Tiger Deaths in India 2025: भारत में 166 बाघों की हुई मौत, संरक्षण पर उठे गंभीर सवाल
Tiger Deaths in India 2025: भारत में 166 बाघों की हुई मौत, संरक्षण पर उठे गंभीर सवाल

Tiger Deaths in India 2025: भारत में 166 बाघों की हुई मौत, संरक्षण पर उठे गंभीर सवाल

  • भारत, जहाँ दुनिया की सबसे बड़ी बाघ आबादी पाई जाती है, ने वर्ष 2025 में बाघों की मौतों के मामले में एक चिंताजनक वृद्धि दर्ज की है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष देशभर में कुल 166 बाघों की मृत्यु हुई। यह स्थिति बताती है कि भले ही बाघों की कुल संख्या बढ़ रही हो, लेकिन आवास पर बढ़ता दबाव, क्षेत्रीय संघर्ष और संरक्षण प्रबंधन से जुड़ी चुनौतियाँ अब और गंभीर होती जा रही हैं।


    खबर में क्यों?

    राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, 2025 में 166 बाघों की मौत दर्ज की गई, जो 2024 की तुलना में 40 अधिक है (2024 में 126 मौतें)।
    इन आंकड़ों ने वन्यजीव संरक्षण विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं के बीच चिंता बढ़ा दी है—खासतौर पर इसलिए क्योंकि सबसे अधिक मौतें मध्य प्रदेश जैसे उन राज्यों में दर्ज हुई हैं, जहाँ बाघों की आबादी तेज़ी से बढ़ी है।


    2025 के बाघ मृत्यु आंकड़े: मुख्य तथ्य

    NTCA के आंकड़ों के अनुसार—

    • कुल बाघ मौतें (2025): 166

    • शावक (कब्स): 31

    • 2024 में मौतें: 126

    • एक वर्ष में लगभग 32% की वृद्धि, जो संरक्षण दबाव को दर्शाती है

    विशेषज्ञों का मानना है कि शावकों की अधिक मौतें इस ओर इशारा करती हैं कि प्राकृतिक चयन, बीमारी और क्षेत्रीय संघर्ष जैसे कारक अब अधिक प्रभावी हो रहे हैं।


    सबसे अधिक बाघ मौतें दर्ज करने वाले राज्य

    2025 में जिन राज्यों में सबसे ज्यादा बाघ मौतें दर्ज हुईं, वे हैं:

    • मध्य प्रदेश: 55 (भारत का “टाइगर स्टेट”)

    • महाराष्ट्र: 38

    • केरल: 13

    • असम: 12

    इन राज्यों में बाघों की आबादी अपेक्षाकृत अधिक है। विशेषज्ञों के अनुसार, जहां निगरानी और रिपोर्टिंग मजबूत होती है, वहां मौतों का रिकॉर्ड भी अधिक पारदर्शी दिखता है—हालांकि वास्तविक दबाव भी इन्हीं इलाकों में ज्यादा है।


    मुख्य कारण: क्षेत्रीय संघर्ष (Territorial Conflict)

    वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, 2025 में अधिकांश बाघ मौतें क्षेत्रीय संघर्ष से जुड़ी पाई गईं। इसके प्रमुख कारण हैं:

    • बाघों की संख्या में तेज़ वृद्धि

    • वन क्षेत्रों और प्राकृतिक कॉरिडोर का सीमित होना

    • युवा या विस्थापित बाघों का नए इलाके की तलाश में निकलना

    जब ये बाघ पहले से बसे वयस्क और प्रभुत्वशाली बाघों के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं, तो अक्सर घातक संघर्ष होता है। यह समस्या विशेष रूप से घनी आबादी वाले टाइगर रिज़र्व में देखने को मिल रही है।


    बाघ आबादी में वृद्धि बनाम स्थान की कमी

    भारत में बाघ संरक्षण प्रयासों ने पिछले एक दशक में उल्लेखनीय सफलता दिखाई है:

    • 2018: 2,967 बाघ

    • 2022: 3,682 बाघ (लगभग 6% वार्षिक वृद्धि)

    विशेष रूप से मध्य प्रदेश में—

    • 2014: 308 बाघ

    • 2022: 785 बाघ

    हालांकि, इस तेज़ वृद्धि के साथ वन क्षेत्र उतनी ही तेजी से नहीं बढ़ा, जिससे सीमित परिदृश्यों में प्रतिस्पर्धा और संघर्ष बढ़ गया है। यही कारण है कि संरक्षण की अगली चुनौती केवल संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि आवास विस्तार और कॉरिडोर कनेक्टिविटी है।


    प्राकृतिक मौतें और शिकार (Poaching) के मामले

    NTCA और राज्य वन विभागों की जांच के अनुसार:

    • मध्य प्रदेश में 2025 की 55 मौतों में से 38 से अधिक प्राकृतिक कारणों (बीमारी, उम्र, शावक मृत्यु) से जुड़ी पाई गईं।

    • लगभग 10 मामले शिकार से संबंधित पाए गए—जिनमें

      • विद्युत-झटका (Electrocution)

      • फंदे और अन्य गैर-लक्षित हत्याएँ शामिल हैं।

    नियम के अनुसार, हर बाघ मृत्यु को शिकार माना जाता है, जब तक कि जांच में अन्यथा सिद्ध न हो जाए। इससे जांच प्रक्रिया सख्त और जवाबदेही सुनिश्चित होती है।


    NTCA और राज्य प्रवर्तन एजेंसियों की भूमिका

    राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण बाघ मृत्यु की जांच के लिए कड़े मानक संचालन प्रक्रियाएँ (SOPs) निर्धारित करता है। इसके तहत—

    • हर मौत की फोरेंसिक और मैदानी जांच

    • संदिग्ध मामलों में केंद्रीय एजेंसियों की भागीदारी

    • शिकार नेटवर्क से जुड़े मामलों में कड़ी कार्रवाई

    मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में स्टेट टाइगर स्ट्राइक फोर्स की तैनाती की गई है। संगठित शिकार नेटवर्क से जुड़े मामलों में अंतरराष्ट्रीय कड़ियों तक की जांच की जा रही है।


    पृष्ठभूमि: भारत में बाघ संरक्षण

    भारत में दुनिया के लगभग 75% जंगली बाघ पाए जाते हैं।

    • अखिल भारतीय बाघ गणना हर चार वर्ष में होती है।

    • प्रोजेक्ट टाइगर और NTCA जैसे संस्थानों के प्रयासों से संख्या में वृद्धि हुई है।

    हालांकि, आवास विखंडन, सड़क–रेल परियोजनाएँ और मानव-प्रधान परिदृश्य प्राकृतिक कॉरिडोर को सीमित कर रहे हैं, जो भविष्य में सबसे बड़ी चुनौती बन सकते हैं।


    NTCA के बारे में

    पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत NTCA—

    • 2006 में

    • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत स्थापित

    • बाघ संरक्षण की नीति, निगरानी और समन्वय का शीर्ष निकाय है।

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