धारवाड़ ज़िले के कुंदगोल तालुक का एक छोटा-सा गांव — तीर्थ — आज अंतरराष्ट्रीय मंच पर चर्चा का केंद्र बन गया है। यहां का बीबी फातिमा महिला स्वयं सहायता समूह (SHG), जो 15 ग्रामीण महिलाओं के प्रयास से 2018 में स्थापित हुआ था, ने अपने नवोन्मेषी कार्यों और सतत कृषि पहलों के लिए संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा दिए जाने वाले इक्वेटर पुरस्कार 2025 को जीतकर देश का नाम रोशन किया है। यह पुरस्कार जैव-विविधता संरक्षण के “नोबेल पुरस्कार” के रूप में जाना जाता है।
इक्वेटर पुरस्कार: वैश्विक मान्यता का प्रतीक
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) हर दो साल में यह पुरस्कार उन स्थानीय और आदिवासी समुदायों को प्रदान करता है, जो प्रकृति-आधारित समाधानों के जरिए सतत विकास और पारिस्थितिकीय लचीलापन (Ecological Resilience) को बढ़ावा देते हैं।
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2025 की थीम: प्रकृति-आधारित जलवायु कार्रवाई के लिए महिला और युवा नेतृत्व
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विजेता देशों: अर्जेंटीना, ब्राज़ील, इक्वाडोर, इंडोनेशिया, केन्या, पापुआ न्यू गिनी, पेरू, तंजानिया और भारत
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कुल विजेता: 10
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पुरस्कार राशि: 10,000 अमेरिकी डॉलर (लगभग ₹8.5 लाख)
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प्रतिस्पर्धा पैमाना: 103 देशों से 700 नामांकन
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घोषणा तिथि: 9 अगस्त (अंतर्राष्ट्रीय विश्व आदिवासी दिवस)
यह पुरस्कार न केवल एक संगठन के काम को मान्यता देता है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि स्थानीय समुदाय, जलवायु संकट के समाधान में सबसे बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
बीबी फातिमा SHG की यात्रा: 15 महिलाओं से अंतरराष्ट्रीय मंच तक
स्थापना वर्ष: 2018
सदस्य संख्या (शुरुआत में): 15 महिलाएं
मार्गदर्शन: सहज समृद्धा संगठन
सहयोगी संस्थाएं:
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भारतीय बाजरा अनुसंधान संस्थान (IIMR), हैदराबाद – तकनीकी सहयोग और शोध समर्थन
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CROPS4HD – मानव पोषण के लिए फसल विविधता बढ़ाने में सहयोग
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सेल्को फाउंडेशन – मिलेट प्रोसेसिंग के लिए सौर ऊर्जा तकनीक उपलब्ध कराना
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देवधान्य किसान उत्पादक कंपनी – ग्रामीण उद्यमिता और बाज़ार संपर्क
ग्रामीण विकास और पर्यावरण संरक्षण की मिसाल
बीबी फातिमा SHG ने अपने कार्यों में यह सिद्ध किया है कि महिला नेतृत्व और स्थानीय संसाधनों का सतत उपयोग मिलकर न केवल आजीविका के अवसर पैदा कर सकते हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में भी अहम योगदान दे सकते हैं।
मुख्य उपलब्धियां:
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वर्षा आधारित भूमि में पर्यावरण-अनुकूल खेती – रासायनिक उर्वरकों के बजाय जैविक खाद और पारंपरिक खेती तकनीकों का उपयोग।
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सामुदायिक बीज बैंक की स्थापना – पारंपरिक और स्थानीय बीज किस्मों को संरक्षित कर अगली पीढ़ियों के लिए उपलब्ध कराना।
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बाजरा (मिलेट) का पुनर्जीवन – उत्पादन, प्रसंस्करण और प्रचार के माध्यम से पोषण और किसानों की आय में वृद्धि।
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ग्रामीण उद्यमिता विकास – स्थानीय महिलाओं को मिलेट उत्पादों के मूल्य संवर्धन और मार्केटिंग में प्रशिक्षित करना।
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बाज़ार संपर्क – स्थानीय उत्पादों को शहरी बाज़ार और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म तक पहुंचाना।
बाजरा मिशन: पोषण और आजीविका का संगम
बाजरा को “सुपर फूड” के रूप में बढ़ावा देने में बीबी फातिमा SHG की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है।
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बाजरा उत्पादन से कम पानी और कम लागत में अधिक उपज मिली।
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पोषण मूल्य के कारण स्थानीय समुदाय के स्वास्थ्य में सुधार हुआ।
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प्रसंस्करण और पैकेजिंग के जरिए उत्पादों का मूल्य बढ़ा, जिससे महिलाओं की आय में सीधी वृद्धि हुई।
सेल्को फाउंडेशन द्वारा सौर ऊर्जा से संचालित प्रोसेसिंग यूनिट ने इन महिलाओं को ऊर्जा-कुशल और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादन का विकल्प दिया।
वैश्विक मंच पर भारत की आवाज
इक्वेटर पुरस्कार के तहत बीबी फातिमा SHG को न केवल नकद राशि मिली, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों, वर्कशॉप और प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर भी मिलेगा। यह उन्हें अन्य देशों के सफल मॉडलों से सीखने और अपने काम को और व्यापक बनाने में मदद करेगा।
भविष्य की योजनाएं
पुरस्कार जीतने के बाद समूह की अगली रणनीति है:
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आस-पास के गांवों में अपने मॉडल का विस्तार
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अधिक महिलाओं को प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनाना
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जलवायु-स्मार्ट खेती तकनीकों को अपनाना
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अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में अपने उत्पादों की ब्रांडिंग और बिक्री
निष्कर्ष
बीबी फातिमा महिला स्वयं सहायता समूह की कहानी इस बात का जीवंत उदाहरण है कि सशक्त महिलाएं और संगठित समुदाय मिलकर किसी भी बड़े बदलाव की शुरुआत कर सकते हैं। यह उपलब्धि केवल एक गांव या एक संगठन की नहीं, बल्कि पूरे भारत की है।
संयुक्त राष्ट्र का यह सम्मान दुनिया को याद दिलाता है कि जलवायु परिवर्तन के समाधान, विकास की कुंजी और सतत भविष्य — सब स्थानीय समुदायों के हाथ में हैं।
