पूर्वोत्तर भारत में बड़े जलविद्युत प्रोजेक्ट्स और जैव विविधता संरक्षण के बीच टकराव एक बार फिर चर्चा में है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति ने अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित कलई-II जलविद्युत परियोजना को पर्यावरणीय मंज़ूरी (Environmental Clearance) देने की सिफारिश की है। हालांकि, इस फैसले पर पर्यावरणविदों और वन्यजीव विशेषज्ञों ने गंभीर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि परियोजना की पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट में गंभीर रूप से संकटग्रस्त श्वेत-उदर बगुला (White-bellied Heron) की उपस्थिति का उल्लेख नहीं किया गया, जबकि यह क्षेत्र इसके ज्ञात आवासों में शामिल है।
खबर में क्यों?
विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (EAC) ने लोहित नदी पर प्रस्तावित 1,200 मेगावाट की कलई-II जलविद्युत परियोजना को पर्यावरणीय मंज़ूरी देने की सिफारिश की। इसके तुरंत बाद पर्यावरणविदों ने सवाल उठाया कि EIA रिपोर्ट में उस प्रजाति का ज़िक्र नहीं है, जिसे IUCN ने Critically Endangered श्रेणी में रखा है और जिसका भारत में प्रमुख आवास लोहित नदी बेसिन माना जाता है।
कलई-II जलविद्युत परियोजना: मुख्य विवरण
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स्थान: अंजॉ ज़िला, अरुणाचल प्रदेश
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नदी: लोहित नदी
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स्थापित क्षमता: 1,200 मेगावाट
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डेवलपर: THDC इंडिया लिमिटेड
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बाँध प्रकार: 128.5 मीटर ऊँचा कंक्रीट ग्रैविटी बाँध
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अन्य घटक: पोंडेज और भूमिगत पावरहाउस
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अनुमानित लागत: लगभग ₹14,176 करोड़
यह परियोजना पूर्वोत्तर में ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने और राष्ट्रीय ग्रिड को मज़बूती देने के उद्देश्य से प्रस्तावित की गई है।
EIA रिपोर्ट को लेकर प्रमुख चिंताएँ
पर्यावरणीय विवाद की जड़ EIA रिपोर्ट में निहित है, जिसे WAPCOS लिमिटेड ने तैयार किया है। रिपोर्ट में—
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कुल 28 पक्षी प्रजातियों का उल्लेख किया गया है
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लेकिन श्वेत-उदर बगुला का कोई संदर्भ नहीं दिया गया
पर्यावरणविदों का तर्क है कि परियोजना क्षेत्र नामदाफा टाइगर रिज़र्व और कमलांग टाइगर रिज़र्व के आसपास पड़ता है—जो इस दुर्लभ पक्षी के ज्ञात आवास माने जाते हैं। ऐसे में EIA में इसका उल्लेख न होना, आकलन की विश्वसनीयता और समग्रता पर सवाल खड़े करता है।
श्वेत-उदर बगुला क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
श्वेत-उदर बगुला (White-bellied Heron) दुनिया के सबसे दुर्लभ पक्षियों में से एक है।
संरक्षण स्थिति
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IUCN रेड लिस्ट: Critically Endangered
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वैश्विक आबादी: 250 से भी कम, विशेषज्ञों के अनुसार संभवतः केवल 60 के आसपास शेष
भारत में स्थिति
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प्रमुख आवास: लोहित नदी के किनारे
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विशेष क्षेत्र: वालोंग, नामदाफा और आसपास के वन क्षेत्र
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कैमरा ट्रैप से कमलांग टाइगर रिज़र्व में भी दर्ज
विशेषताएँ
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बगुला प्रजातियों में दूसरा सबसे बड़ा जीवित पक्षी
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गहरे स्लेटी रंग का शरीर, स्पष्ट सफेद पेट
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लंबी गर्दन, मानव उपस्थिति से अत्यधिक डरने वाला
इतनी सीमित आबादी के कारण इसके आवास में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप प्रजाति के अस्तित्व के लिए घातक हो सकता है।
कानूनी संरक्षण और नीतिगत सवाल
श्वेत-उदर बगुला को भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत उच्च स्तर का संरक्षण प्राप्त है। (हालाँकि संरक्षण श्रेणी को लेकर अलग-अलग दस्तावेज़ों में मतभेद बताए जाते हैं, फिर भी इसे सर्वोच्च प्राथमिकता वाली प्रजातियों में गिना जाता है।)
कानून के अनुसार—
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ऐसी प्रजातियों के आवास को प्रभावित करने वाली परियोजनाओं के लिए
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विस्तृत पारिस्थितिक अध्ययन और
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विशेष संरक्षण योजना अनिवार्य होती है
पर्यावरणविदों का आरोप है कि कलई-II परियोजना के मामले में यह प्रक्रिया अधूरी रही है।
विकास बनाम संरक्षण: पुराना लेकिन अहम सवाल
सरकार और परियोजना समर्थकों का कहना है कि—
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पूर्वोत्तर भारत जलविद्युत की दृष्टि से अत्यंत संभावनाशील है
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स्वच्छ ऊर्जा के बिना विकास और जलवायु लक्ष्यों को हासिल करना कठिन है
वहीं आलोचकों का तर्क है कि—
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बड़े बाँध नदियों की प्राकृतिक धारा को बदल देते हैं
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इससे मछलियों, पक्षियों और नदी-आधारित पारिस्थितिकी पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है
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श्वेत-उदर बगुला जैसी प्रजातियों के लिए यह प्रभाव अपूरणीय हो सकता है
आगे की राह क्या हो सकती है?
विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि—
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EIA रिपोर्ट की पुनः समीक्षा की जाए
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श्वेत-उदर बगुला पर स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाए
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परियोजना के डिज़ाइन और संचालन में मिटिगेशन उपाय जोड़े जाएँ
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आवश्यकता हो तो परियोजना के कुछ घटकों में बदलाव किया जाए

