भारत का ब्याज बिल 10 वर्षों में लगभग तीन गुना, वित्त वर्ष 2025-26 में पहुँचेगा 12.76 लाख करोड़ रुपये
भारत का ब्याज बिल 10 वर्षों में लगभग तीन गुना, वित्त वर्ष 2025-26 में पहुँचेगा 12.76 लाख करोड़ रुपये

भारत का ब्याज बिल 10 वर्षों में लगभग तीन गुना, वित्त वर्ष 2025-26 में पहुँचेगा 12.76 लाख करोड़ रुपये

भारत का सार्वजनिक ऋण (Public Debt) और उस पर ब्याज़ भुगतान पिछले एक दशक में तेज़ी से बढ़ा है। वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) में ब्याज़ भुगतान का अनुमान ₹12.76 लाख करोड़ तक पहुँचने का है, जो कि दस साल पहले की तुलना में लगभग तीन गुना है। यह बढ़ोतरी न केवल भारत की बदलती ऋण संरचना को दर्शाती है बल्कि वित्तीय अनुशासन और भविष्य की आर्थिक रणनीति पर भी सवाल खड़े करती है।


1. ब्याज़ बोझ क्यों बढ़ा?

2015-16 (FY16) में भारत का ब्याज़ भुगतान आज की तुलना में काफी कम था। लेकिन 2020 के बाद से स्थिति तेजी से बदली।

  • महँगा उधार (High Borrowing Costs): कोविड महामारी के दौरान सरकार को भारी मात्रा में कर्ज़ लेना पड़ा, और वह भी ऊँची ब्याज़ दरों पर।

  • ऋण चुकौती दबाव (Repayment Pressure): मध्यम और दीर्घकालिक बॉन्ड की परिपक्वता (Maturity) होने पर एकमुश्त बड़े भुगतान करने पड़े।

नतीजा यह हुआ कि आज सरकार के राजस्व का बड़ा हिस्सा केवल ब्याज़ चुकाने में जा रहा है।


2. ऋण की मात्रा और Debt-to-GDP अनुपात

भारत का सकल सरकारी ऋण (Gross Government Debt) पिछले दस सालों में लगभग तीन गुना हो चुका है।

  • FY16 → ₹71 लाख करोड़ (GDP का 51.5%)

  • FY26 → अनुमानित ₹200 लाख करोड़ (GDP का 56.1%)

महामारी के दौरान 2020-21 (FY21) में यह अनुपात 61.4% तक पहुँच गया था, लेकिन सरकार की कोशिशों से अब यह धीरे-धीरे घटकर 56.1% तक आ गया है।

👉 लक्ष्य: 2031 तक इस अनुपात को 50% पर लाना।


3. उधारी लागत और बॉन्ड बाज़ार

महामारी के समय उधारी बेहद महँगी थी।

  • 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड

    • FY20–21 में औसत: 6.6%

    • अप्रैल 2025: 6.4% (तीन साल का न्यूनतम स्तर)

हालाँकि बॉन्ड यील्ड में गिरावट निवेशकों के भरोसे को दर्शाती है, लेकिन पुराने महँगे ऋण के कारण ब्याज़ बोझ अभी भी भारी है।


4. ऋण प्रबंधन रणनीति: Buybacks और Switches

सरकार ने कर्ज़ प्रबंधन के लिए कुछ अहम कदम उठाए हैं:

  • बॉन्ड Buybacks: परिपक्वता से पहले बॉन्ड वापस ख़रीद लेना।

  • बॉन्ड Switches: अल्पकालिक प्रतिभूतियों को दीर्घकालिक बॉन्ड में बदलना।

इन कदमों से तत्काल भुगतान का दबाव घटता है और सरकार को ऋण का रोलओवर जोखिम (Rollover Risk) कम करने में मदद मिलती है।


5. राजकोषीय घाटा और वित्तीय अनुशासन

राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) भी नियंत्रित करने की कोशिशें जारी हैं।

  • FY25: 4.8% GDP (अनुमान से बेहतर)

  • FY26 लक्ष्य: 4.4% GDP

  • मई 2025 में राजकोषीय घाटा केवल 0.8% रहा, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 3.1% था।

यह संभव हुआ है मज़बूत कर वसूली और बेहतर वित्तीय अनुशासन के कारण। इससे सरकार को नए उधार कम लेने पड़ रहे हैं और ब्याज़ दरों पर भी दबाव घट सकता है।


क्यों है यह मुद्दा अहम?

  1. आर्थिक स्थिरता पर असर:
    बढ़ते ब्याज़ खर्च से सरकार के विकास योजनाओं और सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों के लिए उपलब्ध संसाधन कम हो सकते हैं।

  2. महामारी-काल का बोझ:
    कोविड के समय लिया गया महँगा कर्ज़ अब भी भारत की वित्तीय स्थिति पर दबाव बना रहा है।

  3. Debt-to-GDP दिशा:
    FY21 के 61.4% से FY26 में 56.1% और 2031 तक 50% का लक्ष्य, सरकार की ऋण प्रबंधन क्षमता का संकेत है।

  4. नीतिगत कदम:
    Buybacks और Switches से यह दिखता है कि सरकार सक्रिय रूप से ऋण बोझ को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है।


निष्कर्ष

भारत का बढ़ता ब्याज़ बिल आने वाले वर्षों में आर्थिक नीति का एक बड़ा मुद्दा बना रहेगा। एक ओर, यह सरकार के लिए वित्तीय अनुशासन और ऋण प्रबंधन की चुनौती है, तो दूसरी ओर यह संकेत भी देता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था दीर्घकाल में स्थिरता की ओर बढ़ रही है।

यदि सरकार अपने राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखती है और Debt-to-GDP अनुपात को 2031 तक 50% पर लाने के लक्ष्य को हासिल करती है, तो यह भारत की वित्तीय साख (Creditworthiness) को और मजबूत करेगा।

👉 यह विषय UPSC, RBI ग्रेड B, बैंकिंग परीक्षाओं और अर्थव्यवस्था-संबंधी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

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