कर्नाटक में दिखा दुनिया का दुर्लभ ‘सैंडलवुड लेपर्ड’
कर्नाटक में दिखा दुनिया का दुर्लभ ‘सैंडलवुड लेपर्ड’

कर्नाटक में दिखा दुनिया का दुर्लभ ‘सैंडलवुड लेपर्ड’

कर्नाटक के वन्यजीवों ने एक बार फिर राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी वैज्ञानिकों और संरक्षणवादियों का ध्यान आकर्षित किया है। राज्य में तेंदुए के एक अत्यंत दुर्लभ रंग-रूप (color variant) की पहली बार पुष्टि हुई है, जिसे लोकप्रिय रूप से “सैंडलवुड लेपर्ड” नाम दिया गया है। यह खोज न केवल कर्नाटक में तेंदुओं की असाधारण आनुवंशिक विविधता को उजागर करती है, बल्कि भारत को बड़े बिल्लीनुमा जीवों (Big Cats) के संरक्षण के लिए दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक के रूप में स्थापित करती है।

यह अवलोकन इस बात का प्रमाण है कि कर्नाटक के वन पारिस्थितिकी तंत्र आज भी इतने समृद्ध हैं कि वे दुर्लभ और असामान्य आनुवंशिक विशेषताओं वाले जीवों को सुरक्षित आश्रय प्रदान कर पा रहे हैं।


क्यों है यह खबरों में?

कर्नाटक में पहली बार अल्ट्रा-रेयर स्ट्रॉबेरी रंग के तेंदुए को कैमरा ट्रैप के माध्यम से दर्ज किया गया है। यह भारत में इस तरह के तेंदुए की केवल दूसरी पुष्टि है। इससे पहले नवंबर 2021 में राजस्थान के रणकपुर क्षेत्र में ऐसा ही एक तेंदुआ देखा गया था।

वैश्विक स्तर पर भी इस रंग-रूप वाले तेंदुए का रिकॉर्ड बेहद सीमित है, जिससे यह खोज अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव समुदाय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाती है।


‘सैंडलवुड लेपर्ड’ क्या है?

सामान्यतः तेंदुआ (Leopard) का रंग पीला-भूरा होता है, जिस पर गहरे काले रोसेट्स (धब्बे) पाए जाते हैं। लेकिन ‘सैंडलवुड लेपर्ड’ इस सामान्य स्वरूप से बिल्कुल अलग है—

  • इसका रंग हल्का गुलाबी-लाल या स्ट्रॉबेरी जैसा होता है

  • इस पर पाए जाने वाले रोसेट्स हल्के भूरे रंग के होते हैं

  • अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक साहित्य में ऐसे तेंदुओं को “Strawberry Leopard” कहा जाता है

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह असामान्य रंग-रूप किसी नई प्रजाति के कारण नहीं, बल्कि दुर्लभ आनुवंशिक स्थितियों की वजह से उत्पन्न होता है।


इस अनोखे रंग के पीछे का वैज्ञानिक कारण

विशेषज्ञों के मुताबिक, सैंडलवुड लेपर्ड का यह रंग निम्नलिखित दुर्लभ आनुवंशिक कारणों से जुड़ा हो सकता है—

  • हाइपोमेलैनिज़्म (Hypomelanism): जिसमें काले रंगद्रव्य (Melanin) की मात्रा सामान्य से कम होती है

  • एरिथ्रिज़्म (Erythrism): जिसमें लाल या गुलाबी रंगद्रव्य की अधिकता हो जाती है

इन दोनों स्थितियों के कारण तेंदुए का शरीर हल्के लाल या स्ट्रॉबेरी रंग का दिखाई देता है। यही वजह है कि ऐसे तेंदुए दुनिया भर में अत्यंत दुर्लभ माने जाते हैं।


कहाँ और कैसे दर्ज किया गया यह दुर्लभ तेंदुआ?

इस सैंडलवुड लेपर्ड को विजयनगर ज़िला में लगाए गए कैमरा ट्रैप्स के माध्यम से रिकॉर्ड किया गया।

यह खोज प्रसिद्ध संरक्षण वैज्ञानिक संजय गुब्बी और उनकी टीम द्वारा की गई, जो होलेमत्ती नेचर फाउंडेशन से जुड़ी हुई है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि—

  • यह तेंदुआ लगभग सात वर्ष की मादा मानी जा रही है

  • एक कैमरा ट्रैप तस्वीर में इसके साथ सामान्य रंग वाला शावक भी देखा गया

  • इससे संकेत मिलता है कि यह आनुवंशिक विशेषता विरासत में मिल भी सकती है या नहीं, इस पर आगे शोध की आवश्यकता है


राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर कितनी दुर्लभ है यह घटना?

वैश्विक स्तर पर अब तक इस तरह के रंग-रूप वाले तेंदुओं का केवल पाँच बार ही दस्तावेजीकरण हुआ है—

  • दो बार दक्षिण अफ्रीका में

  • एक बार तंज़ानिया में

  • दो बार भारत में (राजस्थान और अब कर्नाटक)

भारत में यह केवल दूसरी बार दर्ज किया गया मामला है, जिससे कर्नाटक की यह खोज और भी अधिक महत्वपूर्ण बन जाती है।


‘सैंडलवुड लेपर्ड’ नाम का महत्व

इस दुर्लभ तेंदुए को “सैंडलवुड लेपर्ड” नाम दिया जाना प्रतीकात्मक है। कर्नाटक अपने चंदन (Sandalwood) वनों के लिए ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से प्रसिद्ध रहा है। यह नाम—

  • राज्य की पारिस्थितिक पहचान

  • चंदन वनों का जैविक महत्व

  • और स्थानीय संरक्षण प्रयासों

को एक साथ दर्शाता है।


कर्नाटक में तेंदुओं की असाधारण विविधता

कर्नाटक पहले से ही—

  • मेलानिस्टिक तेंदुओं (ब्लैक पैंथर) की उच्च घनत्व वाली आबादी

  • पश्चिमी घाट जैसे जैव-विविधता हॉटस्पॉट

  • विविध वन पारिस्थितिकी तंत्र

के लिए जाना जाता है। सैंडलवुड लेपर्ड की खोज यह सिद्ध करती है कि यह क्षेत्र तेंदुओं की आनुवंशिक समृद्धि और अनुकूलन क्षमता का एक जीवित प्रयोगशाला (Living Laboratory) है।


संरक्षण के दृष्टिकोण से क्यों है यह खोज अहम?

ऐसी खोजें कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण हैं—

  • ये जीन विविधता (Genetic Diversity) को समझने में मदद करती हैं

  • दीर्घकालिक संरक्षण रणनीतियों के लिए वैज्ञानिक आधार प्रदान करती हैं

  • यह संकेत देती हैं कि मौजूदा वन अभी भी स्वस्थ और कार्यशील पारिस्थितिकी तंत्र हैं

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन वनों पर दबाव बढ़ा, तो ऐसी दुर्लभ आनुवंशिक विशेषताएँ सबसे पहले समाप्त हो सकती हैं।

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