2 अक्टूबर 2025—गांधी जयंती के दिन—भारत ने अपने एक सच्चे गांधीवादी, समाजवादी विचारक और स्वतंत्रता सेनानी डॉ. जी. जी. परिख को खो दिया। 100 वर्ष की उम्र में मुंबई में उनका निधन केवल एक व्यक्तित्व का अंत नहीं था, बल्कि यह उस विचार परंपरा की एक विराम रेखा है, जो सत्य, सेवा, सादगी और समाजवाद से संचालित थी।
डॉ. परिख को जीवन भर समाजवादी आंदोलन, जनसंगठनों और वैकल्पिक राजनीति के क्षेत्र में “संन्यासी नेता” की संज्ञा दी जाती रही। वे न केवल स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय थे, बल्कि स्वतंत्र भारत में नैतिक राजनीति और सामाजिक न्याय की आवाज़ भी बने रहे।
प्रारंभिक जीवन: मूल्यों की नींव
डॉ. जी. जी. परिख का जन्म 30 दिसंबर 1924 को सुरेंद्रनगर (तत्कालीन वाधवां कैंप), गुजरात में हुआ। बचपन में ही उन्होंने सौराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और अंततः मुंबई में शिक्षा प्राप्त की। यद्यपि वे एक योग्य चिकित्सक बने, लेकिन चिकित्सा से ज़्यादा उनका मन सामाजिक सेवा और जन आंदोलन में रमा।
यहीं से शुरू हुआ एक ऐसा जीवन, जो व्यक्तिगत सुविधाओं की बजाय सामूहिक भलाई के लिए समर्पित था।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
डॉ. परिख का सार्वजनिक जीवन किशोरावस्था में ही प्रारंभ हो गया था। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण वे गिरफ्तार हुए और 10 महीने तक जेल में रहे। उस उम्र में जब अधिकांश युवा कैरियर और भविष्य की चिंता करते हैं, परिख ने देश की आज़ादी को अपना उद्देश्य बना लिया।
1946 में, वे कांग्रेस समाजवादी पार्टी में शामिल हुए—एक ऐसा संगठन जो स्वतंत्रता संग्राम के भीतर वामपंथी और जनवादी विचारों को लेकर सक्रिय था।
स्वतंत्रता के बाद की दिशा: जन आंदोलनों का निर्माण
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, जहाँ अधिकांश आंदोलनकारी सत्ता के गलियारों की ओर मुड़े, डॉ. परिख ने सत्ता के बजाय समाज को चुना। वे 1947 में बॉम्बे स्टूडेंट्स कांग्रेस के अध्यक्ष बने और छात्र आंदोलनों, श्रमिक संगठन, और सहकारी संस्थानों के माध्यम से सामाजिक चेतना का निर्माण करते रहे।
1950 के दशक में उन्होंने प्रसिद्ध समाजवादी साप्ताहिक “जनता” का संपादन किया, जो भारत में समाजवादी विमर्श का एक प्रमुख मंच था। उनके लेखों और भाषणों में गांधीवादी नैतिकता और लोहियावादी समाजवाद की झलक साफ दिखाई देती थी।
युसुफ मेहरअली सेंटर और ग्रामीण नवाचार
1961 में उन्होंने महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में युसुफ मेहरअली सेंटर की स्थापना में अहम भूमिका निभाई। यह केंद्र ग्रामीण विकास, राजनीतिक शिक्षा और नवाचारों का जीवंत मंच बना। इस केंद्र ने शहरी और ग्रामीण युवाओं को सामाजिक कार्य और वैकल्पिक जीवन शैली के लिए प्रेरित किया।
परिख जीवन भर इस केंद्र से जुड़े रहे और सैकड़ों सामाजिक कार्यकर्ताओं के गुरु, मार्गदर्शक और साथी बने।
आपातकाल विरोध और लोकतंत्र की रक्षा
1975–77 में आपातकाल के दौरान डॉ. परिख ने एक बार फिर अपनी निडरता और नैतिक साहस का प्रदर्शन किया। उन्होंने इंदिरा गांधी के निरंकुश शासन के खिलाफ आवाज़ उठाई और मीसा (MISA) के अंतर्गत गिरफ्तार किए गए।
उनकी गिरफ्तारी और जेल यात्रा लोकतंत्र के प्रति उनकी अडिग निष्ठा और विचारधारा से समझौता न करने की भावना का प्रतीक बनी। उनके जैसे लोगों ने ही लोकतांत्रिक पुनर्स्थापन की नींव रखी।
जीवन दर्शन: सेवा, सादगी और सत्य
डॉ. परिख का जीवन राजनीति से परे, एक दार्शनिक आंदोलन की तरह था। उन्होंने कभी किसी पद की लालसा नहीं की, कभी चुनाव नहीं लड़ा, और ना ही अपनी नीतियों से समझौता किया। वे जीवनभर किराए के छोटे से मकान में रहे, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग किया और सादा जीवन जिया।
उनके लिए राजनीति सत्ता का नहीं, सेवा का माध्यम थी। वे अक्सर कहते थे, “राजनीति का काम जनता को सच बताना है, न कि उसे बहलाना।”
शतायु जीवन की कुछ प्रमुख उपलब्धियाँ
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1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भागीदारी और 10 महीने जेल।
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1946 में कांग्रेस समाजवादी पार्टी में प्रवेश।
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1947 में बॉम्बे स्टूडेंट्स कांग्रेस के अध्यक्ष।
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1950 के दशक में ‘जनता’ साप्ताहिक के संपादक।
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1961 में युसुफ मेहरअली सेंटर की स्थापना में भूमिका।
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1975 में आपातकाल विरोधी आंदोलन में सक्रिय भागीदारी और जेल यात्रा।
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100 वर्षों का जीवन, जिसमें कोई निजी संपत्ति नहीं, केवल विचारों और कर्मों की विरासत।
विरासत: विचारों से जीवित रहेंगे डॉ. परिख
डॉ. परिख का निधन गांधी जयंती के दिन होना केवल संयोग नहीं, बल्कि प्रतीक है—उनके जीवन की उस गांधीवादी चेतना का, जो सादा जीवन, उच्च विचार और समाज सेवा से जुड़ी थी।
वे भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका जीवन और विचार समाज के उन कोनों तक पहुँच चुके हैं, जहाँ बदलाव की आग अभी भी जल रही है।
उनका संपूर्ण जीवन एक संदेश था—कि विचारधारा में दृढ़ता, आचरण में सादगी और जनसेवा में निरंतरता ही असली नेतृत्व है।
“शक्ति सत्ताधारियों के पास हो सकती है, लेकिन नैतिक बल सच्चे कार्यकर्ताओं के पास होता है।” — डॉ. जी. जी. परिख

