भारत में आगामी विधानसभा चुनावों और उपचुनावों को ध्यान में रखते हुए भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन नए नियमों का मुख्य उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और विश्वसनीय बनाना है। सबसे अहम बदलाव यह है कि अब सभी राजनीतिक विज्ञापनों को प्रसारित करने से पहले मीडिया सर्टिफिकेशन एंड मॉनिटरिंग कमेटी (MCMC) से प्री-सर्टिफिकेशन लेना अनिवार्य होगा।
6 राज्यों में उपचुनाव और चुनावी माहौल
चुनाव आयोग ने 15 मार्च को असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में चुनाव कार्यक्रम की घोषणा की थी, साथ ही 6 राज्यों में उपचुनाव का शेड्यूल भी जारी किया गया। इन चुनावों को ध्यान में रखते हुए आयोग ने समय रहते यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि चुनाव प्रचार के दौरान किसी भी प्रकार की भ्रामक जानकारी या अनुचित गतिविधियों को रोका जा सके।
चुनावों के दौरान डिजिटल और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए आयोग का यह कदम बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या है प्री-सर्टिफिकेशन की अनिवार्यता?
नए नियमों के तहत अब कोई भी राजनीतिक दल, उम्मीदवार, संगठन या व्यक्ति चुनावी विज्ञापन जारी करने से पहले MCMC से अनुमति प्राप्त करेगा। यह नियम सभी प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल माध्यमों पर लागू होगा।
इनमें शामिल हैं:
- टीवी और रेडियो विज्ञापन
- सार्वजनिक स्थानों पर ऑडियो-वीडियो डिस्प्ले
- ई-पेपर और डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म
- बल्क SMS और वॉयस मैसेज
- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म
बिना प्री-सर्टिफिकेशन के कोई भी राजनीतिक विज्ञापन जारी करना नियमों का उल्लंघन माना जाएगा और उस पर कार्रवाई हो सकती है।
MCMC की भूमिका और प्रक्रिया
मीडिया सर्टिफिकेशन एंड मॉनिटरिंग कमेटी (MCMC) इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी करेगी। उम्मीदवार अपने विज्ञापनों की मंजूरी के लिए जिला स्तर की MCMC में आवेदन कर सकते हैं, जबकि राज्य स्तर पर राजनीतिक दलों को राज्य MCMC से अनुमति लेनी होगी।
यदि किसी उम्मीदवार या दल को MCMC के निर्णय से असहमति होती है, तो वे अपील कर सकते हैं। इसके लिए मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) की अध्यक्षता में एक अपीलीय समिति बनाई गई है, जो निष्पक्ष तरीके से मामलों की समीक्षा करेगी।
पेड न्यूज और फेक कंटेंट पर सख्ती
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि चुनाव के दौरान “पेड न्यूज” और भ्रामक खबरों पर विशेष नजर रखी जाएगी। MCMC को निर्देश दिए गए हैं कि वह मीडिया में ऐसे संदिग्ध मामलों की पहचान करे और तुरंत कार्रवाई सुनिश्चित करे।
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से फैलने वाली फेक न्यूज और एडिटेड कंटेंट चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में यह कदम चुनाव की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है।
सोशल मीडिया अकाउंट्स की जानकारी अनिवार्य
पारदर्शिता बढ़ाने के लिए आयोग ने एक और महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है। अब सभी उम्मीदवारों को नामांकन के समय अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट्स की जानकारी हलफनामे में देनी होगी।
इससे चुनाव आयोग को यह ट्रैक करने में मदद मिलेगी कि उम्मीदवार किस तरह का कंटेंट साझा कर रहे हैं और क्या वे नियमों का पालन कर रहे हैं या नहीं।
चुनाव खर्च का पूरा हिसाब देना होगा
चुनावी पारदर्शिता को और मजबूत करने के लिए लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत राजनीतिक दलों को चुनाव खत्म होने के 75 दिनों के भीतर अपने प्रचार-प्रसार पर हुए खर्च का पूरा विवरण देना होगा।
इसमें शामिल होंगे:
- इंटरनेट और सोशल मीडिया विज्ञापन खर्च
- डिजिटल कंटेंट निर्माण पर खर्च
- आईटी और सोशल मीडिया मैनेजमेंट लागत
- इंटरनेट कंपनियों को किए गए भुगतान
इससे यह सुनिश्चित होगा कि चुनावी खर्च पारदर्शी रहे और किसी भी तरह की अनियमितता पर नजर रखी जा सके।
समन्वय बैठक का उद्देश्य
19 मार्च को चुनाव आयोग ने सभी संबंधित अधिकारियों—जैसे मुख्य निर्वाचन अधिकारी, पुलिस नोडल अधिकारी, आईटी नोडल अधिकारी और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के प्रतिनिधियों—के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक भी की।
इस बैठक का मुख्य उद्देश्य था:
- फेक न्यूज और गलत सूचना पर समय रहते रोक लगाना
- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही तय करना
- चुनावी प्रक्रिया को सुरक्षित और निष्पक्ष बनाना

