भारत में बैंकिंग तरलता घाटा बढ़कर ₹87,183 करोड़ हुआ
भारत में बैंकिंग तरलता घाटा बढ़कर ₹87,183 करोड़ हुआ

भारत में बैंकिंग तरलता घाटा बढ़कर ₹87,183 करोड़ हुआ

भारतीय बैंकिंग प्रणाली की तरलता स्थिति में सितंबर 2025 के अंत में अचानक और तेज गिरावट दर्ज की गई है। 23 सितंबर 2025 को बैंकिंग तरलता घाटा ₹87,183 करोड़ तक पहुँच गया, जबकि इसके ठीक एक दिन पहले, यानी 22 सितंबर, यह केवल ₹31,987 करोड़ था। मार्च 2025 के अंत से बैंकिंग प्रणाली लगातार अधिशेष में थी, लेकिन हाल के अग्रिम कर (Advance Tax) और वस्तु एवं सेवा कर (GST) भुगतान ने बड़ी राशि बैंकों से बाहर खींच ली, जिससे अल्पकालिक निधियों की उपलब्धता प्रभावित हुई।

यह तेजी से बढ़ा तरलता घाटा वित्तीय बाजारों में अल्पकालिक दबाव और उधारी लागत में संभावित वृद्धि का संकेत है।


तरलता घाटे के कारण

विश्लेषकों के अनुसार, बैंकिंग प्रणाली में अचानक तरलता की कमी के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  1. अग्रिम कर भुगतान: कंपनियों ने तिमाही कर भुगतान किए, जिससे बैंकों में जमा घट गए और अल्पकालिक निधियों की उपलब्धता कम हुई।

  2. GST भुगतान: व्यवसायों ने सरकार को बड़े पैमाने पर वस्तु एवं सेवा कर का भुगतान किया, जिससे तरलता और सीमित हो गई।

  3. मौसमी नकदी मांग: त्योहारों के मौसम और सरकारी व्यय चक्र के कारण नकदी की मांग बढ़ गई।

  4. सरकारी व्यय और वित्तीय योजनाएँ: राज्यों और केंद्र सरकार के व्यय और वित्तीय कार्यक्रमों के कारण बैंकिंग प्रणाली से नकदी बाहर गई।

इन कारकों का संयोजन बैंकिंग प्रणाली में संक्षिप्त तरलता दबाव का प्रमुख कारण बना।


RBI की त्वरित कार्रवाई

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने इस अस्थायी तरलता संकट को देखते हुए तुरंत ओवरनाइट वेरिएबल रेट रेपो (VRR) नीलामी आयोजित की।

  • 24 सितंबर 2025 को आयोजित VRR नीलामी में कुल ₹1.50 लाख करोड़ की तरलता प्रणाली में डाली गई।

  • बैंकों ने इस नीलामी में ₹48,980 करोड़ की बोली लगाई, जिसे औसत दर 5.51% पर पूरी तरह स्वीकार किया गया।

  • RBI ने संकेत दिया कि 25 सितंबर 2025 को एक और VRR नीलामी आयोजित की जाएगी, जिसमें ₹1.25 लाख करोड़ की तरलता प्रणाली में डाली जाएगी।

इन उपायों का उद्देश्य अल्पकालिक तरलता संतुलन बनाए रखना और वित्तीय प्रणाली को स्थिर रखना है।


वित्तीय प्रणाली पर प्रभाव

तरलता घाटे का सीधा असर बैंकिंग संचालन और वित्तीय बाजारों पर पड़ता है:

  1. अल्पकालिक उधारी लागत में वृद्धि: बैंकिंग प्रणाली में तरलता कम होने पर बैंकों को उधारी की लागत बढ़ानी पड़ सकती है।

  2. ब्याज दरों में संभावित बढ़ोतरी: बैंक अधिक जमा आकर्षित करने के लिए उच्च ब्याज दरें दे सकते हैं।

  3. ऋण वितरण पर असर: अल्पकालिक तरलता संकट के कारण बैंक ऋण वितरण को अस्थायी रूप से कम कर सकते हैं।

  4. वित्तीय बाजारों में अस्थिरता: निवेशकों के लिए अल्पकालिक बॉन्ड और प्रतिभूतियों के रिटर्न प्रभावित हो सकते हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह संकट अस्थायी है क्योंकि यह मुख्य रूप से कर भुगतान कैलेंडर और मौसमी नकदी मांग से जुड़ा हुआ है।


RBI और ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO)

RBI इस अस्थायी तरलता संकट का सामना करने के लिए ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) और VRR नीलामी जारी रखेगा।

  • OMO: RBI प्रतिभूतियों को खरीदकर या बेचकर बैंकिंग प्रणाली में नकदी की उपलब्धता नियंत्रित करता है।

  • VRR नीलामी: बैंकों को अल्पकालिक उधार प्रदान करने के लिए सस्ती दर पर तरलता उपलब्ध कराना।

इन उपायों से बैंकिंग प्रणाली को अल्पकालिक स्थिरता प्राप्त होगी और वित्तीय बाजार में अनिश्चितता को कम किया जा सकेगा।


विशेषज्ञों की राय

वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि इस वृद्धि को सामयिक और अस्थायी माना जाना चाहिए।

  • मुख्य कारण Advance Tax और GST भुगतान हैं, जो कुछ दिनों में बैंकिंग प्रणाली में फिर से तरलता लौटाएंगे।

  • RBI की VRR नीलामियों और OMO संचालन से बैंकिंग प्रणाली जल्दी संतुलन में लौट जाएगी

  • लंबे समय में, यह तरलता घाटा बैंकिंग प्रणाली की मजबूती या स्थायित्व को प्रभावित नहीं करेगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना बैंकिंग प्रणाली की संवेदनशीलता और तत्परता का भी परीक्षण है।


मुख्य तथ्य (Static Facts)

  • तरलता घाटा (23 सितंबर 2025): ₹87,183 करोड़

  • तरलता घाटा (22 सितंबर 2025): ₹31,987 करोड़

  • मुख्य कारण: अग्रिम कर और GST भुगतान

  • RBI की कार्रवाई: ₹1.50 लाख करोड़ VRR नीलामी (24 सितंबर)

  • स्वीकृत बोली: ₹48,980 करोड़ (औसत दर 5.51%)

  • अगली VRR नीलामी: ₹1.25 लाख करोड़ (25 सितंबर 2025)

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