भारत में जेंडर बजटिंग में 11.55% की बढ़ोतरी: ₹5.01 लाख करोड़ का क्या है महत्व?
भारत में जेंडर बजटिंग में 11.55% की बढ़ोतरी: ₹5.01 लाख करोड़ का क्या है महत्व?

भारत में जेंडर बजटिंग में 11.55% की बढ़ोतरी: ₹5.01 लाख करोड़ का क्या है महत्व?

वित्त वर्ष 2026-27 के लिए प्रस्तुत केंद्रीय बजट में महिलाओं और बालिकाओं के सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट पेश करते हुए घोषणा की कि इस वर्ष जेंडर बजट का आवंटन बढ़ाकर ₹5.01 लाख करोड़ कर दिया गया है। यह राशि पिछले वित्त वर्ष 2025-26 के ₹4.49 लाख करोड़ की तुलना में 11.55% अधिक है।

इतना ही नहीं, कुल केंद्रीय बजट में जेंडर बजट की हिस्सेदारी भी 8.86% से बढ़कर 9.37% हो गई है। इसका अर्थ है कि अब कुल बजट का लगभग दसवां हिस्सा महिलाओं और बालिकाओं से संबंधित योजनाओं पर व्यय किया जाएगा। यह वृद्धि सरकार की लैंगिक समावेशी विकास के प्रति बढ़ती प्रतिबद्धता को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।


 11.55% वृद्धि का क्या है महत्व?

₹5.01 लाख करोड़ का आवंटन केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह नीति-स्तर पर सोच में आए परिवर्तन का संकेत है। जेंडर बजटिंग का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक व्यय का लाभ महिलाओं और बालिकाओं तक प्रभावी रूप से पहुंचे।

इस वृद्धि से निम्न क्षेत्रों में सकारात्मक प्रभाव पड़ने की उम्मीद है:

  • मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रम

  • महिला शिक्षा और छात्रवृत्ति योजनाएँ

  • कौशल विकास और रोजगार कार्यक्रम

  • महिला स्वयं सहायता समूह (SHGs)

  • सामाजिक सुरक्षा एवं सुरक्षा योजनाएँ

यह बढ़ी हुई राशि महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को मजबूत करने और लैंगिक असमानताओं को कम करने में सहायक होगी।


 कुल बजट में बढ़ती हिस्सेदारी

वित्त वर्ष 2026-27 में कुल केंद्रीय बजट में जेंडर बजट की हिस्सेदारी 9.37% हो गई है, जो पिछले वर्ष 8.86% थी। यह हाल के वर्षों में दर्ज सबसे उच्च अनुपातों में से एक है।

इसका सीधा अर्थ है कि नीति निर्माण और संसाधन आवंटन में महिलाओं को केंद्र में रखा जा रहा है। जब बजट का बड़ा हिस्सा महिला-केंद्रित योजनाओं के लिए समर्पित होता है, तो इसका प्रभाव समाज के हर स्तर पर दिखाई देता है—चाहे वह स्वास्थ्य हो, शिक्षा हो या आर्थिक स्वावलंबन।


 53 मंत्रालयों की भागीदारी: व्यापक संस्थागत सहयोग

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अनुसार, इस वर्ष 53 मंत्रालयों और विभागों तथा पांच केंद्र शासित प्रदेशों ने जेंडर बजट आवंटन की रिपोर्ट दी है, जबकि पिछले वर्ष यह संख्या 49 थी।

चार नए मंत्रालयों और विभागों ने भी इस वर्ष जेंडर बजट घटकों को शामिल किया है। यह दर्शाता है कि जेंडर बजटिंग अब केवल एक मंत्रालय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक समग्र सरकारी दृष्टिकोण बन चुका है।

इतिहास में यह अब तक की सबसे व्यापक संस्थागत भागीदारी मानी जा रही है।


 जेंडर बजटिंग क्या है?

जेंडर बजटिंग का अर्थ महिलाओं के लिए अलग बजट बनाना नहीं है। यह एक नीति उपकरण है, जिसके माध्यम से विभिन्न सरकारी योजनाओं में यह आकलन किया जाता है कि उनका लाभ महिलाओं और बालिकाओं तक किस हद तक पहुंच रहा है।

भारत में जेंडर बजटिंग की औपचारिक शुरुआत वर्ष 2005-06 में की गई थी। तब से हर वर्ष केंद्रीय बजट के साथ एक “जेंडर बजट स्टेटमेंट” प्रस्तुत किया जाता है।

इसका उद्देश्य है:

  • लैंगिक असमानताओं को कम करना

  • महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देना

  • संसाधनों के न्यायसंगत वितरण को सुनिश्चित करना


 आर्थिक और सामाजिक प्रभाव

जेंडर बजट 2026-27 से महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में कई सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं:

 आर्थिक भागीदारी

महिला उद्यमिता, मुद्रा ऋण, स्टार्टअप समर्थन और SHGs के माध्यम से आय सृजन को बढ़ावा मिलेगा।

 स्वास्थ्य और पोषण

मातृत्व लाभ, पोषण अभियान और किशोरियों के स्वास्थ्य कार्यक्रमों को मजबूती मिलेगी।

 शिक्षा और कौशल विकास

STEM शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों के माध्यम से महिलाओं की रोजगार क्षमता बढ़ेगी।

 सामाजिक सुरक्षा

विधवा पेंशन, वन-स्टॉप सेंटर और महिला हेल्पलाइन जैसी योजनाओं को मजबूत आधार मिलेगा।


 वैश्विक संदर्भ और सतत विकास लक्ष्य

भारत की यह पहल संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (SDG-5: लैंगिक समानता) के अनुरूप है। जेंडर बजटिंग समावेशी और संतुलित विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण रणनीति मानी जाती है।

जब महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त होती हैं, तो इसका प्रभाव परिवार, समुदाय और पूरे राष्ट्र की प्रगति पर पड़ता है। इसलिए जेंडर बजट को केवल सामाजिक कल्याण के रूप में नहीं, बल्कि आर्थिक विकास के इंजन के रूप में भी देखा जा रहा है।


 आगे की चुनौतियाँ

हालांकि बजट आवंटन में वृद्धि सकारात्मक संकेत है, लेकिन चुनौतियाँ भी मौजूद हैं:

  • योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन

  • ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों तक पहुंच

  • सामाजिक मानसिकता में बदलाव

  • आंकड़ों की पारदर्शिता और मूल्यांकन

सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि आवंटित धनराशि का उपयोग कितनी दक्षता और पारदर्शिता से किया जाता है।

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