पश्चिम अफ्रीका के देश गिनी की राजनीति ने एक बार फिर निर्णायक मोड़ ले लिया है। वर्ष 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद से देश का नेतृत्व कर रहे सैन्य शासक ममाडी डौमबौया ने अब राष्ट्रपति चुनाव जीतकर औपचारिक रूप से सत्ता संभाल ली है। यह चुनाव ऐसे समय में हुआ, जब प्रमुख विपक्षी दलों ने इसे अनुचित बताते हुए बहिष्कार किया। इस घटनाक्रम ने गिनी में लोकतांत्रिक संक्रमण, नागरिक शासन और सैन्य भूमिका को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है।
खबर में क्यों?
दिसंबर 2025 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में ममाडी डौमबौया ने भारी बहुमत से जीत दर्ज की। गिनी के चुनाव आयोग के अनुसार, उन्हें 86.72% मत प्राप्त हुए, जिससे दूसरे दौर की आवश्यकता नहीं पड़ी। हालांकि, विपक्षी दलों ने चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसे निष्पक्ष और स्वतंत्र नहीं बताया और मतदान का बहिष्कार किया।
डौमबौया का चुनाव लड़ना उनके उस शुरुआती वादे के विपरीत माना जा रहा है, जिसमें उन्होंने नागरिक शासन बहाल करने के बाद सत्ता से हटने की बात कही थी।
गिनी में राजनीतिक संकट की पृष्ठभूमि
गिनी की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को समझने के लिए 2021 की घटनाओं को देखना जरूरी है।
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सितंबर 2021 में ममाडी डौमबौया ने सैन्य तख्तापलट कर तत्कालीन राष्ट्रपति अल्फा कोंडे को सत्ता से हटा दिया।
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अल्फा कोंडे गिनी के पहले लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित राष्ट्रपति थे, लेकिन तीसरे कार्यकाल को लेकर उनके फैसले पर व्यापक विरोध हुआ।
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तख्तापलट के बाद संविधान निलंबित कर दिया गया और देश में संक्रमणकालीन सैन्य शासन लागू हुआ।
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डौमबौया ने भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर होने को तख्तापलट का कारण बताया।
हालांकि, संक्रमणकाल के दौरान—
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राजनीतिक स्वतंत्रताओं पर अंकुश लगाया गया
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विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगे
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कई विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया या निर्वासन में भेजा गया
चुनाव प्रक्रिया और परिणाम
संक्रमणकाल के अंत में कराए गए राष्ट्रपति चुनाव को लेकर कई विवाद सामने आए—
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चुनाव में कुल आठ उम्मीदवार मैदान में थे
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नए संवैधानिक प्रावधानों के कारण कई प्रमुख विपक्षी नेताओं को चुनाव लड़ने से रोका गया
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आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, मतदान प्रतिशत 80.95% रहा
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विपक्षी दलों ने मतदान प्रतिशत और परिणामों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए
चुनाव आयोग ने डौमबौया की जीत को वैध बताया, लेकिन विपक्ष और नागरिक संगठनों का कहना है कि प्रतिस्पर्धा का मैदान बराबर नहीं था।
नए संविधान की भूमिका
गिनी की राजनीति में नए संविधान ने केंद्रीय भूमिका निभाई—
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सितंबर 2025 में जनमत संग्रह के जरिए नया संविधान अपनाया गया
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इस संविधान ने सत्तारूढ़ सैन्य जुंटा के सदस्यों को चुनाव लड़ने की अनुमति दी
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इससे ममाडी डौमबौया की उम्मीदवारी का रास्ता साफ हुआ
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राष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष से बढ़ाकर 7 वर्ष कर दिया गया, जिसे एक बार नवीनीकृत किया जा सकता है
विपक्ष का आरोप है कि यह संविधान सत्ता में बने रहने के लिए तैयार किया गया, जिससे लोकतांत्रिक संतुलन कमजोर हुआ।
विपक्ष का बहिष्कार और आलोचना
प्रमुख विपक्षी दलों ने—
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चुनाव को अवैध और पूर्वनिर्धारित बताया
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कहा कि मीडिया, सुरक्षा बल और प्रशासन पर सत्तारूढ़ जुंटा का प्रभाव रहा
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नए संविधान और चुनाव कानूनों को सत्ता के केंद्रीकरण का माध्यम बताया
उनका तर्क है कि ऐसे माहौल में चुनाव जीतना लोकतांत्रिक वैधता की बजाय शक्ति का प्रदर्शन है।
पश्चिम अफ्रीका में सैन्य तख्तापलट की व्यापक प्रवृत्ति
गिनी का मामला अकेला नहीं है। हाल के वर्षों में पश्चिम अफ्रीका में—
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माली
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बुर्किना फासो
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नाइजर
जैसे देशों में भी सैन्य तख्तापलट हुए हैं।
अक्सर ये तख्तापलट—
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भ्रष्टाचार और अस्थिरता के खिलाफ वादों के साथ शुरू होते हैं
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लेकिन जब सैन्य नेता चुनाव के जरिए सत्ता बनाए रखते हैं, तो लोकतंत्र को लेकर चिंताएं बढ़ जाती हैं
गिनी की स्थिति क्षेत्रीय राजनीति में स्थिरता बनाम लोकतंत्र की बड़ी चुनौती को उजागर करती है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
डौमबौया की जीत पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया मिश्रित रही—
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कुछ अफ्रीकी देशों ने चुनाव परिणामों को स्वीकार किया
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लोकतंत्र समर्थक संगठनों ने निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल उठाए
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क्षेत्रीय संगठनों ने गिनी से नागरिक स्वतंत्रताओं की बहाली और समावेशी राजनीति की अपील की
आगे की चुनौतियाँ
राष्ट्रपति बनने के बाद ममाडी डौमबौया के सामने कई अहम चुनौतियाँ हैं—
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लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करना
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सेना की राजनीति में भूमिका सीमित करना
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आर्थिक सुधार और बेरोज़गारी से निपटना
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बॉक्साइट जैसे प्राकृतिक संसाधनों का पारदर्शी और न्यायसंगत प्रबंधन
गिनी प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है, लेकिन आम जनता तक इसका लाभ सीमित रहा है।

