BBNJ संधि जनवरी 2026 से होगी प्रभावी
BBNJ संधि जनवरी 2026 से होगी प्रभावी

BBNJ संधि जनवरी 2026 से होगी प्रभावी

वैश्विक महासागर शासन (Global Ocean Governance) की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज करते हुए बीबीएनजे संधि (BBNJ Treaty – Marine Biological Diversity of Areas Beyond National Jurisdiction) को आवश्यक 60 देशों की पुष्टि (Ratification) मिल चुकी है। इसके साथ ही यह संधि 17 जनवरी 2026 से प्रभावी हो जाएगी।
यह संधि संयुक्त राष्ट्र समुद्री क़ानून सम्मेलन (UNCLOS) के तहत विकसित की गई है और अंतर्राष्ट्रीय जलक्षेत्रों (High Seas) में समुद्री जैव विविधता संरक्षण को सुदृढ़ करेगी।


बीबीएनजे संधि क्या है?

बीबीएनजे संधि एक अंतरराष्ट्रीय कानूनी समझौता है जिसका उद्देश्य है:

  • राष्ट्रीय अधिकार-क्षेत्र (200 समुद्री मील की EEZ) से परे समुद्री जीवन की रक्षा करना।

  • महासागरीय संसाधनों के सतत उपयोग को बढ़ावा देना।

  • मरीन जेनेटिक रिसोर्सेज (MGR) से होने वाले लाभों का न्यायसंगत बंटवारा सुनिश्चित करना।

  • महासागर गतिविधियों के लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) को मानकीकृत करना।

यह संधि विशेष रूप से उन गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करती है जो खुले समुद्र और गहरे महासागर में हो रही हैं, जहाँ किसी भी एक देश का अधिकार नहीं होता।


संधि की मुख्य विशेषताएँ

1. मरीन प्रोटेक्टेड एरियाज़ (MPAs)

  • संधि के तहत समुद्री प्रजातियों और पारिस्थितिक तंत्र की रक्षा हेतु संरक्षित क्षेत्र बनाए जाएँगे।

  • वैश्विक MPA कवरेज को मौजूदा 6.35% से बढ़ाना लक्ष्य है।

  • “नो-टेक ज़ोन” (जहाँ शिकार, खनन या संसाधन दोहन वर्जित होगा) को 1.89% से अधिक बढ़ाया जाएगा

2. मरीन जेनेटिक रिसोर्सेज (MGR)

  • गहरे समुद्र में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीवों और एंजाइमों से दवाओं, जैव प्रौद्योगिकी और चिकित्सा में होने वाले लाभों का न्यायपूर्ण और समान वितरण सुनिश्चित होगा।

3. पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA)

  • गहरे समुद्र खनन, कार्बन भंडारण, समुद्री ऊर्जा परियोजनाओं जैसी गतिविधियों के लिए पूर्व-आकलन अनिवार्य होगा।

  • इससे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले संभावित खतरों को कम किया जा सकेगा।

4. क्लियरिंग-हाउस मैकेनिज़्म और वित्तीय ढाँचा

  • संधि के तहत एक केंद्रीकृत निगरानी तंत्र स्थापित किया जाएगा, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।

  • विकासशील देशों को पर्याप्त वित्तीय और तकनीकी सहायता भी प्रदान की जाएगी।


वैश्विक भागीदारी

  • अब तक 143 देशों ने इस संधि पर हस्ताक्षर किए हैं, जिनमें भारत भी शामिल है।

  • आवश्यक 60 देशों की पुष्टि पूरी हो चुकी है, जिससे इसका प्रवर्तन संभव हो गया है।

  • हाल ही में पुष्टि करने वाले देशों में श्रीलंका, मोरक्को, सिएरा लियोन और सेंट विंसेंट एंड ग्रेनाडाइंस शामिल हैं।

  • उम्मीद है कि 22 सितंबर 2025 से शुरू होने वाले संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) हाई-लेवल वीक के दौरान और भी देश इसकी पुष्टि करेंगे।


क्यों है यह संधि महत्वपूर्ण?

  1. जैव विविधता संरक्षण: खुले समुद्र पृथ्वी की सतह का लगभग आधा हिस्सा कवर करते हैं और वैश्विक जलवायु व पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं।

  2. सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्राप्ति: यह संधि संयुक्त राष्ट्र के SDG 14 (Life Below Water) को हासिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

  3. जलवायु परिवर्तन से निपटना: महासागर कार्बन सिंक के रूप में कार्य करते हैं। इनके संरक्षण से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में मदद मिलेगी।

  4. न्यायसंगत संसाधन बंटवारा: विकसित और विकासशील देशों के बीच समुद्री संसाधनों से होने वाले लाभों का संतुलन सुनिश्चित होगा।


चुनौतियाँ

हालाँकि बीबीएनजे संधि एक ऐतिहासिक उपलब्धि है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में कई चुनौतियाँ सामने आ सकती हैं:

  • गहरे समुद्र की निगरानी और नियमों को लागू करना कठिन होगा।

  • विकसित और विकासशील देशों के बीच लाभ-साझेदारी पर मतभेद उभर सकते हैं।

  • तकनीकी और वित्तीय संसाधनों की कमी से कई देशों के लिए इसे लागू करना चुनौतीपूर्ण होगा।

  • अवैध मछली पकड़ने और बिना अनुमति खनन जैसी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए सख्त वैश्विक सहयोग की आवश्यकता होगी।


आगे का रास्ता

बीबीएनजे संधि का प्रभावी कार्यान्वयन तभी संभव है जब:

  • सभी हस्ताक्षरकर्ता देश समय पर पुष्टि करें और अपने घरेलू कानूनों को संधि के अनुरूप ढालें।

  • एक मजबूत वैश्विक निगरानी तंत्र बनाया जाए।

  • विकासशील देशों को पर्याप्त वित्तीय सहायता और तकनीकी सहयोग दिया जाए।


मुख्य तथ्य (Quick Facts)

  • प्रवर्तन तिथि: 17 जनवरी 2026

  • हस्ताक्षरकर्ता देश: 143

  • पुष्टि करने वाले देश: 60

  • कवरेज: 200 समुद्री मील EEZ से बाहर का समुद्री जीवन

  • फोकस क्षेत्र: MPA, MGR लाभ-साझेदारी, EIA

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