जनवरी 2026 में यमन में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला है। लंबे समय से गृहयुद्ध, क्षेत्रीय हस्तक्षेप और गहरे राजनीतिक विभाजन से जूझ रहे देश में प्रधानमंत्री के इस्तीफ़े के बाद तुरंत नए प्रधानमंत्री की नियुक्ति की गई है। यह नेतृत्व परिवर्तन ऐसे समय में हुआ है जब यमन न केवल आंतरिक अस्थिरता, बल्कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से जुड़ी जटिल खाड़ी भू-राजनीति के दबावों का भी सामना कर रहा है।
विश्लेषकों के अनुसार, यह बदलाव केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि यमन की राजनीतिक निरंतरता, क्षेत्रीय संतुलन और भविष्य की शांति प्रक्रिया के लिहाज़ से भी बेहद महत्वपूर्ण है।
क्यों चर्चा में?
यमन की Presidential Leadership Council (PLC) ने प्रधानमंत्री सलेम बिन ब्रेक का इस्तीफ़ा औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया है और देश के विदेश मंत्री शाया मोहसेन ज़िंदानी को नया प्रधानमंत्री नियुक्त किया है।
यह निर्णय ऐसे समय पर लिया गया है जब यमन की सत्ता संरचना कई आंतरिक और बाहरी दबावों से जूझ रही है और शासन में किसी भी तरह की रिक्तता अस्थिरता को और बढ़ा सकती थी।
यमन के राजनीतिक नेतृत्व में बदलाव
सरकारी मीडिया के अनुसार, सलेम बिन ब्रेक ने इस सप्ताह की शुरुआत में अपना इस्तीफ़ा सौंपा था, जिसे PLC ने त्वरित रूप से मंज़ूरी दे दी। इसके तुरंत बाद विदेश मंत्री रहे शाया मोहसेन ज़िंदानी को नया मंत्रिमंडल गठित करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई।
इस तेज़ निर्णय प्रक्रिया को इस रूप में देखा जा रहा है कि यमन का सऊदी-समर्थित नेतृत्व किसी भी प्रकार की राजनीतिक अनिश्चितता से बचना चाहता है। लंबे संघर्ष के बीच शासन में निरंतरता बनाए रखना PLC की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है।
प्रेसिडेंशियल लीडरशिप काउंसिल (PLC) की भूमिका
यमन में वर्तमान शासन व्यवस्था Presidential Leadership Council के माध्यम से संचालित होती है। इस परिषद का गठन 2022 में सऊदी अरब के समर्थन से किया गया था, ताकि हूती विद्रोहियों के विरोध में खड़ी राजनीतिक और सैन्य ताक़तों को एक साझा मंच पर लाया जा सके।
PLC के पास—
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कार्यकारी अधिकार
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प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल की नियुक्ति
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और प्रमुख राजनीतिक निर्णय
लेने की शक्ति है।
प्रधानमंत्री के इस्तीफ़े को तुरंत स्वीकार करना और नए प्रधानमंत्री की नियुक्ति करना, परिषद की यह कोशिश दर्शाता है कि वह आंतरिक विभाजनों और बाहरी दबावों के बावजूद स्थिर शासन का संकेत देना चाहती है।
क्षेत्रीय तनाव: सऊदी अरब और UAE का समीकरण
हाल के महीनों में यमन एक बार फिर संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और सऊदी अरब से जुड़े क्षेत्रीय तनावों का केंद्र बन गया है।
दिसंबर 2025 में Southern Transitional Council (STC)—जो UAE समर्थित दक्षिणी अलगाववादी समूह है—ने दक्षिणी और पूर्वी यमन के कई इलाकों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।
STC की यह बढ़त विशेष रूप से सऊदी सीमा के नज़दीक देखी गई, जिससे रियाद की सुरक्षा चिंताएँ बढ़ गई हैं। यद्यपि सऊदी अरब और UAE दोनों हूती विद्रोहियों के खिलाफ एक ही गठबंधन का हिस्सा रहे हैं, लेकिन यमन के भविष्य को लेकर उनके हित पूरी तरह एक-दूसरे से मेल नहीं खाते।
पृष्ठभूमि: यमन का लंबा गृहयुद्ध
यमन का गृहयुद्ध 2015 में उस समय भड़क उठा जब ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने राजधानी सना समेत उत्तरी यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण कर लिया। इसके बाद सऊदी अरब और UAE के नेतृत्व में गठबंधन ने हस्तक्षेप किया।
इस संघर्ष ने—
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दुनिया के सबसे गंभीर मानवीय संकटों में से एक
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लाखों लोगों का विस्थापन
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भीषण खाद्य असुरक्षा
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और स्वास्थ्य व बुनियादी सेवाओं का पतन
जैसी स्थितियाँ पैदा कीं।
हालाँकि हाल के वर्षों में बड़े पैमाने पर लड़ाई की तीव्रता कुछ कम हुई है, लेकिन राजनीतिक विखंडन, क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता और सशस्त्र गुटों की मौजूदगी अब भी यमन को अस्थिर बनाए हुए है।
नए प्रधानमंत्री से क्या उम्मीदें?
नए प्रधानमंत्री शाया मोहसेन ज़िंदानी के सामने चुनौतियाँ बेहद गंभीर हैं:
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बिखरी हुई सत्ता संरचना में संतुलन बनाना
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सऊदी अरब और UAE के बीच नाज़ुक समीकरण को संभालना
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आर्थिक संकट और सरकारी वेतन भुगतान
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मानवीय सहायता के वितरण में सुधार
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और शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाना
विदेश मंत्री के रूप में उनका अनुभव उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर संवाद और सहयोग बढ़ाने में मदद कर सकता है, लेकिन ज़मीनी हकीकतें उनकी राह को कठिन बनाएँगी।

