भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नेतृत्व को और मज़बूत करने के रणनीतिक कदम के तहत केंद्र सरकार ने 1988 बैच के मणिपुर कैडर के आईपीएस अधिकारी आनिश दयाल सिंह को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (Deputy NSA) के रूप में नियुक्त किया है। 60 वर्षीय सिंह सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल को रिपोर्ट करेंगे। यह पद राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है और आने वाले वर्षों में देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा नीतियों को नई दिशा देगा।
कौन हैं आनिश दयाल सिंह?
पृष्ठभूमि और प्रारंभिक करियर
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जन्म: 1964, प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)
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1988 में भारतीय पुलिस सेवा (IPS) में शामिल हुए।
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हैदराबाद स्थित सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी में प्रशिक्षण प्राप्त किया।
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करियर की शुरुआत मणिपुर में की, जहाँ उन्हें शुरुआती दौर में ही उग्रवाद-रोधी अभियानों और सीमा प्रबंधन का अनुभव मिला।
उनके शुरुआती करियर ने उन्हें यह समझने का मौका दिया कि न केवल आंतरिक सुरक्षा बल्कि सीमावर्ती इलाकों में कार्य करना कितना चुनौतीपूर्ण होता है।
केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों में योगदान
2000 के दशक की शुरुआत में सिंह को इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) में प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया। आईबी में काम करते हुए उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई अहम पहलुओं पर गहन अनुभव हासिल किया। यही अनुभव बाद में उन्हें केंद्रीय अर्द्धसैनिक बलों के नेतृत्व तक ले गया।
प्रमुख भूमिकाएँ और योगदान
आईटीबीपी और सीआरपीएफ का नेतृत्व
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सिंह ने भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के महानिदेशक के रूप में सेवा की।
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दिसंबर 2023 में उन्हें देश के सबसे बड़े अर्द्धसैनिक बल केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF) का प्रमुख नियुक्त किया गया।
सीआरपीएफ देश की आंतरिक सुरक्षा, नक्सल-रोधी अभियानों और चुनाव सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने वाला सबसे अहम बल है।
सीआरपीएफ में अहम पहलें
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नक्सल-रोधी अभियान
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नक्सल प्रभावित इलाकों में 36 से अधिक फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस (FOBs) स्थापित किए।
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4 नई बटालियनों की तैनाती की, जिससे 4,000 से अधिक अतिरिक्त जवान नक्सल क्षेत्रों में सक्रिय हुए।
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चुनाव सुरक्षा
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2024 के लोकसभा चुनाव और जम्मू-कश्मीर में आयोजित पहले विधानसभा चुनाव को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने में सीआरपीएफ की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
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बल पुनर्गठन
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130 से अधिक बटालियनों का पुनर्संरचना किया गया।
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लॉजिस्टिक्स और कल्याण योजनाओं को बेहतर बनाया गया।
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बटालियनों की औसत दूरी 1200 किमी से घटाकर 500 किमी की गई, जिससे तैनाती और प्रतिक्रिया क्षमता में उल्लेखनीय सुधार हुआ।
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‘संवाद’ सत्र
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जवानों और जूनियर अधिकारियों से फीडबैक लेने के लिए संवाद-आधारित सत्र शुरू किए।
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इस पहल से जवानों का मनोबल बढ़ा और निर्णय लेने की प्रक्रिया ज्यादा ज़मीनी और व्यावहारिक बनी।
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रणनीतिक महत्व
आनिश दयाल सिंह की नियुक्ति को भारत के सुरक्षा ढांचे में कई मायनों में अहम माना जा रहा है।
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आंतरिक सुरक्षा और उग्रवाद-रोधी रणनीति
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नक्सल-रोधी अभियानों और उग्रवाद-प्रभावित इलाकों में उनके अनुभव से सरकार को रणनीतिक बढ़त मिलेगी।
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अर्द्धसैनिक बलों का प्रबंधन और पुनर्गठन
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सीआरपीएफ और आईटीबीपी जैसे बड़े बलों के प्रबंधन का उनका अनुभव उप NSA के तौर पर समन्वयकारी भूमिका निभाने में मदद करेगा।
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सीमा और चुनाव सुरक्षा
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सीमा प्रबंधन और चुनाव सुरक्षा की जटिलताओं को समझने का उनका अनुभव भविष्य की रणनीति निर्माण में उपयोगी होगा।
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एजेंसियों के बीच समन्वय
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आईबी में प्रतिनियुक्ति और अर्द्धसैनिक बलों में नेतृत्व करने के कारण उन्हें खुफिया और ऑपरेशनल एजेंसियों के बीच समन्वय की गहरी समझ है।
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आगे की चुनौतियाँ और संभावनाएँ
भारत वर्तमान में बहुआयामी सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है —
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साइबर सुरक्षा और सूचना युद्ध
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सीमा पर चीन और पाकिस्तान से बढ़ती चुनौतियाँ
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आतंकी गतिविधियाँ और उग्रवाद
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आंतरिक अशांति और नक्सलवाद
इन परिस्थितियों में उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में आनिश दयाल सिंह की भूमिका निर्णायक होगी। उनकी नियुक्ति से भारत की बहु-स्तरीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारी व्यवस्था और अधिक सुदृढ़ होने की उम्मीद है।
निष्कर्ष
आनिश दयाल सिंह की नियुक्ति केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का हिस्सा है। उनके व्यापक मैदानी अनुभव, अर्द्धसैनिक बलों के प्रबंधन में दक्षता और खुफिया एजेंसियों में कार्य का अनुभव उन्हें इस भूमिका के लिए उपयुक्त बनाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि उनके नेतृत्व में भारत की सुरक्षा नीतियाँ और मज़बूत होंगी तथा देश की आंतरिक और बाहरी चुनौतियों से निपटने की क्षमता और अधिक प्रभावी बनेगी।

