भारत की संस्कृति, परंपरा और ज्ञान का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। ऋषि-मुनियों द्वारा रचित वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, गणित, ज्योतिष और दर्शन जैसे विषयों की अमूल्य जानकारी आज भी प्राचीन पांडुलिपियों के रूप में देशभर के मंदिरों, मठों, निजी संग्रहों और संस्थानों में संरक्षित है। इन्हीं बेशकीमती धरोहरों को आधुनिक तकनीक से जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 जुलाई 2025 को अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम के 124वें संस्करण के दौरान ‘ज्ञान भारतम मिशन’ की घोषणा की।
यह मिशन न केवल भारत की बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने और वैश्विक मंच पर भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्स्थापित करने का एक प्रयास भी है।
क्या है ज्ञान भारतम मिशन?
‘ज्ञान भारतम मिशन’ एक राष्ट्रव्यापी परियोजना है, जिसका उद्देश्य देशभर में फैली हुई प्राचीन पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण और संरक्षण करना है। अनुमान है कि भारत में एक करोड़ से अधिक ऐसी पांडुलिपियाँ हैं, जो ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन समय, मौसम और संरक्षण की कमी के कारण उनके नष्ट होने का खतरा बना हुआ है।
प्रधानमंत्री मोदी ने इन्हें “भारत की आत्मा के अध्याय” करार दिया और कहा कि ये ग्रंथ भारत की बौद्धिक और आध्यात्मिक यात्रा के जीवंत साक्ष्य हैं। इस मिशन के तहत इन ग्रंथों को डिजिटल फॉर्मेट में संरक्षित किया जाएगा और एक राष्ट्रीय डिजिटल भंडार (National Digital Repository) बनाया जाएगा, जिससे विश्वभर के शोधकर्ता, विद्यार्थी और जिज्ञासु जन इनका अध्ययन कर सकें।
मिशन के प्रमुख उद्देश्य
1. पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण:
दुर्लभ, नाज़ुक और ऐतिहासिक पांडुलिपियों को डिजिटल स्वरूप में संरक्षित कर उनका क्षरण रोका जाएगा। इससे उनका दीर्घकालिक संरक्षण संभव हो सकेगा।
2. राष्ट्रीय डिजिटल भंडार की स्थापना:
एक केंद्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किया जाएगा, जहाँ सभी डिजिटाइज़ की गई पांडुलिपियाँ उपलब्ध होंगी। यह प्लेटफॉर्म शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों के लिए सुलभ होगा।
3. भारतीय ज्ञान-विज्ञान की पहुंच:
वेद, आयुर्वेद, खगोलशास्त्र, गणित, दर्शन, भाषा और अन्य विषयों से संबंधित पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक शिक्षा और अनुसंधान से जोड़ा जाएगा।
4. सांस्कृतिक और सभ्यतागत विरासत का संरक्षण:
यह मिशन नई पीढ़ियों को भारत की सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का एक माध्यम होगा, ताकि हमारी परंपराएं सिर्फ संग्रहालयों तक सीमित न रहें, बल्कि जीवन का हिस्सा बनें।
बजटीय सहयोग और विस्तार
‘ज्ञान भारतम मिशन’ को केंद्र सरकार का सीधा सहयोग प्राप्त है। वर्ष 2025 के केंद्रीय बजट में इस योजना के लिए प्रारंभ में ₹3.5 करोड़ का प्रावधान किया गया था। लेकिन इसकी व्यापकता और महत्व को देखते हुए अब इसका बजट बढ़ाकर ₹60 करोड़ कर दिया गया है। यह सरकार की इस दिशा में मजबूत प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
प्रधानमंत्री का दृष्टिकोण: भारत की आत्मा का पुनर्जागरण
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा:
“ये पांडुलिपियाँ सिर्फ ग्रंथ नहीं हैं, ये भारत की आत्मा के अध्याय हैं। इनका डिजिटलीकरण हमारी सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का माध्यम बनेगा। मैं सभी देशवासियों से आग्रह करता हूँ कि वे इस अभियान में सक्रिय भाग लें और इसे जनांदोलन बनाएँ।”
यह मिशन भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ को वैश्विक मंच पर सशक्त रूप से प्रस्तुत करने की दिशा में भी एक मजबूत कड़ी बनेगा।
यूनेस्को द्वारा मराठा किलों को विश्व धरोहर का दर्जा
मन की बात कार्यक्रम में ही प्रधानमंत्री मोदी ने एक और गौरवपूर्ण उपलब्धि साझा की। उन्होंने बताया कि यूनेस्को (UNESCO) ने भारत के 12 मराठा किलों को विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Sites) के रूप में मान्यता दी है। इनमें से 11 किले महाराष्ट्र और 1 तमिलनाडु में स्थित है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि ये किले केवल स्थापत्य कला की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास की जीवंत झलक हैं। ये हमें उस दौर की याद दिलाते हैं जब भारत ने अपनी सांस्कृतिक और सैन्य सामर्थ्य से इतिहास रचा था।
निष्कर्ष: अपनी जड़ों से जुड़ने की पहल
‘ज्ञान भारतम मिशन’ सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं है, बल्कि यह भारत की सभ्यता, संस्कृति और ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करने का युगांतकारी प्रयास है। डिजिटल इंडिया के युग में जब हर चीज़ ऑनलाइन होती जा रही है, ऐसे में प्राचीन भारतीय ग्रंथों को डिजिटल स्वरूप देना एक दूरदर्शी कदम है।
यह मिशन आने वाली पीढ़ियों के लिए न केवल एक ज्ञान का भंडार होगा, बल्कि उन्हें अपने गौरवशाली अतीत से जोड़ने और उसमें गर्व करने का अवसर भी देगा। भारतीय समाज, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और युवाओं को इस मिशन में सक्रिय रूप से भाग लेकर इसे सफल बनाना चाहिए — क्योंकि यह भारत के गौरवशाली अतीत से भविष्य की दिशा में एक पुल है।
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