पूर्व विश्व बिलियर्ड्स चैंपियन मनोज कोठारी का निधन
पूर्व विश्व बिलियर्ड्स चैंपियन मनोज कोठारी का निधन

पूर्व विश्व बिलियर्ड्स चैंपियन मनोज कोठारी का निधन

भारतीय खेल जगत, विशेष रूप से क्यू स्पोर्ट्स समुदाय के लिए यह एक अत्यंत दुखद क्षण है। पूर्व विश्व बिलियर्ड्स चैंपियन और भारतीय राष्ट्रीय बिलियर्ड्स टीम के मुख्य कोच मनोज कोठारी का जनवरी 2026 में तमिलनाडु के तिरुनेलवेली स्थित एक अस्पताल में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वे 67 वर्ष के थे। उनके परिवार में उनकी पत्नी और पुत्र सौरव कोठारी हैं।

परिवार के एक सदस्य ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया कि मनोज कोठारी का कुछ दिन पहले तिरुनेलवेली के कावेरी अस्पताल में लिवर ट्रांसप्लांट हुआ था। प्रारंभिक सुधार के बावजूद उनकी तबीयत बिगड़ गई और अंततः कार्डियक अरेस्ट के कारण उनका निधन हो गया। उनका जाना भारतीय क्यू स्पोर्ट्स के एक स्वर्णिम अध्याय के समापन के रूप में देखा जा रहा है।


क्यों है यह खबर महत्वपूर्ण?

मनोज कोठारी केवल एक महान खिलाड़ी नहीं थे, बल्कि वे:

  • भारत के सबसे सफल बिलियर्ड्स खिलाड़ियों में से एक

  • दो बार के विश्व चैंपियन

  • लंबे समय तक भारतीय टीम के मुख्य राष्ट्रीय कोच

  • कई पीढ़ियों के खिलाड़ियों के मार्गदर्शक

थे। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए यह घटना भारतीय खेल व्यक्तित्वों और उपलब्धियों से जुड़ी एक महत्वपूर्ण समकालीन खबर है।


प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए त्वरित तथ्य (Prelims Ready)

  • नाम: मनोज कोठारी

  • पेशा: पूर्व विश्व बिलियर्ड्स चैंपियन, मुख्य राष्ट्रीय कोच

  • निधन: जनवरी 2026

  • आयु: 67 वर्ष

  • निधन स्थल: तिरुनेलवेली, तमिलनाडु

  • विश्व खिताब: 2 बार

  • पहला विश्व खिताब: 1990 – IBSF विश्व बिलियर्ड्स चैंपियनशिप

  • दूसरा विश्व खिताब: 1997 – विश्व युगल बिलियर्ड्स चैंपियनशिप

  • राष्ट्रीय कोच: 2011 से (15+ वर्ष)

  • मेजर ध्यानचंद पुरस्कार: 2005

  • राज्य चैंपियन: 16 बार

  • IBSF लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड: 2025


करियर की प्रमुख उपलब्धियाँ: दो बार के विश्व चैंपियन

मनोज कोठारी का प्रतिस्पर्धी करियर भारतीय बिलियर्ड्स इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है। वर्ष 1990 में उन्होंने IBSF विश्व बिलियर्ड्स चैंपियनशिप जीतकर भारत को पहली बार इस खेल में वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाई। यह जीत इस बात का प्रमाण थी कि भारतीय खिलाड़ी भी अंतरराष्ट्रीय क्यू स्पोर्ट्स में सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों को चुनौती दे सकते हैं।

इसके बाद 1997 में उन्होंने इंग्लैंड के इयान विलियमसन के साथ मिलकर विश्व युगल बिलियर्ड्स चैंपियनशिप का खिताब जीता। यह उपलब्धि उनकी निरंतरता, तकनीकी उत्कृष्टता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तालमेल की क्षमता को दर्शाती है।


राष्ट्रीय स्तर पर दबदबा: 16 बार राज्य चैंपियन

अंतरराष्ट्रीय सफलता के साथ-साथ मनोज कोठारी ने राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर भी अपना दबदबा कायम रखा। उन्होंने अपने करियर में 16 बार राज्य स्तरीय चैंपियनशिप जीती। यह रिकॉर्ड उनकी वर्षों तक बनी रहने वाली प्रतिस्पर्धात्मक श्रेष्ठता को दर्शाता है और उन्हें युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बनाता है।


खिलाड़ी से कोच तक: अगली पीढ़ी के निर्माता

प्रतिस्पर्धी खेल से संन्यास लेने के बाद मनोज कोठारी ने 2011 में भारतीय बिलियर्ड्स टीम के मुख्य राष्ट्रीय कोच की भूमिका संभाली। उन्होंने 15 वर्षों से अधिक समय तक इस पद पर रहते हुए भारतीय क्यू स्पोर्ट्स को नई दिशा दी।

कोच के रूप में उनका योगदान:

  • तकनीकी प्रशिक्षण से आगे बढ़कर मानसिक मजबूती पर जोर

  • अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए खिलाड़ियों की तैयारी

  • उत्कृष्टता और अनुशासन की संस्कृति का विकास

उनके मार्गदर्शन में कई खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन किया, जिनमें उनके पुत्र सौरव कोठारी भी शामिल हैं।


मेजर ध्यानचंद पुरस्कार: सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान

भारत सरकार ने वर्ष 2005 में मनोज कोठारी को मेजर ध्यानचंद पुरस्कार से सम्मानित किया। यह पुरस्कार खेल के क्षेत्र में आजीवन योगदान के लिए दिया जाने वाला भारत का सर्वोच्च सम्मान है। यह सम्मान बिलियर्ड्स के प्रति उनके दशकों लंबे समर्पण की आधिकारिक स्वीकृति था।


IBSF लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड: अंतरराष्ट्रीय मान्यता

वर्ष 2025 में इंटरनेशनल बिलियर्ड्स एंड स्नूकर फेडरेशन (IBSF) ने मनोज कोठारी को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया। यह सम्मान उनके निधन से कुछ ही महीने पहले मिला, जिसने उनके शानदार करियर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंतिम मान्यता प्रदान की।


क्षेत्रीय सम्मान और विरासत

पश्चिम बंगाल सरकार ने उन्हें क्रीरगुरु सम्मान से नवाज़ा, जबकि कोलकाता स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट्स क्लब ने उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड प्रदान किया। ये सम्मान दर्शाते हैं कि राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर भी उनका प्रभाव कितना गहरा था।

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