साल 2025 मशहूर कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन की जन्म शताब्दी का वर्ष है। उन्हें “भारत की हरित क्रांति के जनक” और “भारत को अन्नदाता बनाने वाले वैज्ञानिक” के रूप में जाना जाता है। उनके नेतृत्व और दूरदर्शिता ने भारत को 1960 के दशक की भयंकर खाद्य संकट से उबरने में मदद की और देश को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बना दिया। हाल ही में प्रियंबदा जयकुमार द्वारा लिखित जीवनी “M.S. Swaminathan: The Man Who Fed India” उनके असाधारण योगदान और भारत के कृषि भविष्य के लिए स्थायी सबक को रेखांकित करती है।
हरित क्रांति से पहले भारत का खाद्य संकट
आयात पर निर्भरता
1960 के दशक में भारत भयंकर खाद्य संकट का सामना कर रहा था। देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा अमेरिका से गेहूं आयात कर पूरा करता था, जो पब्लिक लॉ 480 (PL 480) कार्यक्रम के तहत भेजा जाता था। इस पर निर्भरता को “ship-to-mouth existence” कहा गया, क्योंकि भारत की जनता का पेट विदेशी जहाज़ों से आने वाले गेहूं पर टिका था। अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन ने तो कई बार इन आपूर्तियों को राजनीतिक दबाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया, जैसे वियतनाम युद्ध पर भारत की स्थिति को प्रभावित करने के लिए।
अकाल से सबक
1943 का बंगाल का भयंकर अकाल पहले ही यह सिखा चुका था कि खाद्य सुरक्षा के बिना राष्ट्रीय सुरक्षा संभव नहीं है। 1960 के दशक के मध्य तक भारत के लिए एक बड़े कृषि वैज्ञानिक突破 (ब्रेकथ्रू) की सख्त जरूरत थी।
वैज्ञानिक चमत्कार: बौनी गेहूं की किस्म
शुरुआती असफलताएँ और जिद
डॉ. स्वामीनाथन ने शुरुआत में म्यूटाजेनेसिस तकनीक (रेडिएशन से जीन में बदलाव) द्वारा भारतीय गेहूं को मजबूत बनाने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। लेकिन वे असफलताओं से हारे नहीं।
“नोरिन-10” की खोज
1958 में उन्हें पता चला कि जापान में विकसित एक बौनी गेहूं की किस्म “Norin 10” में छोटे लेकिन मजबूत तने हैं, जो अधिक दानों का भार सह सकते हैं। इसी दौरान मेक्सिको में अमेरिकी वैज्ञानिक नॉर्मन बोरलॉग भी उष्णकटिबंधीय परिस्थितियों के अनुकूल उच्च उत्पादक गेहूं पर काम कर रहे थे। स्वामीनाथन ने उनसे संपर्क किया और उन्हें भारत आने के लिए राजी किया।
भारत में परीक्षण और बड़े पैमाने पर आयात
1963 में नॉर्मन बोरलॉग भारत आए और स्वामीनाथन के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर फील्ड ट्रायल शुरू हुए। 1966 में भारत ने मेक्सिको से 18,000 टन गेहूं बीज आयात किए—यह इतिहास का सबसे बड़ा बीज आयात था। प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और कृषि मंत्री सी. सुब्रमण्यम ने इस कदम का राजनीतिक समर्थन किया, जिससे कार्यक्रम सफल हुआ।
हरित क्रांति की सफलता और प्रभाव
1968 तक भारत ने रिकॉर्ड गेहूं उत्पादन किया और अमेरिका से आयात पर निर्भरता कम हो गई।
देश ने खाद्यान्न आत्मनिर्भरता हासिल की और करोड़ों लोगों को भुखमरी से बचाया।
डॉ. स्वामीनाथन हमेशा कहते थे—
“आत्मनिर्भरता का मतलब अलगाव नहीं, बल्कि सही अनुकूलन और सहयोग है।”
हालाँकि, उन्होंने हरित क्रांति के पर्यावरणीय दुष्प्रभावों की चेतावनी भी दी—
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अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों का उपयोग,
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मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट,
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भूजल का अंधाधुंध दोहन।
वे हमेशा कहते थे कि हरित क्रांति को सतत हरित क्रांति में बदलना होगा।
स्वामीनाथन की यात्रा से सीख
1. विज्ञान और राजनीतिक नेतृत्व का साथ
तकनीकी निर्णय केवल वैज्ञानिकों के हाथ में होना चाहिए और उन्हें सीधे नीति-निर्माताओं से जोड़ना चाहिए।
उदाहरण: प्रधानमंत्री शास्त्री खुद IARI के खेतों में पहुंचे और अधिकारियों के विरोध के बावजूद बीज आयात का समर्थन किया।
2. निर्णायक जोखिम लेना ज़रूरी
1960 के दशक में 5 करोड़ रुपये के गेहूं बीज आयात का फैसला जोखिम भरा था। वित्त मंत्रालय, योजना आयोग और वामपंथी नेताओं का विरोध था। लेकिन यह निर्णय ऐतिहासिक साबित हुआ।
3. वैज्ञानिक स्वायत्तता और संस्थागत मजबूती
आज भारत का कृषि अनुसंधान नेतृत्व कमजोर हुआ है।
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दुनिया के शीर्ष 10 कृषि अनुसंधान संस्थानों में चीन के 8 हैं, लेकिन भारत का कोई नहीं है।
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भारत अपनी कृषि GDP का केवल 0.43% R&D पर खर्च करता है, जबकि चीन दोगुना निवेश करता है।
स्पष्ट है कि भारत को संस्थागत मजबूती और वैज्ञानिक स्वायत्तता पर फिर से जोर देना होगा।
निष्कर्ष
डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन की विरासत केवल अतीत की उपलब्धि नहीं, बल्कि भविष्य की प्रेरणा है। उन्होंने दिखाया कि कैसे विज्ञान, राजनीतिक इच्छाशक्ति और किसानों के परिश्रम से खाद्यान्न संकट को अवसर में बदला जा सकता है। उनकी जन्म शताब्दी हमें याद दिलाती है कि सतत कृषि, नवाचार और विज्ञान-नीति सहयोग ही आने वाले समय में भारत की खाद्य सुरक्षा और कृषि समृद्धि का आधार होंगे।

