भारत सरकार ने बगैर सार्वजनिक कर्ज़ बढ़ाए बुनियादी ढाँचे (Infrastructure) के लिए वित्त जुटाने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। वित्त वर्ष 2025 (FY25) तक सरकार ने ₹1,42,758 करोड़ एसेट मोनेटाइजेशन (Asset Monetisation) के ज़रिए जुटाए हैं। इसके लिए टोल-ऑपरेट-ट्रांसफर (ToT), इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (InvIT) और सिक्यूरिटाइजेशन जैसे आधुनिक वित्तीय मॉडल का उपयोग किया गया है। यह रणनीति न केवल निजी निवेशकों के लिए दीर्घकालिक अवसर उपलब्ध कराती है, बल्कि सार्वजनिक ढाँचे के विस्तार को भी सुनिश्चित करती है।
एसेट मोनेटाइजेशन का उद्देश्य
सरकार का उद्देश्य है कि मौजूदा सार्वजनिक संपत्तियों से पूंजी प्राप्त कर नए इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में निवेश किया जाए। इससे सरकार पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ (Fiscal Burden) नहीं पड़ता और निवेश की ज़रूरतें पूरी होती हैं।
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कुल राशि जुटाई गई (FY25 तक): ₹1,42,758 करोड़
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FY25 का अनुमानित लक्ष्य: ₹30,000 करोड़
यह उपलब्धि सरकार की व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत सार्वजनिक ढाँचे को आधुनिक बनाने के लिए एसेट मोनेटाइजेशन को अहम साधन माना गया है।
तीन बड़े मॉडल जिनसे जुटाए गए फंड
1. टोल-ऑपरेट-ट्रांसफर (Toll-Operate-Transfer – ToT)
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इस मॉडल में तैयार हाईवे प्रोजेक्ट्स को निजी कंपनियों को तय समय (15 से 30 साल) के लिए सौंपा जाता है।
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इसके लिए ओपन मार्केट बिडिंग होती है और जो कंपनी रिज़र्व प्राइस से अधिक बोली लगाती है, उसे अनुबंध दिया जाता है।
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इससे सरकार को तुरंत नकद राशि (Liquidity) मिलती है, जिसका उपयोग नए प्रोजेक्ट्स में किया जा सकता है।
➡ उदाहरण: कई राष्ट्रीय राजमार्ग (NH) प्रोजेक्ट्स ToT मॉडल के अंतर्गत निजी कंपनियों को सौंपे गए हैं।
2. इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (InvIT)
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नेशनल हाईवे इंफ्रा ट्रस्ट (NHIT) इस मॉडल को संचालित करता है।
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इसमें सड़क परियोजनाओं को 15–30 साल के लिए NHIT को सौंपा जाता है।
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NHIT इन प्रोजेक्ट्स से होने वाली आय के आधार पर बॉन्ड्स जारी करता है और SEBI के नियमन के तहत निवेशकों को यूनिट बेचता है।
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ऑफर प्राइस की तुलना रिज़र्व प्राइस से की जाती है, ताकि सरकार को अधिकतम मूल्य प्राप्त हो सके।
➡ यह मॉडल पूंजी बाजार (Capital Market) से लंबे समय तक निवेश जुटाने में सहायक साबित हो रहा है।
3. सिक्यूरिटाइजेशन (Securitisation)
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इस मॉडल में भविष्य की आय (जैसे टोल रेवेन्यू) को आधार बनाकर बैंक और वित्तीय संस्थानों से लोन या बॉन्ड्स के ज़रिए फंड जुटाए जाते हैं।
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दिल्ली–मुंबई एक्सप्रेसवे जैसी परियोजनाओं के टोल रेवेन्यू को सिक्यूरिटाइज करके फंड प्राप्त किया गया है।
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इसके लिए विशेष प्रयोजन वाहन (Special Purpose Vehicles – SPVs) बनाए जाते हैं, जो निवेशकों और ऋणदाताओं के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं।
➡ यह मॉडल लंबी अवधि के लिए स्थिर वित्त जुटाने का भरोसेमंद तरीका है।
एसेट मोनेटाइजेशन के फायदे
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पूंजी का पुनर्चक्रण (Capital Recycling):
मौजूदा संपत्तियों से नकद राशि प्राप्त कर नए प्रोजेक्ट्स में निवेश संभव होता है। -
निजी निवेश आकर्षण (Private Investment):
लंबे समय के लिए स्थिर रिटर्न की संभावना होने से निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ती है। -
राजकोषीय अनुशासन (Fiscal Discipline):
सरकार को नए कर्ज़ लिए बिना विकास योजनाएँ आगे बढ़ाने का अवसर मिलता है। -
बुनियादी ढाँचे का विस्तार (Infrastructure Expansion):
जुटाई गई राशि से नए हाईवे, एक्सप्रेसवे और अन्य सार्वजनिक ढाँचे का निर्माण तेज़ी से होता है।
निष्कर्ष
भारत सरकार का एसेट मोनेटाइजेशन कार्यक्रम यह दिखाता है कि कैसे रणनीतिक रूप से मौजूदा संपत्तियों का उपयोग कर बिना अतिरिक्त कर्ज़ लिए विकास को गति दी जा सकती है। ToT, InvIT और Securitisation जैसे मॉडल पूंजी जुटाने में कारगर साबित हो रहे हैं और भविष्य में भी इन्हें और बड़े पैमाने पर अपनाया जा सकता है।
₹1.42 लाख करोड़ की यह उपलब्धि आने वाले समय में भारत की इन्फ्रास्ट्रक्चर यात्रा को और मज़बूत करेगी तथा वैश्विक निवेशकों के लिए भारत को एक आकर्षक गंतव्य बनाएगी।

