भारत-श्रीलंका संस्कृत महोत्सव का उद्घाटन कोलंबो में: सांस्कृतिक सेतु के नए अध्याय
भारत-श्रीलंका संस्कृत महोत्सव का उद्घाटन कोलंबो में: सांस्कृतिक सेतु के नए अध्याय

भारत-श्रीलंका संस्कृत महोत्सव का उद्घाटन कोलंबो में: सांस्कृतिक सेतु के नए अध्याय

भारत और श्रीलंका के बीच हजारों वर्षों से सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई संबंध जुड़े रहे हैं। इन संबंधों को और गहराई देने के उद्देश्य से भारत–श्रीलंका संस्कृत महोत्सव 2025 का शुभारंभ 10 नवंबर 2025 को कोलंबो विश्वविद्यालय में किया गया। यह आयोजन न केवल दोनों देशों की साझी विरासत का उत्सव था, बल्कि संस्कृत जैसी प्राचीन भाषा के पुनर्जीवन और वैश्विक प्रसार की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल भी साबित हुआ।


संस्कृत – सभ्यता और ज्ञान की सेतु भाषा

संस्कृत को मानव सभ्यता की सबसे प्राचीन और पूजनीय भाषाओं में गिना जाता है। भारत और श्रीलंका दोनों ही देशों में इसका गहरा प्रभाव धार्मिक, दार्शनिक और शैक्षणिक परंपराओं में देखने को मिलता है। भारत–श्रीलंका संस्कृत महोत्सव इसी साझा विरासत को नए युग के अनुरूप पुनर्जीवित करने का माध्यम बना।

सप्ताहभर चले इस आयोजन में दोनों देशों के संस्कृत विद्वानों, भिक्षुओं, विद्यार्थियों और सांस्कृतिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसका उद्देश्य संस्कृत को केवल एक भाषा नहीं, बल्कि सभ्यता, सद्भाव और ज्ञान की सनातन कड़ी के रूप में स्थापित करना था।


आयोजन के प्रमुख सहयोगी संस्थान

यह संस्कृत महोत्सव भारत और श्रीलंका के कई प्रमुख संस्थानों के संयुक्त प्रयास से आयोजित हुआ, जिनमें शामिल हैं –

  • स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र (कोलंबो) – भारतीय उच्चायोग का सांस्कृतिक विभाग

  • श्रीलंका का शिक्षा और उच्च शिक्षा मंत्रालय

  • केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (भारत)

  • इंडिया–श्रीलंका फाउंडेशन

इन संस्थाओं के सम्मिलित प्रयास ने इस आयोजन को शैक्षणिक, आध्यात्मिक और कूटनीतिक आयामों से समृद्ध बनाया। यह महोत्सव संस्कृत को केवल अध्ययन का विषय नहीं, बल्कि जीवंत सांस्कृतिक सेतु के रूप में प्रस्तुत करता है।


उद्घाटन समारोह और प्रमुख हस्तियाँ

महोत्सव का उद्घाटन दो प्रमुख हस्तियों द्वारा किया गया –

  • श्री संतोष झा, भारत के श्रीलंका स्थित उच्चायुक्त

  • डॉ. मधुरा सेनविरत्ना, उप शिक्षा एवं उच्च शिक्षा मंत्री, श्रीलंका

इस अवसर पर उच्चायुक्त संतोष झा ने कहा कि “संस्कृत सदियों से भारत और श्रीलंका को जोड़ने वाला सांस्कृतिक पुल रही है। बौद्ध ग्रंथों से लेकर आधुनिक अध्ययनों तक, संस्कृत ने दोनों देशों के बीच आध्यात्मिक एकता को मजबूत किया है।”

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि आज के डिजिटल युग में संस्कृत के प्रति बढ़ती रुचि इस बात का संकेत है कि यह भाषा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं की भी कुंजी है।


