मातृत्व अवकाश में बड़ा बदलाव: अब गोद लेने वाली माताओं को भी मिलेगा पूरा अधिकार
मातृत्व अवकाश में बड़ा बदलाव: अब गोद लेने वाली माताओं को भी मिलेगा पूरा अधिकार

मातृत्व अवकाश में बड़ा बदलाव: अब गोद लेने वाली माताओं को भी मिलेगा पूरा अधिकार

भारत में मातृत्व अधिकारों को लेकर एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने दत्तक (गोद लेने वाली) माताओं के लिए मातृत्व अवकाश पर लगी उम्र सीमा को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। इस फैसले के बाद अब सभी दत्तक माताओं को बच्चे की उम्र की परवाह किए बिना 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश मिलेगा। यह निर्णय न केवल महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करता है, बल्कि दत्तक ग्रहण को भी एक समान और सम्मानजनक मातृत्व के रूप में मान्यता देता है।


क्या था पहले का नियम?

पहले सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 के तहत दत्तक माताओं को मातृत्व अवकाश केवल तभी मिलता था, जब वे तीन महीने (90 दिन) से कम उम्र के बच्चे को गोद लेती थीं।

इसका मतलब यह था कि यदि कोई महिला इससे अधिक उम्र के बच्चे को गोद लेती है, तो उसे मातृत्व अवकाश का लाभ नहीं मिलता था।

व्यवहारिक रूप से यह नियम कई महिलाओं के लिए बाधा बन गया था, क्योंकि भारत में अधिकतर बच्चे कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही गोद लिए जाते हैं, जो अक्सर तीन महीने से अधिक उम्र में होता है।


सुप्रीम कोर्ट का फैसला: विस्तार से समझें

यह ऐतिहासिक निर्णय हंसानंदिनी नंदूरी बनाम भारत संघ मामले में आया। सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 की धारा 60(4) को असंवैधानिक घोषित कर दिया।

अदालत ने स्पष्ट कहा कि बच्चे की उम्र के आधार पर मातृत्व लाभ को सीमित करना संविधान के मूल अधिकारों का उल्लंघन है।

कोर्ट ने इस प्रावधान को—

  • अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार)

  • अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार)

के खिलाफ माना।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि मातृत्व केवल बच्चे को जन्म देने तक सीमित नहीं है। इसमें बच्चे की देखभाल, भावनात्मक जुड़ाव और उसके विकास की जिम्मेदारी भी शामिल होती है। इसलिए दत्तक माताओं को इस अधिकार से वंचित करना न्यायसंगत नहीं है।


दत्तक और सरोगेसी माताओं को समान लाभ

इस फैसले के बाद अब भारत में दत्तक माताओं को भी जैविक (biological) माताओं के समान मातृत्व लाभ मिलेगा।

नई व्यवस्था के अनुसार—

  • सभी दत्तक माताओं को 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश मिलेगा

  • यह अवकाश बच्चे के सौंपे जाने (handover) की तारीख से लागू होगा

  • सरोगेसी (commissioning) माताओं को भी यही लाभ मिलेगा

यह बदलाव भारतीय कानून में समानता और समावेशन की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।


पहले का प्रावधान क्यों रद्द हुआ?

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि पुराना नियम न केवल भेदभावपूर्ण था, बल्कि व्यावहारिक रूप से भी प्रभावहीन था।

अदालत के अनुसार—

  • यह लाभ केवल 3 महीने से कम उम्र के बच्चों तक सीमित था

  • जबकि अधिकांश दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया इससे अधिक समय लेती है

  • इस कारण कई महिलाएं इस लाभ से वंचित रह जाती थीं

इसलिए कोर्ट ने इसे “अतार्किक” और “अप्रासंगिक” मानते हुए रद्द कर दिया।


बच्चे के हित और परिवार पर जोर

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में बच्चे के कल्याण को सबसे महत्वपूर्ण बताया।

अदालत ने कहा कि जब कोई बच्चा नए परिवार में आता है, तो उसे—

  • समय

  • देखभाल

  • भावनात्मक सुरक्षा

की सबसे अधिक जरूरत होती है।

यदि दत्तक माताओं को अवकाश नहीं मिलेगा, तो वे बच्चे के साथ पर्याप्त समय नहीं बिता पाएंगी, जिससे बच्चे के मानसिक और भावनात्मक विकास पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

यह फैसला इस बात को स्वीकार करता है कि मातृत्व का असली उद्देश्य बच्चे के संपूर्ण विकास को सुनिश्चित करना है, चाहे वह जैविक हो या दत्तक।


पितृत्व अवकाश पर भी सुझाव

इस ऐतिहासिक फैसले के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को पितृत्व अवकाश (Paternity Leave) पर भी विचार करने की सलाह दी है।

अदालत ने कहा कि बच्चे की देखभाल केवल मां की जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए।

  • पिता की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है

  • साझा अभिभावकत्व (Shared Parenting) को बढ़ावा देना जरूरी है

  • इससे परिवार में संतुलन और सहयोग बढ़ेगा

यदि भविष्य में पितृत्व अवकाश लागू होता है, तो यह भारतीय समाज में लैंगिक समानता की दिशा में एक और बड़ा कदम होगा।


समाज और महिलाओं पर प्रभाव

यह फैसला भारतीय समाज में कई सकारात्मक बदलाव ला सकता है:

1. दत्तक ग्रहण को बढ़ावा

अब महिलाएं बिना किसी भेदभाव के दत्तक ग्रहण करने के लिए अधिक प्रेरित होंगी।

2. कार्यस्थल पर समानता

दत्तक माताओं को भी वही अधिकार मिलेंगे जो जैविक माताओं को मिलते हैं।

3. बच्चों का बेहतर विकास

बच्चों को नए परिवार में बेहतर देखभाल और भावनात्मक समर्थन मिलेगा।

4. लैंगिक न्याय को बढ़ावा

यह फैसला महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करता है और समानता के सिद्धांत को आगे बढ़ाता है।

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