बांग्लादेश बना संयुक्त राष्ट्र जल अभिसमय (UN Water Convention) से जुड़ने वाला पहला दक्षिण एशियाई देश
बांग्लादेश बना संयुक्त राष्ट्र जल अभिसमय (UN Water Convention) से जुड़ने वाला पहला दक्षिण एशियाई देश

बांग्लादेश बना संयुक्त राष्ट्र जल अभिसमय से जुड़ने वाला पहला दक्षिण एशियाई देश

2025 में बांग्लादेश ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए आधिकारिक रूप से संयुक्त राष्ट्र जल अभिसमय (UN Water Convention) को स्वीकार कर लिया है। इस निर्णय के साथ वह ऐसा करने वाला पहला दक्षिण एशियाई देश बन गया है। यह कदम दक्षिण एशिया में जल कूटनीति (Water Diplomacy) और क्षेत्रीय सीमापार जल प्रबंधन (Transboundary Water Governance) की दिशा में एक बड़ा परिवर्तन माना जा रहा है।

बांग्लादेश का यह फैसला विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत के साथ उसके मौजूदा द्विपक्षीय जल-साझाकरण समझौतों को भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर सकता है। जब दुनिया जलवायु परिवर्तन और जल संकट के दौर से गुजर रही है, तब बांग्लादेश ने एक बहुपक्षीय कानूनी ढांचे के माध्यम से अपने जल हितों की सुरक्षा का रास्ता चुना है।


 क्या है संयुक्त राष्ट्र जल अभिसमय?

संयुक्त राष्ट्र जल अभिसमय का पूरा नाम है —
“Convention on the Protection and Use of Transboundary Watercourses and International Lakes”
यह एक कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय संधि है, जिसका उद्देश्य साझा नदियों, झीलों और जलभृतों (Aquifers) के सतत और न्यायसंगत उपयोग को सुनिश्चित करना है।

  • स्वीकृत (Adopted): 1992, हेलसिंकी

  • प्रवर्तन (Came into force): 1996

  • संरक्षक निकाय: संयुक्त राष्ट्र यूरोपीय आर्थिक आयोग (UNECE)

  • वैश्विक पहुंच: 2016 से यह सभी यूएन सदस्य देशों के लिए खुला है

इस अभिसमय का मूल लक्ष्य यह है कि दो या अधिक देशों के बीच साझा जल निकायों का उपयोग और प्रबंधन सहयोग, समानता और विवाद-निवारण के सिद्धांतों पर आधारित हो।


 अभिसमय की प्रमुख विशेषताएँ

  1. सहकारी शासन (Cooperative Governance):
    साझा जल संसाधनों के प्रबंधन के लिए सदस्य देशों को औपचारिक समझौते और संयुक्त संस्थानों की स्थापना करनी होती है।

  2. समान उपयोग का सिद्धांत (Equitable Utilization):
    हर देश को जल संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग का अधिकार है, परंतु ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाना चाहिए जिससे दूसरे देश को गंभीर नुकसान पहुँचे।

  3. विवाद निवारण प्रणाली (Conflict Prevention):
    यह अभिसमय सदस्य देशों के बीच विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने के लिए एक संस्थागत ढांचा प्रदान करता है।

  4. एसडीजी संरेखण (SDG Alignment):
    यह संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्य (SDG 6.5) — “एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन” को आगे बढ़ाता है और साथ ही खाद्य सुरक्षा (SDG 2), जलवायु कार्रवाई (SDG 13) और शांतिपूर्ण संस्थानों (SDG 16) जैसे लक्ष्यों को भी समर्थन देता है।

  5. वैश्विक समावेशन (Global Inclusion):
    हाल के वर्षों में चाड, घाना, इराक, नाइजीरिया, गाम्बिया, नामीबिया और पनामा जैसे देशों ने भी इस अभिसमय को स्वीकार किया है, जिससे इसका वैश्विक प्रभाव बढ़ा है।


 बांग्लादेश की रणनीतिक प्रेरणा

बांग्लादेश भौगोलिक रूप से ऐसी स्थिति में है जहाँ वह भारत के साथ 54 नदियाँ साझा करता है — जिनमें तीस्ता, गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना जैसी नदियाँ शामिल हैं।
ये नदियाँ बांग्लादेश की कृषि, पेयजल आपूर्ति और पारिस्थितिक संतुलन के लिए जीवनरेखा हैं।

हालांकि, तीस्ता जल समझौते में वर्षों से हो रही देरी और ऊपरी धारा (Upstream) से जल उपयोग बढ़ने के कारण बांग्लादेश की चिंताएँ बढ़ गई हैं।
इन परिस्थितियों में यूएन वाटर कन्वेंशन से जुड़ना, बांग्लादेश के लिए तीन बड़े लाभ लेकर आया है —

  1. अंतरराष्ट्रीय मंच पर वैधानिक आवाज:
    अब बांग्लादेश अपने जल-संबंधी मुद्दे वैश्विक मंच पर उठा सकेगा।

  2. तकनीकी और नीति सहायता:
    यह अभिसमय देशों को तकनीकी सहयोग और जल शासन (Water Governance) सुधार के लिए अंतरराष्ट्रीय सहायता तंत्र तक पहुँच प्रदान करता है।

  3. राजनयिक गठबंधन:
    अन्य सदस्य देशों के साथ साझेदारी बनाकर बांग्लादेश अपने हितों की रक्षा के लिए नए रणनीतिक गठजोड़ कर सकेगा।


 भारत और क्षेत्रीय जल कूटनीति पर प्रभाव

भारत ने अब तक यूएन वाटर कन्वेंशन को स्वीकार नहीं किया है।
भारत का दृष्टिकोण यह है कि सीमापार जल विवादों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाने से राजनयिक लचीलापन (Diplomatic Flexibility) कम हो सकता है।
इसलिए भारत द्विपक्षीय संधियों के माध्यम से ही ऐसे मुद्दों को सुलझाना पसंद करता है, जैसे कि —

  • इंडस वाटर्स ट्रीटी (1960) — पाकिस्तान के साथ

  • गंगा जल साझा संधि (1996) — बांग्लादेश के साथ

भारत का तर्क यह है कि बेसिन स्तर या द्विपक्षीय संवाद ही जल विवादों का व्यावहारिक समाधान है, जबकि अंतरराष्ट्रीय संधियाँ अनावश्यक जटिलताएँ पैदा कर सकती हैं।

फिर भी, बांग्लादेश का यह कदम भारत के लिए एक संकेत है कि दक्षिण एशिया में जल कूटनीति का ढांचा बदल रहा है। भविष्य में नेपाल, भूटान और श्रीलंका जैसे देश भी ऐसी पहल पर विचार कर सकते हैं, जिससे क्षेत्रीय जल राजनीति का स्वरूप बहुपक्षीय हो सकता है।

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