वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच, भारत के 11 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) ने बचत खातों में न्यूनतम शेष राशि नहीं रखने पर ग्राहकों से लगभग ₹9,000 करोड़ का जुर्माना वसूला है। यह जानकारी वित्त मंत्रालय ने राज्यसभा में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा पूछे गए प्रश्न के लिखित उत्तर में साझा की।
इस खुलासे ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है — क्या यह जुर्माना बैंकिंग सेवा का जायज़ शुल्क है या फिर ग्रामीण और गरीब ग्राहकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ?
न्यूनतम शेष राशि: क्यों लगता है जुर्माना?
भारत में ज्यादातर सार्वजनिक और निजी बैंक खाताधारकों से एक “मासिक औसत न्यूनतम शेष राशि (MAB)” बनाए रखने की अपेक्षा करते हैं। यदि ग्राहक खाते में यह न्यूनतम राशि नहीं रख पाते हैं, तो बैंक पेनल्टी (जुर्माना) वसूलते हैं।
यह जुर्माना कुछ बैंकों में मासिक आधार पर और कुछ में तिमाही आधार पर लिया जाता था। हालांकि कुछ विशेष खातों को इस नियम से छूट दी गई है:
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प्रधानमंत्री जन धन योजना (PMJDY) के तहत खोले गए खाते
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बेसिक सेविंग बैंक डिपॉज़िट अकाउंट (BSBDA)
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वेतन (Salary) खाते
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सरकार द्वारा चिन्हित अन्य सामाजिक श्रेणी के खाते
भारतीय स्टेट बैंक ने सबसे पहले की पहल
भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने मार्च 2020 में ही यह जुर्माना वसूलना बंद कर दिया था। इसके बाद अन्य सार्वजनिक बैंकों ने भी इस दिशा में कदम उठाए। FY2025 के अंत तक 11 में से 7 सार्वजनिक बैंकों ने यह शुल्क पूरी तरह हटा दिया है:
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केनरा बैंक
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पंजाब नेशनल बैंक
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बैंक ऑफ बड़ौदा
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इंडियन बैंक
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बैंक ऑफ इंडिया
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सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया
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यूनियन बैंक ऑफ इंडिया
बाकी 4 बैंक भी जल्द इस दिशा में कार्रवाई करेंगे, ऐसा वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है।
वित्त मंत्रालय और RBI का रुख
राज्यसभा में जवाब देते हुए वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने कहा कि वित्तीय सेवा विभाग (DFS) ने बैंकों को जुर्माने के ढांचे को “युक्तिसंगत और पारदर्शी” बनाने की सलाह दी है।
विशेषकर अर्ध-शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के ग्राहकों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ कम करने पर DFS ने ज़ोर दिया है।
इसी के साथ भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने बैंकों को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं:
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बैंक केवल अपने बोर्ड द्वारा स्वीकृत नीति के अनुसार जुर्माना लगा सकते हैं।
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यह जुर्माना खाते में न्यूनतम आवश्यक राशि और वास्तविक राशि के बीच अंतर के आधार पर तय होना चाहिए।
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ग्राहक सेवा में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित होनी चाहिए।
क्या यह जुर्माना उचित है?
₹9,000 करोड़ का जुर्माना कोई मामूली राशि नहीं है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा दिया जा रहा है और हर नागरिक को बैंकिंग से जोड़ने का लक्ष्य है, तो क्या न्यूनतम बैलेंस जैसे प्रावधान तर्कसंगत हैं?
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शहरी क्षेत्रों के ग्राहकों के लिए ₹2,000 या ₹3,000 की न्यूनतम राशि बनाए रखना सामान्य बात हो सकती है।
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लेकिन ग्रामीण या गरीब वर्ग, जिनकी आय अस्थिर या बहुत सीमित होती है, उनके लिए यह बोझ बन जाता है।
यही वजह है कि कई बार यह जुर्माना अवसर की समानता के खिलाफ माना गया है।
निजी बैंक अभी पीछे हैं
जहाँ सार्वजनिक बैंकों ने जुर्माना हटाने की दिशा में पहल की है, वहीं निजी बैंक अब भी इस शुल्क को वसूल रहे हैं — और कई बार इनका जुर्माना सार्वजनिक बैंकों से कहीं ज्यादा होता है।
उदाहरण के लिए, कुछ निजी बैंक ₹500 तक की पेनल्टी वसूलते हैं, जो कि सीमित आय वाले ग्राहक के लिए काफी अधिक है।
निष्कर्ष: क्या बदलाव की ज़रूरत है?
बैंकों को सेवाएं बनाए रखने के लिए कुछ शुल्कों की ज़रूरत होती है, लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि ये शुल्क ग्राहक के भुगतान क्षमता और सामाजिक स्थिति के अनुसार तय किए जाएं।
न्यूनतम शेष राशि पर जुर्माना एक ऐसा मुद्दा है, जो बैंकिंग समावेशन के लक्ष्य और व्यावसायिक हितों के बीच संतुलन की माँग करता है।
जब देश “डिजिटल इंडिया” और “सबका साथ, सबका विकास” की बात करता है, तो यह आवश्यक है कि बैंकिंग सेवाएं पहुंच योग्य और सस्ती बनें — खासकर उन लोगों के लिए, जिनकी पहुँच अब तक सीमित रही है।

