जलवायु परिवर्तन के दौर में हिमालय दुनिया के सबसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल हो चुका है। विशेष रूप से पूर्वी हिमालय में तेजी से पिघलते ग्लेशियर, नई हिमनदीय झीलों का निर्माण और उनसे जुड़ी अचानक बाढ़ की घटनाएँ (GLOFs) मानव जीवन, बुनियादी ढांचे और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में Indian Institute of Technology Guwahati (IIT गुवाहाटी) के शोधकर्ताओं ने एक पूर्वानुमानात्मक ढांचा (predictive framework) विकसित किया है, जो भविष्य में बनने वाली हिमनदीय झीलों की पहचान कर सकता है और संभावित खतरों को पहले से रेखांकित करता है।
यह अध्ययन हाल ही में अंतरराष्ट्रीय जर्नल Scientific Reports में प्रकाशित हुआ है और इसे हिमालयी क्षेत्रों में आपदा जोखिम न्यूनीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि माना जा रहा है।
क्यों चर्चा में है?
IIT गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पूर्वी हिमालय में 492 ऐसे संभावित स्थलों की पहचान की है, जहाँ भविष्य में हिमनदीय झीलें बन सकती हैं। ये झीलें आगे चलकर Glacial Lake Outburst Floods (GLOFs) का कारण बन सकती हैं।
यह पहली बार है जब इस क्षेत्र के लिए इतनी व्यापक और वैज्ञानिक रूप से सत्यापित भविष्यवाणी प्रस्तुत की गई है, जो न केवल वर्तमान झीलों बल्कि भविष्य के जोखिम क्षेत्रों को भी चिन्हित करती है।
हिमनदीय खतरे और GLOFs क्या हैं?
हिमनदीय खतरे मुख्य रूप से तब उत्पन्न होते हैं, जब ग्लेशियर के पीछे या किनारे पानी इकट्ठा होकर झील बनाता है। ये झीलें अक्सर बर्फ, मलबे या मोरेन से बनी प्राकृतिक दीवारों से घिरी होती हैं।
जब यह प्राकृतिक बांध टूट जाता है, तो अचानक भारी मात्रा में पानी, बर्फ और चट्टानें नीचे की ओर बहने लगती हैं—इसे ही ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है।
ऐसी घटनाएँ:
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गाँवों और कस्बों को तबाह कर सकती हैं
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सड़कें, पुल और जलविद्युत परियोजनाएँ नष्ट कर सकती हैं
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कृषि भूमि और नदी तंत्र को गंभीर नुकसान पहुँचा सकती हैं
जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं, जिससे हिमालय में नई झीलें अभूतपूर्व गति से बन रही हैं। इसलिए यह जानना बेहद जरूरी हो गया है कि भविष्य में ये झीलें कहाँ बन सकती हैं।
IIT गुवाहाटी के अध्ययन की खास बात
इस अध्ययन की सबसे बड़ी विशेषता इसका भू-आकृतिक (geomorphological) फोकस है।
जहाँ पहले के अधिकांश अध्ययन तापमान वृद्धि या ग्लेशियर के क्षेत्रफल तक सीमित थे, वहीं IIT गुवाहाटी की टीम ने:
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ढाल (slope)
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सतह की बनावट
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सर्क (cirque)
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पास की मौजूदा झीलें
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स्थलाकृति की जटिलता
जैसे कारकों का गहराई से विश्लेषण किया।
इसके लिए:
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उच्च-रिज़ॉल्यूशन गूगल अर्थ सैटेलाइट इमेजरी
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डिजिटल एलिवेशन मॉडल (DEM)
का उपयोग किया गया।
महत्वपूर्ण बात यह है कि शोधकर्ताओं ने अनिश्चितता (uncertainty) को भी मॉडल में शामिल किया, जिससे पूर्वानुमान अधिक यथार्थवादी और उपयोगी बन सके।
उन्नत पूर्वानुमान मॉडल का इस्तेमाल
शोध दल ने सटीकता की जाँच के लिए तीन अलग-अलग मॉडल आजमाए:
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लॉजिस्टिक रिग्रेशन (LR)
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आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क (ANN)
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बेयesian न्यूरल नेटवर्क (BNN)
इनमें BNN मॉडल सबसे अधिक प्रभावी और सटीक साबित हुआ।
BNN की खासियत यह है कि यह:
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सीमित और अनिश्चित डेटा के साथ भी बेहतर काम करता है
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संभावनाओं और जोखिम को अधिक वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत करता है
इस मॉडल ने यह स्पष्ट किया कि:
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पीछे हटते ग्लेशियर
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हल्की ढाल
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सर्क और पास की झीलें
हिमनदीय झीलों के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाते हैं—ऐसे कारक जिन्हें पहले अक्सर कम महत्व दिया जाता था।
मुख्य निष्कर्ष: 492 उच्च-जोखिम स्थल
इस ढांचे के माध्यम से शोधकर्ताओं ने पूर्वी हिमालय में 492 संभावित हिमनदीय झील निर्माण स्थलों की पहचान की। ये स्थान भविष्य के उच्च-जोखिम क्षेत्र (potential hazard zones) माने जा सकते हैं।
IIT गुवाहाटी के सहायक प्रोफेसर Ajay Dashora के अनुसार, यह ढांचा:
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प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों के विकास में मदद कर सकता है
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सड़कों और जलविद्युत परियोजनाओं की सुरक्षित योजना बनाने में उपयोगी हो सकता है
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पर्वतीय क्षेत्रों में बसावट और विकास योजना के लिए वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है
यह शोध आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों, नीति निर्माताओं और हिमालयी राज्यों के लिए अत्यंत उपयोगी है।
वैश्विक महत्व और भविष्य की दिशा
इस अध्ययन का महत्व केवल भारत तक सीमित नहीं है।
आईआईटी गुवाहाटी द्वारा विकसित यह ढांचा:
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एंडीज़
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आल्प्स
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अन्य हिमाच्छादित पर्वतीय क्षेत्रों
में भी अपनाया जा सकता है, जहाँ ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं और GLOF का खतरा बढ़ रहा है।
भविष्य में शोध दल:
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मोरेन विकास के ऐतिहासिक डेटा को जोड़ने
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डेटा प्रोसेसिंग को स्वचालित करने
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फील्ड-आधारित सत्यापन (ground validation)
पर काम करने की योजना बना रहा है, जिससे मॉडल और अधिक सटीक व व्यावहारिक बन सके।

