काकेशस क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक क्षण में, अज़रबैजान और आर्मेनिया ने शुक्रवार को व्हाइट हाउस में एक ऐतिहासिक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते ने विवादित नागोर्नो-काराबाख क्षेत्र को लेकर दशकों से चले आ रहे संघर्ष और हिंसा को औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया है।
यह शिखर सम्मेलन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मेज़बानी में हुआ, जिन्होंने इस क्षण को “ऐतिहासिक” और “काफी समय से प्रतीक्षित” बताते हुए इसका स्वागत किया। इस समझौते से दोनों देशों के बीच न केवल शांति स्थापित होगी, बल्कि व्यापार, यात्रा और कूटनीतिक संबंधों के नए रास्ते भी खुलेंगे।
शांति समझौते के प्रमुख बिंदु
इस बहुप्रतीक्षित समझौते में कई महत्वपूर्ण शर्तें शामिल हैं, जिनका उद्देश्य दोनों देशों के बीच स्थायी शांति और सहयोग को बढ़ावा देना है:
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सभी शत्रुता और सैन्य संघर्षों का पूर्ण और स्थायी अंत।
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व्यापार और यात्राओं को पुनः शुरू करने के लिए सीमाओं का खुलना।
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नया ट्रांज़िट कॉरिडोर: अज़रबैजान और उसके नख़चिवान एन्क्लेव को जोड़ने वाला कॉरिडोर अब अमेरिकी सहायता से विकसित किया जाएगा, जिसे आधिकारिक रूप से “Trump Route for International Peace and Prosperity” कहा गया है।
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संयुक्त निगरानी व्यवस्था: कॉरिडोर के निर्माण और संचालन में अमेरिकी भागीदारी सुनिश्चित की गई है, ताकि दोनों देशों के हितों की रक्षा हो सके।
संघर्ष की पृष्ठभूमि: दशकों की दुश्मनी
अज़रबैजान और आर्मेनिया के बीच यह संघर्ष 1980 के दशक के अंत से चला आ रहा है, जब सोवियत संघ के विघटन के बाद दोनों देशों ने नागोर्नो-काराबाख क्षेत्र पर दावा करना शुरू किया। यह क्षेत्र अज़रबैजान के भीतर स्थित है, लेकिन यहां की बहुसंख्यक आबादी जातीय रूप से आर्मेनियाई है।
1990 के दशक में इस मुद्दे को लेकर एक भीषण युद्ध हुआ जिसमें हजारों लोग मारे गए और लाखों बेघर हुए। 1994 में युद्धविराम हुआ, लेकिन स्थायी शांति कभी नहीं आई। 2020 में फिर से युद्ध भड़का, जिसमें अज़रबैजान ने कई इलाकों पर कब्जा कर लिया। दोनों देशों के बीच हमेशा से तनाव बना रहा, और किसी भी समय संघर्ष भड़कने की आशंका रहती थी।
नख़चिवान कॉरिडोर: विवाद का सबसे बड़ा बिंदु
इस संघर्ष का एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद पहलू रहा है नख़चिवान कॉरिडोर—एक परिवहन मार्ग जो अज़रबैजान को उसके स्वायत्त नख़चिवान क्षेत्र से जोड़ेगा, लेकिन जो आर्मेनियाई भूमि से होकर गुजरता है।
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अज़रबैजान की मांग: एक निर्बाध गलियारा जो उसकी मुख्य भूमि को सीधे नख़चिवान से जोड़े।
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आर्मेनिया की आपत्ति: वह किसी भी प्रकार की संप्रभुता में कमी स्वीकार करने को तैयार नहीं था।
इस समझौते के अंतर्गत यह कॉरिडोर अब संयुक्त निगरानी के तहत बनेगा और अमेरिका की सहभागिता यह सुनिश्चित करेगी कि कोई पक्ष इसे बलपूर्वक न ले सके।
अमेरिकी कूटनीति और रूस की भूमिका में गिरावट
यह समझौता अमेरिकी मध्यस्थता की एक बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है। दशकों से रूस इस क्षेत्र में प्रमुख मध्यस्थ रहा है। खासतौर पर व्लादिमीर पुतिन की सरकार ने पूर्व में दोनों पक्षों के बीच समझौते कराने में भूमिका निभाई थी।
लेकिन इस बार, अज़रबैजान और आर्मेनिया दोनों ने रूसी प्रस्तावों को ठुकरा कर अमेरिकी पहल को चुना। इससे यह साफ हो गया है कि अब काकेशस क्षेत्र में रूस की पकड़ कमजोर पड़ रही है, और अमेरिका अपनी कूटनीतिक स्थिति को मजबूत कर रहा है।
विशेष रूप से दिलचस्प यह है कि यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब ट्रम्प अगले सप्ताह अलास्का में पुतिन से मुलाकात करने वाले हैं। यह वार्ता वैश्विक राजनीति के लिहाज से और भी अधिक अहम हो गई है।
भविष्य की राह: चुनौतियाँ और संभावनाएं
जहां यह समझौता एक सकारात्मक कदम है, वहीं इसके क्रियान्वयन में चुनौतियां भी हैं:
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स्थानीय स्तर पर विरोध: दोनों देशों में कट्टरपंथी गुट इस समझौते का विरोध कर सकते हैं।
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कॉरिडोर की सुरक्षा: व्यावहारिक रूप से नख़चिवान कॉरिडोर की सुरक्षा और संचालन में कई पक्ष शामिल होंगे।
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राजनीतिक अस्थिरता: अगर किसी देश की सरकार बदली, तो समझौते की स्थिति पर असर पड़ सकता है।
फिर भी, यह समझौता काकेशस क्षेत्र में स्थायित्व और समृद्धि की दिशा में एक बड़ा और साहसिक कदम माना जा रहा है।
निष्कर्ष: क्या शांति टिकेगी?
अज़रबैजान और आर्मेनिया के बीच यह ऐतिहासिक समझौता केवल एक कागज़ी दस्तावेज़ नहीं, बल्कि नई शुरुआत की नींव है। दशकों के खून-खराबे के बाद अब जब दोनों देश शांति, सहयोग और समृद्धि की ओर बढ़ रहे हैं, तो यह केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर एक प्रेरणादायक कहानी बन सकती है।
व्हाइट हाउस में हुए इस हस्ताक्षर ने न केवल दो देशों को जोड़ा, बल्कि यह संदेश भी दिया कि राजनयिक समाधान अब भी संभव हैं, बशर्ते इच्छाशक्ति हो।

