भूमिका
हाल ही में नेपाल में लगातार हो रही हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (Glacial Lake Outburst Flood – GLOF) की घटनाओं ने भारतीय हिमालयी क्षेत्र (IHR) में चिंता का माहौल पैदा कर दिया है। जलवायु परिवर्तन के कारण तेजी से पिघलते ग्लेशियर, बादल फटना, और अस्थिर भू-आकृतिक संरचनाएं, भारत के सामने एक बड़ा पर्यावरणीय और आपदाजनक खतरा बनती जा रही हैं। इस लेख में हम GLOF की प्रकृति, भारत की संवेदनशीलता, और जोखिम को कम करने के लिए उठाए गए प्रयासों की विस्तृत चर्चा करेंगे।
GLOF क्या है?
GLOF एक अचानक उत्पन्न होने वाली बाढ़ होती है, जो किसी ग्लेशियर झील से अत्यधिक मात्रा में पानी के अचानक बह जाने से उत्पन्न होती है। यह अक्सर हिमनद झीलों के किनारे बने अस्थिर मोरेन (चट्टानों और मलबे का ढेर) या बर्फ के बाँधों के टूटने के कारण होती है। यह बाढ़ निचले इलाकों में बसे समुदायों और बुनियादी ढांचे के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकती है।
भारत की संवेदनशीलता: खतरा कितना बड़ा है?
1. भौगोलिक विस्तार
भारतीय हिमालयी क्षेत्र में 7,500 से अधिक हिमनद झीलें मौजूद हैं, जिनमें से कई ऊँचाई पर स्थित हैं और दुर्गम क्षेत्रों में फैली हुई हैं। 2023 तक ISRO के आंकड़ों के अनुसार 10 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र वाली 2,431 झीलों में से 676 का आकार तेजी से बढ़ा है — यह GLOF जोखिम का स्पष्ट संकेत है।
2. पूर्ववर्ती घटनाएं
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उत्तराखंड (2013): चोराबाड़ी झील से GLOF ने केदारनाथ आपदा को जन्म दिया।
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सिक्किम (2023): दक्षिण ल्होनक झील विस्फोट से तीस्ता-III बाँध नष्ट हुआ, जिससे ₹16,000 करोड़ की जलविद्युत परियोजना प्रभावित हुई।
3. जलवायु संबंधी कारक
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तापमान वृद्धि के कारण ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं।
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असामान्य रूप से तीव्र वर्षा और हीटवेव की घटनाएँ बढ़ रही हैं।
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हिमालयी क्षेत्र भूकंप संवेदी है (जोन IV और V), जिससे झीलों की स्थिरता पर असर पड़ता है।
4. निगरानी की सीमाएँ
दुर्गम भूभाग, सीमित आधारभूत संरचना और उच्च लागत के कारण निगरानी व्यवस्था अभी भी अपर्याप्त है। भारत की GLOF निगरानी अभी मुख्यतः रिमोट सेंसिंग पर आधारित है, जिसमें पूर्व चेतावनी की क्षमता सीमित है।
भारत की तैयारी: वर्तमान कदम
1. राष्ट्रीय GLOF शमन कार्यक्रम (National GLOF Risk Mitigation Programme)
NDMA द्वारा 195 उच्च-जोखिम वाली हिमनद झीलों की पहचान की गई है और उन पर केंद्रित $20 मिलियन की परियोजना शुरू की गई है। यह आपदा-पूर्व तैयारी पर आधारित है, न कि केवल आपदा के बाद की राहत पर।
2. वैज्ञानिक एवं तकनीकी हस्तक्षेप
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बाथीमेट्री: झील की गहराई और जलधारण क्षमता का आकलन।
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ERT तकनीक: मोरेन बाँधों के नीचे बर्फ की परतों की पहचान।
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UAV ड्रोन सर्वेक्षण: ढलानों की स्थिरता और स्थलाकृति का सटीक मानचित्रण।
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SAR इंटरफेरोमेट्री: ढलानों में सूक्ष्म बदलावों की निगरानी।
3. रियल-टाइम निगरानी प्रणाली
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सिक्किम में स्थापित स्वचालित मौसम एवं जल निगरानी स्टेशन (AWWS) हर 10 मिनट पर डेटा भेजते हैं।
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झीलों के दैनिक चित्रों और जल स्तर पर आधारित चेतावनी अलर्ट तैयार किए जा रहे हैं।
4. सुरक्षा बलों की भागीदारी
दूरस्थ इलाकों में ITBP को GLOF चेतावनी हेतु प्रशिक्षित किया गया है। स्थानीय समुदायों की भागीदारी से संस्कृति-संवेदनशीलता और जागरूकता में भी वृद्धि हो रही है।
आगे की राह: क्या और किया जाना चाहिए?
1. उन्नत पूर्व चेतावनी प्रणाली
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AWWS, SAR और अन्य रिमोट सेंसिंग तकनीकों को हर राज्य में स्थापित करना।
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झीलों के जलस्तर को नियंत्रित करने के लिये स्पिलवे निर्माण और जल निकासी तंत्र बनाना।
2. आपदा-रोधी बुनियादी ढाँचा
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हिमनद झीलों के पास निर्माण पर कड़े मानक लागू करना।
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मोरेन बाँधों को कृत्रिम रूप से सुदृढ़ करना।
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जलविद्युत परियोजनाओं को GLOF जोखिम मूल्यांकन के आधार पर अनुमति देना।
3. स्थानीय समाधान और सामुदायिक भागीदारी
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पंचायतों और समुदायों को GLOF योजना और मॉक ड्रिल में शामिल करना।
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स्थानीय विश्वविद्यालयों और स्टार्टअप्स को क्रायोस्फीयर पर अनुसंधान के लिये प्रोत्साहित करना।
4. सीमापार सहयोग
नेपाल, चीन जैसे देशों के साथ डेटा साझा करने और संयुक्त जोखिम मूल्यांकन और पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करने की ज़रूरत है।
निष्कर्ष
GLOF न केवल जलवायु परिवर्तन की एक चेतावनी है, बल्कि यह हमें आपदा प्रबंधन की दिशा में तत्काल और ठोस प्रयास करने की आवश्यकता भी दर्शाता है। IHR में भारत की संवेदनशीलता, बढ़ती घटनाएँ और मौजूदा सीमाएँ, इस मुद्दे को और भी गंभीर बना देती हैं।
हालाँकि सरकार द्वारा किए गए प्रयास सराहनीय हैं, लेकिन निगरानी, प्रौद्योगिकी, और समुदाय-आधारित रणनीतियों के और अधिक मजबूत संयोजन की आवश्यकता है। यदि हम समय रहते कार्रवाई करते हैं, तो न केवल जान-माल की हानि को रोका जा सकता है, बल्कि हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में टिकाऊ विकास भी सुनिश्चित किया जा सकता है।