षेत्रों में भू-ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देना
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अनुमानित क्षमता: 10 गीगावाट (GW)
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पहचाने गए प्रांत: हिमालय, कंबे, अरावली, महानदी, गोदावरी आदि

