दुनिया के महासागरों के संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए ‘हाई सीज ट्रीटी’ (High Seas Treaty) 17 जनवरी 2026 से औपचारिक रूप से प्रभाव में आ गई है। लगभग दो दशकों तक चली लंबी और जटिल वार्ताओं के बाद लागू हुई यह संधि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में समुद्री जैव-विविधता की रक्षा के लिए दुनिया का पहला कानूनी रूप से बाध्यकारी वैश्विक समझौता मानी जा रही है।
यह संधि उन समुद्री क्षेत्रों पर लागू होगी, जो किसी भी देश के अधिकार क्षेत्र से बाहर स्थित हैं और जिन्हें हाई सीज कहा जाता है। ये क्षेत्र पृथ्वी के लगभग आधे हिस्से को कवर करते हैं और अब तक संरक्षण के लिहाज़ से लगभग कानूनी शून्य क्षेत्र बने हुए थे। विशेषज्ञों के अनुसार, यह समझौता महासागर संरक्षण के इतिहास में उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना जलवायु परिवर्तन के लिए पेरिस समझौता।
क्यों खबरों में?
‘हाई सीज ट्रीटी’ इसलिए चर्चा में है क्योंकि:
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60 से अधिक देशों द्वारा अनुमोदन (Ratification) के बाद यह आधिकारिक रूप से लागू हो गई है
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यह पहली बार अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्रों के लिए वैश्विक और बाध्यकारी नियम तय करती है
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यह 2030 तक महासागरों के 30% हिस्से को संरक्षित क्षेत्र बनाने के वैश्विक लक्ष्य को समर्थन देती है
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यह समुद्री जैव-विविधता संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है
इस संधि को औपचारिक रूप से BBNJ संधि (Biodiversity Beyond National Jurisdiction) के नाम से भी जाना जाता है।
हाई सीज ट्रीटी क्या है?
हाई सीज ट्रीटी एक संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत अपनाया गया वैश्विक समझौता है, जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय अधिकार-क्षेत्र से बाहर स्थित समुद्री क्षेत्रों में जैव-विविधता का संरक्षण और सतत उपयोग सुनिश्चित करना है।
मुख्य तथ्य:
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ये क्षेत्र किसी भी देश के नियंत्रण में नहीं होते
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विश्व के महासागरों के लगभग दो-तिहाई हिस्से में फैले हैं
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अब तक इनके लिए कोई मजबूत कानूनी ढांचा मौजूद नहीं था
यह संधि इस कमी को दूर करते हुए:
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संरक्षण
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सतत उपयोग
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और समुद्री संसाधनों के न्यायसंगत साझा
के लिए नियम तय करती है।
इसी कारण इसे अक्सर “महासागरों के लिए पेरिस समझौता” भी कहा जाता है।
हाई सीज क्यों इतने महत्वपूर्ण हैं?
हाई सीज केवल मछलियों और व्हेल का घर नहीं, बल्कि ये पृथ्वी की जीवन-समर्थन प्रणाली का अहम हिस्सा हैं।
इनका महत्व:
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महासागर बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करते हैं
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वैश्विक तापमान को नियंत्रित करते हैं
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ऑक्सीजन उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं
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खाद्य सुरक्षा और मत्स्य संसाधनों का आधार हैं
लेकिन आज इन पर कई गंभीर खतरे मंडरा रहे हैं:
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अतिशिकार और अवैध मछली पकड़ना
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प्लास्टिक और रासायनिक प्रदूषण
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जहाजों से उत्सर्जन
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विनाशकारी मछली पकड़ने की तकनीकें
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संभावित डीप-सी माइनिंग
जलवायु परिवर्तन ने इन खतरों को और भी गंभीर बना दिया है। इसलिए हाई सीज का संरक्षण समुद्री जीवन ही नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व और जलवायु स्थिरता के लिए भी अनिवार्य हो गया है।
हाई सीज ट्रीटी के प्रमुख प्रावधान
यह संधि चार प्रमुख स्तंभों पर आधारित है:
1. समुद्री संरक्षित क्षेत्र (Marine Protected Areas – MPAs)
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अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्रों में पहली बार कानूनी रूप से संरक्षित क्षेत्र बनाए जाएंगे
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वर्तमान में केवल लगभग 1% हाई सीज संरक्षित हैं
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लक्ष्य: 2030 तक 30% महासागर क्षेत्र का संरक्षण
2. पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA)
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किसी भी बड़ी गतिविधि से पहले पर्यावरण प्रभाव आकलन अनिवार्य
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इससे विनाशकारी परियोजनाओं को रोका जा सकेगा
3. समुद्री आनुवंशिक संसाधनों का न्यायसंगत साझा
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गहरे समुद्र के जीवों से मिलने वाले जीन और जैविक संसाधनों से होने वाले लाभ
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सभी देशों, विशेषकर विकासशील देशों के साथ साझा किए जाएंगे
4. क्षमता निर्माण और तकनीकी सहयोग
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विकासशील देशों को
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वैज्ञानिक प्रशिक्षण
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तकनीकी सहायता
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और वित्तीय सहयोग
प्रदान किया जाएगा।
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देशों के लिए तात्कालिक दायित्व
संधि के प्रभाव में आते ही अनुमोदन करने वाले देशों पर कई जिम्मेदारियाँ आ गई हैं:
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वैश्विक महासागर शासन को मजबूत करना
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अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) और
अंतरराष्ट्रीय सीबेड प्राधिकरण (ISA) के मंचों पर
संरक्षण लक्ष्यों को बढ़ावा देना -
विकासशील देशों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम शुरू करना
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समुद्री संरक्षण को सभी समुद्री निर्णय प्रक्रियाओं में मुख्यधारा बनाना
यह पहली बार होगा जब समुद्री संरक्षण को वैश्विक नीति का केंद्रीय हिस्सा बनाया जाएगा।
समुद्री संरक्षित क्षेत्र और प्रवर्तन की चुनौतियाँ
हालाँकि संधि ऐतिहासिक है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में कई चुनौतियाँ हैं:
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हाई सीज में निगरानी बेहद कठिन है
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प्रवर्तन के लिए
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उपग्रह ट्रैकिंग
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संयुक्त नौसैनिक गश्त
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और UN एजेंसियों के सहयोग की जरूरत होगी
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संभावित संरक्षित क्षेत्र:
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सारगासो सागर
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एम्परर सीमाउंट्स
जैसे जैव-विविधता हॉटस्पॉट।
संरक्षण समूहों का मानना है कि:
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केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं
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राजनीतिक इच्छाशक्ति और कड़ा प्रवर्तन निर्णायक होगा।
वैश्विक लक्ष्य और समय का दबाव
यह संधि 2030 तक:
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विश्व के 30% महासागरों को संरक्षित करने के लक्ष्य का आधार है
चूँकि हाई सीज महासागरों का बड़ा हिस्सा हैं, इसलिए:
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इनके बिना यह लक्ष्य हासिल करना असंभव है
संरक्षणवादियों ने चेतावनी दी है कि:
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यदि कार्यान्वयन में देरी हुई
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या देश पीछे हटे
तो यह ऐतिहासिक अवसर कमजोर पड़ सकता है।