महोत्सव की प्रमुख विशेषताएँ

भारत–श्रीलंका संस्कृत महोत्सव को ज्ञान, संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का जीवंत मंच बनाया गया। आयोजन की प्रमुख गतिविधियों में शामिल थे:

  1. संस्कृत बोलचाल कार्यशालाएँ
    श्रीलंका के लगभग 250 से अधिक पिरिवेना (बौद्ध शिक्षण संस्थानों) के भिक्षु-अध्यापकों ने इन कार्यशालाओं में भाग लिया, जहाँ उन्हें संस्कृत भाषा की व्यावहारिक शिक्षण विधियाँ सिखाई गईं।

  2. संस्कृत संगोष्ठियाँ और व्याख्यान
    विद्वानों ने “आधुनिक युग में संस्कृत की प्रासंगिकता” पर विचार-विमर्श किया। चर्चा में संस्कृत साहित्य, दर्शन, व्याकरण, और विज्ञान में इसके योगदान पर प्रकाश डाला गया।

  3. संस्कृत सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ
    नृत्य, नाट्य और संगीत के माध्यम से संस्कृत की सौंदर्यात्मक शक्ति को प्रदर्शित किया गया। श्रीलंका और भारत के कलाकारों ने मिलकर ‘रामायण’ और ‘जातक कथाओं’ पर आधारित प्रस्तुतियाँ दीं।

  4. विद्यार्थी संवाद कार्यक्रम
    दोनों देशों के विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों ने संस्कृत अध्ययन और अनुसंधान के नए आयामों पर विचार साझा किए। इससे युवा पीढ़ी में संस्कृत के प्रति रुचि और सम्मान बढ़ा।


सांस्कृतिक कूटनीति का नया अध्याय

यह महोत्सव केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं था, बल्कि भारत–श्रीलंका संबंधों में सांस्कृतिक कूटनीति का नया अध्याय भी बना।
संस्कृत, जो बौद्ध और हिंदू परंपराओं दोनों की मूलभूत भाषा रही है, आज भी दक्षिण एशिया में साझा पहचान और समझ का माध्यम है।

भारत और श्रीलंका के बीच ऐसे कार्यक्रम इस बात का प्रमाण हैं कि संस्कृति और शिक्षा के माध्यम से दोनों देशों के संबंध और अधिक गहरे हो रहे हैं।
यह आयोजन “सॉफ्ट डिप्लोमेसी” (Soft Diplomacy) के उस पहलू को भी सशक्त करता है, जिसके माध्यम से भाषाई और सांस्कृतिक संवाद अंतरराष्ट्रीय मित्रता को मजबूत करता है।


संस्कृत का आधुनिक महत्व

संस्कृत केवल अतीत की स्मृति नहीं है, बल्कि यह आधुनिक विज्ञान, तकनीक और भाषाई अनुसंधान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), भाषाई कम्प्यूटिंग और योग विज्ञान के क्षेत्र में संस्कृत की व्याकरणिक संरचना को आज भी आदर्श माना जाता है।

भारत और श्रीलंका के शैक्षणिक संस्थान अब संस्कृत अध्ययन को आधुनिक पाठ्यक्रमों में शामिल कर रहे हैं — ताकि यह भाषा आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान और संवाद की सार्वभौमिक भाषा बन सके।


संक्षिप्त तथ्य

विवरण जानकारी
कार्यक्रम का नाम भारत–श्रीलंका संस्कृत महोत्सव 2025
तारीख 10 नवंबर 2025
स्थान कोलंबो विश्वविद्यालय, श्रीलंका
आयोजक संस्थान स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र, श्रीलंका शिक्षा मंत्रालय, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, इंडिया–श्रीलंका फाउंडेशन
मुख्य अतिथि संतोष झा (भारतीय उच्चायुक्त), डॉ. मधुरा सेनविरत्ना (उप मंत्री, श्रीलंका)
उद्देश्य भारत–श्रीलंका के सांस्कृतिक संबंधों को सुदृढ़ करना और संस्कृत भाषा का प्रचार-प्रसार करना

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply