16वें वित्त आयोग ने राज्यों को 41% हिस्सेदारी क्यों बनाए रखी
16वें वित्त आयोग ने राज्यों को 41% हिस्सेदारी क्यों बनाए रखी

16वें वित्त आयोग ने राज्यों को 41% हिस्सेदारी क्यों बनाए रखी?

केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संबंध अब एक नए चरण में प्रवेश कर चुके हैं। 16वां वित्त आयोग—जिनकी सिफारिशें 2026–27 से 2030–31 तक लागू होंगी—ने विभाज्य कर पूल (Divisible Tax Pool) में राज्यों की हिस्सेदारी को 41% पर बरकरार रखा है। हालांकि, इस फैसले से भी ज्यादा अहम बात यह है कि आयोग ने धन के वितरण के तरीके में कई मूलभूत बदलाव किए हैं।
जीडीपी योगदान को नया मानदंड बनाना, राजस्व घाटा अनुदानों को समाप्त करना और प्रदर्शन-आधारित संकेतों को मजबूत करना—ये सभी कदम बताते हैं कि अब जोर केवल “कितना पैसा मिले” पर नहीं, बल्कि “पैसे का उपयोग कितना प्रभावी है” पर होगा। यही कारण है कि 16वें वित्त आयोग की सिफारिशें प्रतियोगी परीक्षाओं और नीति विमर्श—दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो गई हैं।


41% कर हस्तांतरण बरकरार: इसका क्या मतलब है?

18 राज्यों ने मांग की थी कि केंद्र के करों में राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ाकर 50% की जाए। इसके बावजूद आयोग ने कर हस्तांतरण दर को 41% पर ही बनाए रखा।
आयोग का स्पष्ट तर्क है कि वर्तमान व्यवस्था में राज्य पहले से ही कुल गैर-ऋण सार्वजनिक राजस्व का दो-तिहाई से अधिक हिस्सा प्राप्त कर रहे हैं। यदि इसमें और वृद्धि की जाती, तो केंद्र सरकार की राष्ट्रीय जिम्मेदारियों—जैसे रक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा, अखिल भारतीय अवसंरचना परियोजनाएं और मैक्रो-आर्थिक स्थिरता—को निभाने की क्षमता प्रभावित हो सकती थी।

यह निर्णय 15वें वित्त आयोग की निरंतरता को दर्शाता है, लेकिन साथ ही यह भी संकेत देता है कि राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism) अब मात्रा-केंद्रित नहीं, बल्कि गुणवत्ता और प्रभावशीलता-केंद्रित हो रहा है।


जीडीपी योगदान: दक्षता को मिला इनाम

16वें वित्त आयोग का सबसे बड़ा नवाचार है—राज्य के जीडीपी योगदान को क्षैतिज कर वितरण सूत्र में शामिल करना। इसे 10% भार दिया गया है।
इसका अर्थ यह है कि जो राज्य राष्ट्रीय आर्थिक वृद्धि में अधिक योगदान करते हैं, उन्हें अब कर बंटवारे में अतिरिक्त मान्यता मिलेगी। आयोग ने स्पष्ट किया है कि यह कोई अचानक या अत्यधिक बदलाव नहीं, बल्कि एक दिशात्मक सुधार है, जिसका उद्देश्य दक्षता और समानता के बीच संतुलन बनाना है।

नीतिगत दृष्टि से यह कदम महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह राज्यों को आर्थिक गतिविधियां बढ़ाने, निवेश आकर्षित करने और रोजगार सृजन के लिए प्रोत्साहित करता है।


क्षैतिज कर वितरण सूत्र में बड़े बदलाव

जीडीपी योगदान के अलावा आयोग ने वितरण सूत्र में कई अन्य संशोधन किए हैं:

  • कर प्रयास (Tax Effort) के लिए पहले दिए जा रहे 2.5% भार को हटाया गया

  • जनसंख्या भार को 2.5 प्रतिशत अंक बढ़ाया गया

  • क्षेत्रफल, जनसांख्यिकीय प्रदर्शन और प्रति व्यक्ति GSDP दूरी के भार को घटाया गया

इन बदलावों का सीधा असर राज्यों की हिस्सेदारी पर पड़ा।
औद्योगिक और तेजी से बढ़ते राज्यों—जैसे कर्नाटक, केरल, गुजरात और महाराष्ट्र—को अपेक्षाकृत अधिक लाभ मिला, जबकि अधिक जनसंख्या वाले और अपेक्षाकृत गरीब राज्यों—जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार—की हिस्सेदारी सापेक्ष रूप से कम हुई।

यह पुनर्वितरण आर्थिक दृष्टि से दक्षता को बढ़ावा देता है, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से यह बहस का विषय बन सकता है, क्योंकि भारत में क्षेत्रीय असमानताएं एक संवेदनशील मुद्दा रही हैं।


राजस्व घाटा अनुदान: एक युग का अंत

16वें वित्त आयोग की सबसे चर्चित सिफारिशों में से एक है—राजस्व घाटा अनुदान (Revenue Deficit Grants – RDGs) को शून्य करना
आयोग का मानना है कि RDGs राज्यों में निर्भरता की संस्कृति को बढ़ावा देते हैं और राजकोषीय सुधारों के लिए प्रोत्साहन को कमजोर करते हैं। आयोग के अनुसार, अब राज्यों के पास कर आधार बढ़ाने, गैर-कर राजस्व सुधारने और व्यय को तर्कसंगत बनाने के पर्याप्त अवसर हैं।

यह फैसला पूर्ववर्ती वित्त आयोगों से एक स्पष्ट विचलन है और यह संकेत देता है कि भविष्य में राज्यों को अधिक आत्मनिर्भर और वित्तीय रूप से अनुशासित बनना होगा।


स्थानीय निकाय और आपदा प्रबंधन पर फोकस

हालांकि RDGs को समाप्त किया गया है, लेकिन आयोग ने स्थानीय शासन और आपदा प्रबंधन को नजरअंदाज नहीं किया।
अगले पांच वर्षों के लिए:

  • ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों को ₹7.91 लाख करोड़ का आवंटन

    • ग्रामीण-शहरी अनुपात: 60:40

    • प्राथमिकता: जल आपूर्ति, स्वच्छता और शहरी अवसंरचना

  • राज्य आपदा प्रतिक्रिया एवं निवारण कोष के लिए ₹2.04 लाख करोड़

  • राष्ट्रीय आपदा कोष के लिए ₹79,000 करोड़, जिसमें नवीनीकृत आपदा जोखिम सूचकांक का उपयोग किया जाएगा

यह दिखाता है कि आयोग ने सामान्य वित्तीय सहायता की बजाय उद्देश्य-आधारित और कार्यात्मक अनुदानों को प्राथमिकता दी है।

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