भारत को एक वैश्विक शिक्षा और अनुसंधान केंद्र (Global Education Hub) में बदलने की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए नीति आयोग ने दिसंबर 2025 में एक व्यापक नीति रिपोर्ट जारी की है, जिसका शीर्षक है—
“भारत में उच्च शिक्षा का अंतर्राष्ट्रीयकरण: संभावनाएं, क्षमता और नीतिगत सिफारिशें”।
यह रिपोर्ट भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली के वैश्वीकरण (Internationalisation) को लेकर निष्कर्ष, तर्क, चुनौतियाँ, रणनीतिक सिफारिशें और नियामक सुधारों का एक विस्तृत रोडमैप प्रस्तुत करती है। यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुरूप है और विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025 के अंतर्गत प्रस्तावित नियामक सुधारों से भी गहराई से जुड़ी हुई है।
पृष्ठभूमि और औचित्य: अंतर्राष्ट्रीय असंतुलन की चुनौती
नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक छात्र गतिशीलता में तेज़ वृद्धि के बावजूद भारत की स्थिति असंतुलित बनी हुई है।
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वर्ष 2024 में, भारत में पढ़ने आने वाले हर एक अंतरराष्ट्रीय छात्र के मुकाबले लगभग 28 भारतीय छात्र विदेश पढ़ने गए।
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यह अनुपात दर्शाता है कि भारत अभी भी मुख्यतः एक “student-sending country” बना हुआ है, न कि एक प्रमुख education destination।
यह असंतुलन न केवल शैक्षणिक, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक चिंता का विषय भी है।
आर्थिक और रणनीतिक अनिवार्यता
रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय छात्रों द्वारा विदेशों में उच्च शिक्षा पर किया जाने वाला व्यय 2025 तक लगभग ₹6.2 लाख करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है। यह—
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भारत के GDP का लगभग 2%
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और FY 2024–25 के व्यापार घाटे का करीब 75%
है।
नीति आयोग का तर्क है कि यह भारी पूंजी बहिर्वाह इस बात का संकेत है कि भारत को—
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प्रतिभा पलायन कम करने
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घरेलू संस्थानों को सशक्त बनाने
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और शिक्षा को सॉफ्ट पावर व ज्ञान कूटनीति के साधन के रूप में इस्तेमाल करने
के लिए तत्काल रणनीतिक सुधार करने होंगे।
रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
1. अंतरराष्ट्रीय छात्रों की सीमित उपस्थिति
हालाँकि 2001 के बाद से भारत में अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या में 518% की वृद्धि हुई है, फिर भी 2022 तक यह संख्या केवल लगभग 47,000 रही। यह भारत की जनसंख्या और शैक्षणिक क्षमता के लिहाज़ से काफी कम है।
रिपोर्ट का अनुमान है कि सही नीतिगत हस्तक्षेपों के साथ यह संख्या 2047 तक 7.89 लाख से 11 लाख के बीच पहुँच सकती है।
2. बहिर्मुखी छात्र एकाग्रता
विदेश में पढ़ रहे 13.5 लाख भारतीय छात्रों में से लगभग 8.5 लाख छात्र—
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अमेरिका
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ब्रिटेन
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ऑस्ट्रेलिया
जैसे उच्च आय वाले देशों में केंद्रित हैं। यह आकर्षण और घरेलू दबाव—दोनों को दर्शाता है।
3. संस्थागत क्षमता की बाधाएँ
भारतीय संस्थानों द्वारा बताई गई प्रमुख समस्याएँ हैं—
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अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए सीमित छात्रवृत्तियाँ (41%)
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भारतीय शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर वैश्विक धारणाएँ (30%)
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अंतरराष्ट्रीय बुनियादी ढांचे और सहायता प्रणालियों की कमी
रणनीतिक नीति सिफारिशें: एक विस्तृत रोडमैप
नीति आयोग की रिपोर्ट में—
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22 नीतिगत सिफारिशें
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76 कार्य योजनाएँ
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और 125 प्रदर्शन संकेतक (KPIs)
प्रस्तावित किए गए हैं।
1. रणनीतिक और वित्तीय उपाय
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भारत विद्या कोष: 10 अरब डॉलर का प्रस्तावित राष्ट्रीय अनुसंधान संप्रभु कोष
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विश्व बंधु छात्रवृत्ति एवं फैलोशिप: अंतरराष्ट्रीय छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए
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भारत की आन (Alumni Ambassador Network): प्रवासी भारतीयों को शिक्षा दूत के रूप में संगठित करना
2. गतिशीलता और साझेदारी
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इरास्मस+ जैसा ढांचा: ASEAN, BRICS, BIMSTEC के लिए, जिसे “टैगोर फ्रेमवर्क” कहा जा सकता है
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कैंपस-विद-इन-कैंपस और अंतरराष्ट्रीय कैंपस मॉडल को बढ़ावा
3. नियामक सुधार
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विदेशी छात्रों और संकाय के लिए सरल प्रवेश–निकास नियम
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त्वरित वीज़ा प्रक्रिया
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बैंक खाते, टैक्स ID जैसी प्रक्रियाओं के लिए सिंगल-विंडो क्लीयरेंस
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वैश्विक शिक्षकों को आकर्षित करने के लिए प्रतिस्पर्धी वेतन
4. ब्रांडिंग और रैंकिंग
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NIRF मापदंडों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग और वैश्विक पहुँच को शामिल करना
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भारत की शिक्षा गुणवत्ता को लेकर धारणा सुधारने हेतु रणनीतिक संचार अभियान
5. पाठ्यक्रम और अकादमिक संस्कृति
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वैश्विक रूप से प्रासंगिक पाठ्यक्रम
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अंतर-सांस्कृतिक शैक्षणिक वातावरण
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मजबूत अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान सहयोग
अध्ययन की कार्यप्रणाली
रिपोर्ट को तैयार करने के लिए—
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160 भारतीय संस्थानों का ऑनलाइन सर्वेक्षण
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16 देशों में विशेषज्ञ साक्षात्कार
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IIT मद्रास में राष्ट्रीय कार्यशाला
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और ब्रिटेन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय शिक्षा गोलमेज सम्मेलन
के निष्कर्षों को शामिल किया गया।
नियामक परिदृश्य: विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025
इस विधेयक के तहत—
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UGC, AICTE और NCTE को एक एकीकृत उच्च शिक्षा नियामक से बदलने का प्रस्ताव है
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नई संरचना में विनियमन, प्रत्यायन और मानक निर्धारण के लिए अलग-अलग परिषदें होंगी
इसका उद्देश्य एक पारदर्शी, सरल और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी नियामक ढांचा बनाना है, जो उच्च शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण को आसान बना सके।
चुनौतियाँ और आगे की राह
रिपोर्ट स्वीकार करती है कि—
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गुणवत्ता और ब्रांड धारणा में अंतर
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खंडित नियामक ढांचा
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और संस्थागत स्तर पर अंतर्राष्ट्रीयकरण संस्कृति की कमी
अब भी बड़ी चुनौतियाँ हैं।
हालाँकि, नीति आयोग का निष्कर्ष है कि यदि नीतिगत सुधार, सॉफ्ट पावर, प्रवासी नेटवर्क और सांस्कृतिक ताकत का सही उपयोग किया जाए, तो भारत उच्च शिक्षा के वैश्विक मानचित्र पर एक अग्रणी स्थान हासिल कर सकता है।

