थर्मल पावर में उबाल: निजी क्षेत्र लगाएगा ₹77,000 करोड़ का निवेश
थर्मल पावर में उबाल: निजी क्षेत्र लगाएगा ₹77,000 करोड़ का निवेश

थर्मल पावर में उबाल: निजी क्षेत्र लगाएगा ₹77,000 करोड़ का निवेश – क्रिसिल रिपोर्ट

भारत के ऊर्जा क्षेत्र में एक बड़ा मोड़ सामने आया है। क्रिसिल रेटिंग्स की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 से 2028 के बीच निजी क्षेत्र की कंपनियाँ थर्मल पावर में ₹77,000 करोड़ का निवेश करेंगी। यह निवेश न केवल देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाएगा, बल्कि निजी क्षेत्र की थर्मल ऊर्जा में दोबारा सक्रिय भागीदारी की भी पुष्टि करता है।

 क्यों है यह निवेश अहम?

भारत की बिजली की मांग तेजी से बढ़ रही है, खासकर औद्योगिकीकरण, डिजिटल विस्तार और गर्मी के मौसम में पीक लोड के चलते। रिपोर्ट बताती है कि आगामी वर्षों में कुल बिजली मांग 366 गीगावॉट (GW) तक पहुँच सकती है। ऐसे में, सौर और पवन जैसे नवीकरणीय स्रोत इस माँग का एक बड़ा हिस्सा तो पूरा करेंगे, लेकिन बेस लोड और 24×7 आपूर्ति के लिए थर्मल पावर आज भी सबसे भरोसेमंद विकल्प बना हुआ है।

 निजी क्षेत्र की वापसी: निवेश में जबरदस्त उछाल

  • क्रिसिल की रिपोर्ट के मुताबिक, थर्मल पावर सेक्टर में कुल अनुमानित निवेश ₹2.3 लाख करोड़ तक पहुँच सकता है।

  • अब तक निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी सिर्फ 7–8% रही है, लेकिन 2026–28 के बीच यह बढ़कर 33% (एक-तिहाई) तक पहुँच जाएगी।

  • अदानी पावर, टाटा पावर, JSW एनर्जी और वेदांता पावर जैसी बड़ी कंपनियाँ इस विस्तार में प्रमुख भूमिका निभा रही हैं।

 ब्राउनफील्ड मॉडल: तेज़ी से कार्यान्वयन की रणनीति

निजी कंपनियाँ ब्राउनफील्ड परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। इसका मतलब है कि नई क्षमता मौजूदा संयंत्रों के विस्तार के रूप में जोड़ी जाएगी। इससे लाभ होंगे:

  • भूमि अधिग्रहण जैसी समस्याओं से बचाव

  • तेज़ अनुमति और पर्यावरणीय मंजूरी

  • मौजूदा कोयला स्रोतों और ट्रांसमिशन लिंक का उपयोग

 निजी निवेश में तेजी के पीछे कारण

1. दीर्घकालिक पावर खरीद समझौते (PPAs)

  • बीते 10 वर्षों में पहली बार, चार राज्य वितरण कंपनियों (Discoms) ने निजी कंपनियों के साथ 25 साल के दीर्घकालिक PPA पर हस्ताक्षर किए हैं।

  • इससे निजी कंपनियों को स्थिर राजस्व मिलता है और वित्तीय जोखिम घटता है

2. ऊर्जा मांग का उछाल

  • बिजली की खपत में हर साल तेज़ी से वृद्धि हो रही है।

  • नवीकरणीय ऊर्जा की इंटरमिटेंसी (अनियमितता) के कारण बेस लोड के लिए थर्मल प्लांट जरूरी हैं।

  • केंद्र सरकार ने 2032 तक 80 GW नई कोयला आधारित क्षमता जोड़ने की योजना बनाई है, जिसमें से 60 GW की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।

 प्रमुख कंपनियों की योजनाएँ

वेदांता पावर

  • डिमर्जर योजना के तहत वेदांता पावर को स्वतंत्र इकाई बनाया जा रहा है।

  • कंपनी का लक्ष्य 15 GW नई क्षमता जोड़ना है, जिसमें अधिकांश परियोजनाएँ ब्राउनफील्ड होंगी।

 पुनर्जीवित परियोजनाएँ:

  1. 1,200 MW – छत्तीसगढ़ (पूर्व एथेना प्रोजेक्ट)

  2. 1,000 MW – मीनाक्षी प्लांट

    • दोनों संयंत्रों कोयला खदानों के निकट स्थित हैं, जिससे ईंधन आपूर्ति सुगम है।

अन्य कंपनियाँ:

  • अदानी पावर, टाटा पावर, JSW एनर्जी भी बड़ी परियोजनाओं की तैयारी कर रही हैं।

 वित्तीय मॉडल और लाभ

  • आगामी परियोजनाएँ ₹5.5–₹5.8 प्रति यूनिट की टैरिफ संरचना पर संचालित होंगी।

  • दो-भागीय टैरिफ प्रणाली लागू होगी:

    • 60% हिस्सा फिक्स्ड चार्ज (Fixed Charge) के रूप में होगा – यह कंपनियों को न्यूनतम गारंटी रिटर्न देता है।

    • शेष लागत आधारित दरों पर होगा।

  • अनुमानित आंतरिक प्रतिफल (IRR) लगभग 15% रहेगा — जिससे निवेश आकर्षक और व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य बनता है।

आगे की राह

यह निवेश मॉडल देश की ऊर्जा सुरक्षा को मज़बूती देता है और नवीकरणीय एवं पारंपरिक स्रोतों के बीच संतुलन स्थापित करता है। हालांकि, पर्यावरणीय स्वीकृति, कोयले की आपूर्ति, और राजनीतिक सहमति जैसे पहलुओं को लेकर कुछ चुनौतियाँ बनी हुई हैं।

लेकिन यदि ये परियोजनाएँ समय पर पूर्ण होती हैं, तो:

  • बिजली कटौती में कमी आएगी

  • औद्योगिक उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा

  • और ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में भारत को मजबूती मिलेगी।


 निष्कर्ष:
भारत का थर्मल पावर सेक्टर एक नई ऊर्जा के साथ पुनरुद्धार की ओर बढ़ रहा है। ₹77,000 करोड़ का यह निजी निवेश दर्शाता है कि थर्मल पावर अभी खत्म नहीं हुआ, बल्कि यह आने वाले दशक में ऊर्जा संतुलन बनाए रखने के लिए एक मजबूत आधार बनने जा रहा है।

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