भूटान में पीएम मोदी ने किया ‘कालचक्र अभिषेक’ का उद्घाटन
भूटान में पीएम मोदी ने किया ‘कालचक्र अभिषेक’ का उद्घाटन

भूटान में पीएम मोदी ने किया ‘कालचक्र अभिषेक’ का उद्घाटन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने दो दिवसीय भूटान दौरे के दूसरे दिन, 12 नवंबर 2025 को बौद्ध धर्म के अत्यंत पवित्र अनुष्ठान ‘कालचक्र अभिषेक’ (Kalachakra Initiation) का उद्घाटन किया। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने स्वयं को “सौभाग्यशाली” बताया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर समारोह की तस्वीरें साझा कीं। तस्वीरों में प्रधानमंत्री मोदी भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक और महामहिम चतुर्थ नरेश के साथ नजर आए।
उन्होंने लिखा —

“भूटान के महामहिम राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक और महामहिम चतुर्थ नरेश के साथ ‘कालचक्र — समय का चक्र’ अभिषेक का उद्घाटन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसकी अध्यक्षता परम पावन जे खेंपो ने की, जिसने इस अवसर को और भी विशेष बना दिया।”


क्या है कालचक्र अभिषेक (Kalachakra Ceremony)?

‘कालचक्र’ शब्द संस्कृत से लिया गया है, जिसका अर्थ है — “समय का चक्र” (Wheel of Time)। यह तिब्बती वज्रयान बौद्ध धर्म का एक अत्यंत गूढ़ और पवित्र तांत्रिक अनुष्ठान है। इसका मूल स्रोत ‘कालचक्र तंत्र’ नामक प्राचीन ग्रंथ है, जो समय, ब्रह्मांड और चेतना के पारस्परिक संबंधों की व्याख्या करता है।

कालचक्र तीन स्तरों पर समय और अस्तित्व को समझाता है —

  1. बाह्य कालचक्र (Outer Kalachakra):
    यह बाहरी ब्रह्मांड, ग्रहों की गति, ऋतुओं के परिवर्तन और ऐतिहासिक चक्रों को दर्शाता है।

  2. आंतरिक कालचक्र (Inner Kalachakra):
    यह मानव शरीर, ऊर्जा मार्गों (नाड़ी, चक्र आदि) और मन के प्रवाह से संबंधित है।

  3. वैकल्पिक कालचक्र (Alternative Kalachakra):
    यह ध्यान, साधना और तांत्रिक अभ्यासों के माध्यम से मुक्ति (निर्वाण) की ओर मार्गदर्शन करता है।

इस तंत्र का उद्देश्य केवल आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि विश्व में शांति, संतुलन और करुणा का प्रसार करना भी है।


अनुष्ठान — रेत मंडल से लेकर दीक्षा तक

कालचक्र अभिषेक समारोह प्रायः 10 से 12 दिनों तक चलता है और इसमें कई गहन एवं प्रतीकात्मक क्रियाएँ होती हैं।
यह आयोजन साधारण धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि गहन ध्यान, प्रार्थना और तांत्रिक अभ्यास का समन्वय होता है।

1. रेत मंडल (Sand Mandala) का निर्माण:

भिक्षु रंगीन रेत से अत्यंत जटिल मंडल का निर्माण करते हैं, जो ‘कालचक्र मंडल महल’ का प्रतीक होता है। यह ब्रह्मांडीय व्यवस्था का सूक्ष्म चित्रण माना जाता है।

2. पवित्र नृत्य और प्रार्थनाएँ:

समारोह के दौरान बौद्ध भिक्षु पारंपरिक वस्त्रों में धार्मिक नृत्य करते हैं। मंत्रोच्चार और प्रार्थनाएँ विश्व शांति, सौहार्द और आध्यात्मिक जागरण का संदेश देती हैं।

3. दीक्षा (Empowerment Rite):

समारोह के अंतिम चरण में साधकों को प्रमुख गुरु — जैसे दलाई लामा या जे खेंपो — से शिक्षाएँ, आशीर्वाद और व्रत प्राप्त होते हैं। इसे ‘कालचक्र दीक्षा’ कहा जाता है, जो साधक को आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाती है।

रेत मंडल के निर्माण के बाद अंत में उसे विनष्ट (Destroy) कर दिया जाता है। यह कर्म अनित्यत्व (Impermanence) का प्रतीक है — अर्थात, जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है।


भूटान में प्रधानमंत्री मोदी की भूमिका

भूटान यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक और चतुर्थ राजा जिग्मे सिंग्ये वांगचुक के साथ कालचक्र अभिषेक समारोह में भाग लिया।
इस आयोजन की अध्यक्षता परम पावन जे खेंपो (भूटान के सर्वोच्च बौद्ध धार्मिक नेता) ने की।

प्रधानमंत्री मोदी ने इस अवसर को “आध्यात्मिक गहराई और महान सम्मान का क्षण” बताया।
उनकी यह भागीदारी न केवल भारत और भूटान के आध्यात्मिक संबंधों को रेखांकित करती है, बल्कि सांस्कृतिक कूटनीति (Cultural Diplomacy) के माध्यम से दोनों देशों की निकटता को भी दर्शाती है।


भारत-भूटान संबंधों को नई दिशा

प्रधानमंत्री मोदी की यह आध्यात्मिक भागीदारी उनके दो-दिवसीय दौरे का प्रमुख आकर्षण रही।
इस यात्रा के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण द्विपक्षीय परियोजनाओं और पहलों की शुरुआत भी की:

  • पुनात्सांगचू-II जलविद्युत परियोजना (1,020 मेगावाट) का उद्घाटन — भारत-भूटान ऊर्जा सहयोग का एक नया अध्याय।

  • तकनीकी, कनेक्टिविटी, रक्षा और सुरक्षा के क्षेत्रों में सहयोग पर वार्ताएँ।

  • भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों के दर्शन और सामूहिक प्रार्थना, जो चौथे राजा के 70वें जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में आयोजित हुई।

इन पहलों ने दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी, आध्यात्मिक विरासत और जन-से-जन के संबंधों को और मजबूत किया है।


कालचक्र अभिषेक से जुड़े स्थैतिक तथ्य

  • अर्थ: कालचक्र का अर्थ है “समय का चक्र” (Wheel of Time)

  • परंपरा: यह वज्रयान बौद्ध धर्म (तिब्बती परंपरा) का प्रमुख तांत्रिक अनुष्ठान है।

  • तीन स्तर: बाह्य, आंतरिक और वैकल्पिक कालचक्र।

  • समारोह की अवधि: लगभग 10–12 दिन।

  • मुख्य प्रतीक: रेत मंडल — जिसे अंत में नष्ट कर दिया जाता है, जो जीवन की अस्थिरता का दार्शनिक संदेश देता है।

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवंबर 2025 में भूटान में आयोजित समारोह में उद्घाटन किया।

  • जनसहभागिता: यह आयोजन प्रायः सार्वजनिक रूप से खुला रहता है, ताकि श्रद्धालु बौद्ध शिक्षाओं और आशीर्वाद से लाभान्वित हो सकें।

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