भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने अक्टूबर 2025 में म्यूचुअल फंड शुल्क ढांचे (Mutual Fund Fee Framework) में बड़े और ऐतिहासिक बदलावों का प्रस्ताव पेश किया है। इसके तहत एक परामर्श पत्र (Consultation Paper) जारी किया गया है, जिसका उद्देश्य म्यूचुअल फंड उद्योग में शुल्क वसूली की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और निवेशक-हितैषी बनाना है।
सेबी का यह कदम न केवल निवेशक संरक्षण (Investor Protection) को मजबूत करेगा, बल्कि भारत को एक वैश्विक मानक-आधारित निवेश बाज़ार बनाने की दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकता है।
बदलाव की ज़रूरत क्यों?
पिछले कुछ वर्षों में म्यूचुअल फंड्स में निवेशकों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। लेकिन इसके साथ ही, फंड्स द्वारा वसूले जाने वाले शुल्क और खर्च की पारदर्शिता पर सवाल भी उठे हैं।
कई निवेशकों को यह स्पष्ट नहीं होता कि वे किस सेवा के लिए कितना भुगतान कर रहे हैं और TER (Total Expense Ratio) में कौन-कौन से खर्च शामिल हैं।
SEBI का नया प्रस्ताव इस अस्पष्टता को खत्म करने और शुल्क संरचना को “निवेशक के हित में पारदर्शी और तुलनात्मक रूप से निष्पक्ष” बनाने की दिशा में है।
प्रमुख प्रस्ताव
1. टैक्स और सरकारी शुल्क को TER से बाहर करना
अब तक सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT), गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) और स्टाम्प ड्यूटी जैसी सरकारी देनदारियाँ TER में शामिल थीं, यानी निवेशक को यह सब एक संयुक्त खर्च के रूप में दिखाई देता था।
नए प्रस्ताव के अनुसार, इन्हें TER से बाहर रखा जाएगा और अलग से दर्शाया जाएगा।
इससे निवेशकों को यह साफ समझ में आएगा कि वास्तविक फंड प्रबंधन खर्च कितना है और सरकारी शुल्क कितना।
2. एएमसी के लिए अतिरिक्त 5 बेसिस पॉइंट्स खर्च का हटाना
वर्तमान में एसेट मैनेजमेंट कंपनियाँ (AMCs) अपने कुल प्रबंधित परिसंपत्तियों (AUM) पर 5 बेसिस पॉइंट्स (bps) का अतिरिक्त शुल्क ले सकती हैं।
सेबी ने इस अतिरिक्त शुल्क को पूरी तरह समाप्त करने का प्रस्ताव दिया है, जिससे निवेशकों की लागत घटेगी और पारदर्शिता बढ़ेगी।
3. TER स्लैब में आंशिक वृद्धि से संतुलन
ऊपर बताए गए हटाव के संतुलन के लिए, सेबी ने ओपन-एंडेड एक्टिव स्कीम्स (Open-ended Active Schemes) के पहले दो TER स्लैब में 5 bps की वृद्धि का सुझाव दिया है।
इससे छोटे फंड हाउसों को वित्तीय स्थिरता बनाए रखने में मदद मिलेगी, जबकि निवेशकों पर कुल प्रभाव नगण्य रहेगा।
4. वैकल्पिक प्रदर्शन-आधारित TER ढांचा (Performance-linked TER)
यह सबसे अभिनव प्रस्तावों में से एक है।
SEBI चाहती है कि फंड हाउस यदि चाहें, तो वे अपने शुल्क को फंड के प्रदर्शन से जोड़ सकते हैं।
इस मॉडल में यदि फंड बेहतर प्रदर्शन करता है तो AMC थोड़ी अधिक फीस ले सकती है, जबकि कमजोर प्रदर्शन पर फीस घटेगी।
यह प्रणाली लचीलापन, प्रतिस्पर्धा और जवाबदेही — तीनों को मजबूत करेगी।
5. ब्रोकरेज और लेनदेन लागत पर सख्त सीमा
फंड हाउसों के लिए अब लेनदेन पर खर्च की सीमा भी तय की जा रही है:
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कैश मार्केट में: 12 bps से घटाकर 2 bps
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डेरिवेटिव्स में: 5 bps से घटाकर 1 bps
इससे फंड्स की आंतरिक ट्रेडिंग लागत घटेगी, और अंततः निवेशकों को अधिक रिटर्न मिलेगा।
6. पारदर्शिता और खुलासा (Transparency & Disclosure)
सेबी ने स्पष्ट किया है कि म्यूचुअल फंड्स को अब अपने सभी खर्च घटकों को अलग-अलग प्रदर्शित करना होगा।
इसमें शामिल होंगे —
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निवेश प्रबंधन शुल्क
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वितरण आयोग (Distribution Commission)
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ब्रोकरेज शुल्क
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प्रशासनिक खर्च
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टैक्स और अन्य देनदारियाँ
इस नए नियम से निवेशकों के लिए विभिन्न योजनाओं की तुलना करना और सही विकल्प चुनना आसान हो जाएगा।
7. जन-सुझाव आमंत्रित
सेबी ने इस परामर्श पत्र पर 17 नवंबर 2025 तक सार्वजनिक प्रतिक्रिया आमंत्रित की है।
निवेशक, एएमसी, वितरक, सलाहकार और अन्य हितधारक इस पर अपनी राय भेज सकते हैं।
इन सुझावों के आधार पर ही अंतिम नियम लागू किए जाएंगे।
निवेशकों और उद्योग के लिए इसका मतलब
निवेशकों के लिए
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अब फंड के खर्च स्पष्ट रूप से दिखेंगे, जिससे निवेशक समझ पाएंगे कि वे किसके लिए भुगतान कर रहे हैं।
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पारदर्शी TER प्रणाली से विभिन्न फंड्स की तुलना करना आसान होगा।
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Performance-linked फीस के तहत, निवेशकों को केवल तब अधिक फीस देनी होगी जब फंड बेहतर प्रदर्शन करे — यानी अब फीस और प्रदर्शन का सीधा रिश्ता बनेगा।
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निवेशकों को चाहिए कि वे अपने वर्तमान फंड्स के TER और नए खुलासों (disclosures) पर ध्यान रखें।
एएमसी (Asset Management Companies) के लिए
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फंड हाउसों को अपनी लागत संरचना और प्रबंधन रणनीति की पुनर्रचना करनी होगी।
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उन्हें अपने ऑडिट और गवर्नेंस सिस्टम को पारदर्शी बनाना होगा।
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“Performance-linked TER” लागू करने के लिए नए तकनीकी और मूल्यांकन मॉडल तैयार करने होंगे।
वितरक और सलाहकारों के लिए
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ग्राहकों को नए शुल्क ढांचे की जानकारी देना अनिवार्य होगा।
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उन्हें अपनी कम्युनिकेशन और सलाह प्रणालियों को अपडेट करना होगा ताकि निवेशक भ्रमित न हों।
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सही फीस मॉडल के चयन में निवेशकों का मार्गदर्शन करना उनकी जिम्मेदारी होगी।
नियामकों और उद्योग संस्थानों के लिए
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नए ढांचे को लागू करने के लिए स्पष्ट ऑपरेशनल गाइडलाइन्स तैयार करनी होंगी।
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संक्रमण (Transition) प्रक्रिया को सुचारू रखने के लिए निवेशक शिक्षा (Investor Education) को प्राथमिकता देनी होगी।
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लंबी अवधि में यह सुधार भारत के म्यूचुअल फंड उद्योग को और मजबूत बनाएगा।

