हर वर्ष 17 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित अंतर्राष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस (International Day for the Eradication of Poverty) विश्वभर में मनाया जाता है। यह दिवस केवल आय असमानताओं पर विचार करने का अवसर नहीं है, बल्कि गरिमा, न्याय और समावेशी विकास पर बल देने का भी समय है।
वर्ष 2025 में इस दिवस की थीम है:
“परिवारों के प्रति सम्मान और प्रभावी समर्थन सुनिश्चित कर सामाजिक एवं संस्थागत दुर्व्यवहार का अंत करना।”
यह थीम गरीबी से जूझ रहे परिवारों की वास्तविक संघर्षपूर्ण परिस्थितियों की ओर ध्यान आकर्षित करती है और नीति-निर्माताओं से आग्रह करती है कि वे सहायता प्रणालियों को अविश्वास और नियंत्रण के बजाय भरोसे और गरिमा पर आधारित बनाएं।
दिन का महत्व
अंतर्राष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस केवल आर्थिक असमानताओं पर चिंतन का दिन नहीं है। यह गरिमा, न्याय और समावेशी विकास को बढ़ावा देने का अवसर भी है। 2025 की थीम “परिवार-केंद्रित गरीबी उन्मूलन” इस बात पर जोर देती है कि गरीबी केवल आर्थिक अभाव नहीं, बल्कि सामाजिक अपमान, असमान व्यवहार और अविश्वास से भी जुड़ी है।
गरीबी का प्रभाव अक्सर एकल माताओं, आदिवासी परिवारों और ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे समुदायों पर सबसे अधिक पड़ता है। ये परिवार अक्सर उन्हीं संस्थाओं—स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और कल्याण कार्यालय—से भी अपमान और अविश्वास का सामना करते हैं जो उनकी मदद के लिए बनाए गए हैं।
कार्रवाई के लिए आह्वान:
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ऐसे सहयोगी संस्थान बनाना जो परिवारों की गरिमा का सम्मान करें।
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सबसे कमजोर वर्गों की जरूरतों को प्राथमिकता देना।
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गरीबी का प्रत्यक्ष अनुभव रखने वाले लोगों की सलाह और सहभागिता से नीति सुधार करना।
संक्षिप्त इतिहास
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1987: फ्रांस के पेरिस में पहली बार “विश्व गरीबी उन्मूलन दिवस” मनाया गया।
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1992: संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसे औपचारिक रूप से अंतरराष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस घोषित किया।
उद्देश्य: गरीबी में जीवन यापन करने वाले लोगों के प्रयासों को सम्मान देना, जागरूकता बढ़ाना और समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संवाद को प्रोत्साहित करना।
वैश्विक परिदृश्य
हालांकि तकनीकी प्रगति और आर्थिक विकास तेजी से हो रहे हैं, दुनिया भर में करोड़ों लोग अत्यधिक गरीबी, असुरक्षित आवास, कुपोषण, और स्वास्थ्य व न्याय तक सीमित पहुंच जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र का तीसरा गरीबी उन्मूलन दशक (2018–2027) सतत विकास लक्ष्य (SDG) 1 के अनुरूप गरीबी उन्मूलन के प्रयासों को तेज करने पर केंद्रित है —
“हर रूप में, हर जगह गरीबी का अंत करना।”
भारत की प्रगति
भारत ने गरीबी उन्मूलन में उल्लेखनीय प्रगति की है:
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अत्यधिक गरीबी (रोज़ाना $2.15 से कम आय) 2011–12 के 16.2% से घटकर 2022–23 में 2.3% रह गई। इसका मतलब है कि लगभग 171 मिलियन लोग गरीबी रेखा से ऊपर उठ चुके हैं।
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शहरी बेरोजगारी दर: Q1 FY24–25 में 6.6%, जो 2017–18 के बाद सबसे कम है।
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2021 से रोज़गार वृद्धि जनसंख्या वृद्धि से तेज रही है।
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ग्रामीण महिलाओं की कृषि में भागीदारी और स्वरोज़गार दर बढ़ी है।
अब भी मौजूद चुनौतियाँ:
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युवा बेरोजगारी: 13.3%, स्नातकों में यह 29% तक।
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औपचारिक क्षेत्र में हिस्सेदारी: केवल 23% गैर-कृषि वेतनभोगी नौकरियाँ।
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महिला-पुरुष रोजगार अंतर: लगभग 23.4 करोड़ का अंतर।
भारत की प्रमुख गरीबी उन्मूलन योजनाएँ
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मनरेगा (MGNREGA, 2005): ग्रामीण परिवारों को साल में 100 दिनों का भुगतानयुक्त कार्य; एक-तिहाई नौकरियाँ महिलाओं के लिए आरक्षित।
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दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY–NRLM, 2011): महिलाओं के स्व-सहायता समूह और सतत आजीविका निर्माण पर केंद्रित।
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प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (2016): गरीब महिलाओं को स्वच्छ ईंधन (एलपीजी) कनेक्शन प्रदान करना।
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इंदिरा आवास योजना / प्रधानमंत्री आवास योजना: ग्रामीण बीपीएल परिवारों को निःशुल्क या सब्सिडी वाले घर।
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राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (NULM, 2013): शहरी गरीबों के कौशल विकास और स्वरोज़गार को बढ़ावा।
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एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRDP): ग्रामीण आय सृजन हेतु ऋण और सब्सिडी।
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गरीबी उन्मूलन पर कार्यबल (2015): नीति आयोग के अंतर्गत गरीबी मापन और रोजगार-आधारित गरीबी कमी रणनीतियाँ।
गरीबी मापन और हालिया आँकड़े
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राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक (NITI Aayog, 2023): 2015–16 से 2019–21 के बीच 13.5 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए।
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वैश्विक MPI (2018): भारत ने 2005–06 से 2015–16 के बीच गरीबी 55% से घटाकर 28% की।
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बुनियादी सुविधाएँ: बिजली, बैंक खाते, स्वच्छ पेयजल और शिक्षा में सुधार ने इस सफलता में प्रमुख भूमिका निभाई।
निष्कर्ष
अंतरराष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस 2025 यह याद दिलाता है कि गरीबी से लड़ाई केवल आर्थिक सुधारों से नहीं जीती जा सकती।
इसके लिए आवश्यक है कि नीति निर्माता गरिमा, समानता और सहयोग पर आधारित नीतियाँ अपनाएँ। गरीबों और हाशिए पर रहने वाले परिवारों के सम्मान और उनके अधिकारों की रक्षा करना, वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर सतत और समावेशी विकास सुनिश्चित करने का एक अनिवार्य हिस्सा है।
यह दिवस हमें यह संदेश देता है कि एक विकसित और समावेशी विश्व तभी संभव है जब हम गरीबी के सामाजिक और आर्थिक दोनों पहलुओं पर ध्यान दें और परिवार-केंद्रित समाधान अपनाएँ।

