ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव: लोकसभा स्पीकर को हटाने की क्या है संवैधानिक प्रक्रिया?
ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव: लोकसभा स्पीकर को हटाने की क्या है संवैधानिक प्रक्रिया?

ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव: लोकसभा स्पीकर को हटाने की क्या है संवैधानिक प्रक्रिया?

10 फरवरी 2026 को विपक्षी दलों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। सदन की कार्यवाही के दौरान लिए गए कुछ निर्णयों को लेकर विपक्ष ने आपत्ति जताई, जिसके बाद यह कदम उठाया गया। अब यह प्रस्ताव संसदीय नियमों और संवैधानिक प्रावधानों के तहत निर्धारित प्रक्रिया से गुजरेगा।

यह समझना जरूरी है कि लोकसभा अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया सरकार के खिलाफ लाए जाने वाले सामान्य अविश्वास प्रस्ताव से पूरी तरह अलग होती है। इसके लिए विशेष प्रस्ताव, स्पष्ट नोटिस अवधि और “पूर्ण बहुमत” (Absolute Majority) की आवश्यकता होती है।


क्या लोकसभा अध्यक्ष को हटाया जा सकता है?

हाँ। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94(c) के तहत लोकसभा अध्यक्ष को पद से हटाने का प्रावधान है। इस अनुच्छेद के अनुसार, अध्यक्ष को लोकसभा के “तत्कालीन कुल सदस्यों” के बहुमत से पारित प्रस्ताव द्वारा हटाया जा सकता है।

यह प्रावधान केवल लोकसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पर लागू होता है। राज्यसभा के सभापति (उपराष्ट्रपति) के लिए अलग संवैधानिक व्यवस्था है।

संविधान यह सुनिश्चित करता है कि अध्यक्ष, भले ही उच्च संवैधानिक पद पर हों, लेकिन वे सदन के प्रति जवाबदेह बने रहें।


अनुच्छेद 94 क्या कहता है?

अनुच्छेद 94 के अनुसार लोकसभा अध्यक्ष निम्न परिस्थितियों में पद रिक्त करते हैं:

  1. यदि वे लोकसभा के सदस्य नहीं रहते।

  2. यदि वे उपाध्यक्ष को लिखित रूप में इस्तीफा दे दें।

  3. यदि सदन के तत्कालीन कुल सदस्यों के बहुमत से पारित प्रस्ताव द्वारा उन्हें हटा दिया जाए।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि हटाने के लिए पूर्ण बहुमत (Absolute Majority) आवश्यक है। इसका अर्थ है कि सदन की कुल सदस्य संख्या के आधे से अधिक सदस्यों का समर्थन प्रस्ताव के पक्ष में होना चाहिए—सिर्फ उपस्थित और मतदान करने वालों का नहीं।


हटाने की चरणबद्ध प्रक्रिया

लोकसभा अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया लोकसभा के कार्य संचालन नियम 200 से 203 के अंतर्गत निर्धारित है। यह प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है:

1. लिखित सूचना

कोई भी सदस्य लोकसभा महासचिव को लिखित सूचना देता है कि वह अध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव लाना चाहता है।

2. 14 दिन का नोटिस

प्रस्ताव को विचारार्थ लेने से कम से कम 14 दिन पहले सूचना देना अनिवार्य है। यह समय अवधि अध्यक्ष को आरोपों का जवाब तैयार करने का अवसर देती है।

3. प्रस्ताव को सूचीबद्ध करना

नोटिस अवधि पूरी होने के बाद प्रस्ताव को सदन की कार्यसूची में शामिल किया जाता है।

4. 50 सदस्यों का समर्थन

जब प्रस्ताव सदन में लिया जाता है, तो उसे स्वीकार करने के लिए कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन आवश्यक होता है। यदि 50 से कम सदस्य समर्थन करते हैं, तो प्रस्ताव प्रारंभिक चरण में ही निरस्त हो जाता है।


यदि प्रस्ताव स्वीकार हो जाए तो क्या होता है?

यदि 50 या उससे अधिक सदस्य प्रस्ताव के समर्थन में खड़े होते हैं, तो पीठासीन अधिकारी प्रस्ताव को अनुमति (Leave of the House) प्रदान करते हैं। इसके बाद 10 दिनों के भीतर उस पर चर्चा निर्धारित की जाती है।

चर्चा के दौरान:

  • बहस केवल प्रस्ताव में लगाए गए आरोपों तक सीमित रहती है।

  • प्रस्ताव प्रस्तुत करने वाले सदस्य को अधिकतम 15 मिनट बोलने का अवसर मिलता है।

  • लोकसभा अध्यक्ष को भी बहस में भाग लेने और अपनी बात रखने का अधिकार होता है।

  • अध्यक्ष इस दौरान सदन की अध्यक्षता नहीं करते।

मतदान की प्रक्रिया

प्रस्ताव तभी पारित माना जाएगा जब उसे सदन के तत्कालीन कुल सदस्यों के पूर्ण बहुमत का समर्थन प्राप्त हो।

अध्यक्ष प्रथम मतदान में एक सामान्य सदस्य के रूप में वोट दे सकते हैं, लेकिन मत बराबर होने की स्थिति में वे निर्णायक (Casting Vote) नहीं दे सकते।


क्या पहले ऐसा हुआ है?

भारतीय संसदीय इतिहास में लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव तीन बार लाया गया है:

  • 1954 – गणेश वासुदेव मावलंकर के खिलाफ

  • 1966 – हुकम सिंह के खिलाफ

  • 1987 – बलराम जाखड़ के खिलाफ

हालांकि, इनमें से कोई भी प्रस्ताव सफल नहीं हुआ। अब तक किसी भी लोकसभा अध्यक्ष को इस प्रक्रिया के माध्यम से पद से नहीं हटाया गया है।


प्रक्रिया के दौरान अध्यक्ष की स्थिति

यदि अध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन हो, तो वे सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं करते। लेकिन उन्हें निम्न अधिकार प्राप्त रहते हैं:

  • बहस में बोलने का अधिकार

  • कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार

  • प्रथम मतदान में वोट देने का अधिकार

एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान यह भी है कि लोकसभा भंग होने की स्थिति में भी अध्यक्ष अपने पद पर बने रहते हैं, जब तक कि नव-निर्वाचित लोकसभा की पहली बैठक से ठीक पहले तक।


लोकसभा अध्यक्ष का संवैधानिक महत्व

लोकसभा अध्यक्ष का पद अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। वे:

  • सदन की कार्यवाही संचालित करते हैं

  • अनुशासन बनाए रखते हैं

  • नियमों की व्याख्या करते हैं

  • धन विधेयक को प्रमाणित करते हैं

  • संसदीय परंपराओं की रक्षा करते हैं

अध्यक्ष को सदन में प्रक्रिया संबंधी मामलों पर अंतिम प्राधिकरण माना जाता है।

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