महाराष्ट्र में एम.एस. स्वामीनाथन की जयंती अब 'सतत कृषि दिवस
महाराष्ट्र में एम.एस. स्वामीनाथन की जयंती अब 'सतत कृषि दिवस

महाराष्ट्र में एम.एस. स्वामीनाथन की जयंती अब ‘सतत कृषि दिवस’ के रूप में मनाई जाएगी

महाराष्ट्र सरकार ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए घोषणा की है कि हर वर्ष 7 अगस्त को ‘सतत कृषि दिवस’ (Sustainable Agriculture Day) के रूप में मनाया जाएगा। यह तिथि भारत रत्न डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन की जयंती है, जिन्हें भारतीय हरित क्रांति का जनक माना जाता है। यह निर्णय न केवल उनके योगदान को सम्मानित करता है, बल्कि महाराष्ट्र को सतत और पर्यावरण-अनुकूल कृषि पद्धतियों की ओर अग्रसर करने के प्रयासों को भी बल देता है।


डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन: हरित क्रांति के जनक

डॉ. मोंगोलुरी स्वामीनाथन ने 1960 के दशक में भारत को खाद्यान्न संकट से उबारने में निर्णायक भूमिका निभाई थी। उन्होंने उच्च उत्पादकता वाली गेहूं और चावल की किस्में विकसित कीं, जिनकी बदौलत भारत ने खाद्य आत्मनिर्भरता प्राप्त की। उनकी वैज्ञानिक दृष्टिकोण और किसान-केंद्रित सोच ने भारतीय कृषि को आधुनिकता की ओर मोड़ा।

हालांकि उनका योगदान सिर्फ पैदावार बढ़ाने तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने पूरे जीवनकाल में सतत कृषि, जैव विविधता संरक्षण, कृषि जलवायु लचीलापन और किसान समृद्धि के लिए आवाज उठाई। उनका दृष्टिकोण था — “खाद्य सुरक्षा केवल पेट भरने की बात नहीं है, यह गरिमा और स्थायित्व की बात है।”


बायो-हैप्पीनेस रिसर्च सेंटर्स की स्थापना

महाराष्ट्र सरकार ने 30 जुलाई 2025 को जारी एक शासकीय आदेश (GR) में राज्य की सभी कृषि विश्वविद्यालयों को “डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन बायो-हैप्पीनेस सेंटर–रिसर्च सेंटर” स्थापित करने का निर्देश दिया है। इन केंद्रों का उद्देश्य होगा:

  • सतत कृषि पर अनुसंधान को बढ़ावा देना

  • जलवायु अनुकूल तकनीकों का विकास करना

  • खाद्य सुरक्षा और किसान समृद्धि के समाधान तलाशना

‘बायो-हैप्पीनेस’ की अवधारणा डॉ. स्वामीनाथन द्वारा प्रतिपादित की गई थी, जिसमें प्राकृतिक संसाधनों के संतुलन के साथ-साथ किसानों के जीवन में खुशहाली को सर्वोपरि रखा गया है।


राज्यभर में होंगे विशेष आयोजन

राज्य सरकार ने कृषि आयुक्त को ‘सतत कृषि दिवस’ के आयोजन के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करने का निर्देश दिया है। इस दिन पूरे राज्य में निम्न गतिविधियाँ आयोजित की जाएंगी:

  • स्थायी कृषि तकनीकों पर सेमिनार और कार्यशालाएं

  • पर्यावरण-अनुकूल खेती को बढ़ावा देने के लिए जन-जागरूकता अभियान

  • कृषि नवाचारों का प्रदर्शन

  • किसानों को जैविक, प्राकृतिक और मिश्रित खेती के तरीकों से परिचित कराना

  • ‘डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन पुरस्कार’ का वितरण, जो कृषि में विशिष्ट योगदान देने वाले व्यक्तियों और संस्थानों को दिया जाएगा।

यह आयोजन न केवल एक श्रद्धांजलि है, बल्कि भविष्य के लिए एक नीति-आधारित हस्तक्षेप भी है।


क्यों जरूरी है सतत कृषि?

आज की दुनिया जलवायु परिवर्तन, भूमिगत जल संकट, उर्वरक और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग, और जैव विविधता के क्षरण जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। भारत में किसानों की आत्महत्याएं, फसल नुकसान, और मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट भी चिंताजनक है।

सतत कृषि का लक्ष्य है —
 पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना
 प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना
 कृषि को लाभकारी और दीर्घकालिक बनाना
 किसानों को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाना

डॉ. स्वामीनाथन की सोच थी कि खेती केवल पैदावार तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह किसानों की खुशहाली और प्रकृति के संरक्षण के साथ जुड़ी होनी चाहिए।


एक प्रेरणादायक शुरुआत

महाराष्ट्र द्वारा डॉ. स्वामीनाथन की जयंती को ‘सतत कृषि दिवस’ के रूप में मनाने की पहल भारत के कृषि क्षेत्र को एक नई दिशा दे सकती है। यह निर्णय आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाता रहेगा कि कृषि केवल अन्न उत्पादन नहीं है — यह हमारी संस्कृति, प्रकृति और भविष्य का आधार है।


निष्कर्ष

इस घोषणा के साथ महाराष्ट्र ने एक मिसाल कायम की है, जिसमें विज्ञान, परंपरा और आधुनिक कृषि नीति का संगम दिखाई देता है। यदि अन्य राज्य भी इस दिशा में कदम बढ़ाएं, तो भारत एक बार फिर कृषि क्षेत्र में सतत क्रांति के नए अध्याय की ओर बढ़ सकता है — ठीक वैसे ही जैसे डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन ने हरित क्रांति से इसकी शुरुआत की थी।

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