प्रख्यात बांग्ला साहित्यकार Mani Shankar Mukherjee, जिन्हें साहित्य जगत में शंकर के नाम से जाना जाता था, का 20 फरवरी 2026 को 93 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन से केवल एक लेखक नहीं, बल्कि बांग्ला साहित्य का एक पूरा युग मानो थम गया है। शंकर उन विरले रचनाकारों में थे जिन्होंने आम आदमी के संघर्ष, शहरी जीवन की जटिलताओं और बदलते सामाजिक ढांचे को बेहद संवेदनशीलता के साथ शब्दों में ढाला।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा कि शंकर का जाना बंगाल की सांस्कृतिक और बौद्धिक परंपरा के लिए अपूरणीय क्षति है। उन्होंने शंकर को ऐसा साहित्यकार बताया जिनकी रचनाएँ समाज का दर्पण थीं और आने वाली पीढ़ियों को हमेशा दिशा दिखाती रहेंगी।
साधारण शुरुआत से साहित्यिक शिखर तक
शंकर का जन्म हावड़ा के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। बचपन से ही जीवन ने उन्हें संघर्षों से रूबरू कराया। कम उम्र में पिता का साया उठ जाने के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और पढ़ाई के साथ-साथ कई छोटी-बड़ी नौकरियाँ कीं।
उन्होंने कलकत्ता हाईकोर्ट में क्लर्क के रूप में भी काम किया, जहाँ से उन्हें समाज की वास्तविकताओं को करीब से देखने का अवसर मिला। यही अनुभव आगे चलकर उनके साहित्य की आत्मा बने। बाद में उन्होंने रिपन कॉलेज से उच्च शिक्षा प्राप्त की और पूरी तरह लेखन को अपना जीवन समर्पित कर दिया।
शहरी भारत की जीवंत तस्वीर
शंकर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने स्वतंत्रता के बाद उभरते शहरी भारत को बेहद यथार्थवादी नजरिए से प्रस्तुत किया। उनकी कहानियों और उपन्यासों में—
-
कॉर्पोरेट दुनिया की महत्वाकांक्षाएँ
-
नौकरशाही की जटिलताएँ
-
नैतिक संघर्ष
-
आम आदमी के सपने और टूटन
सब कुछ बेहद गहराई से उभरकर आता है। उन्होंने लगभग 100 उपन्यास और लघु कथाएँ लिखीं, जो आज भी पाठकों के बीच उतनी ही प्रासंगिक हैं।
साहित्य से सिनेमा तक गूंज
शंकर की रचनाओं की शक्ति का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें भारतीय सिनेमा के महानतम निर्देशकों ने पर्दे पर उतारा।
महान फिल्मकार Satyajit Ray ने उनके उपन्यासों पर आधारित फिल्मों को अपनी प्रसिद्ध ‘कलकत्ता ट्रिलॉजी’ का हिस्सा बनाया। इनमें शामिल थीं:
-
Seemabaddha – कॉर्पोरेट महत्वाकांक्षा और नैतिक समझौतों की कहानी
-
Jana Aranya – शहरी जीवन में संघर्ष और भ्रष्ट व्यवस्था का चित्रण
इसके अलावा शंकर का चर्चित उपन्यास Chowringhee एक सफल बंगाली फिल्म के रूप में सामने आया, जिसमें महान अभिनेता Uttam Kumar ने मुख्य भूमिका निभाई।
उनका उपन्यास मान सम्मान हिंदी सिनेमा में भी पहुँचा, जिसे Basu Chatterjee ने फिल्म Shisha के रूप में निर्देशित किया।
इन रूपांतरणों ने शंकर को केवल साहित्य तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें आम दर्शकों के बीच भी बेहद लोकप्रिय बना दिया।
सम्मान और अंतिम रचनात्मक यात्रा
अपने लंबे साहित्यिक जीवन में शंकर को कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा गया। 2021 में उन्हें साहित्यिक योगदान के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, जिसे भारतीय साहित्य जगत का बड़ा सम्मान माना जाता है।
अपने जीवन के अंतिम वर्षों में वे आध्यात्मिक और दार्शनिक विषयों की ओर अधिक झुके। उनका अंतिम प्रमुख प्रोजेक्ट Swami Vivekananda के जीवन और विचारों पर आधारित एक शोध-आधारित पुस्तक थी, जो उनके बौद्धिक विस्तार और गहरी सोच को दर्शाती है।
बांग्ला साहित्य में अमिट विरासत
शंकर ने आधुनिक बांग्ला साहित्य को नई दिशा दी। उनकी रचनाओं ने—
-
शहरी समाज के असली चेहरे को उजागर किया
-
नैतिक द्वंद्व को साहित्य के केंद्र में रखा
-
यथार्थवाद को लोकप्रिय बनाया
-
साहित्य और सिनेमा के बीच मजबूत सेतु बनाया
आज भी विश्वविद्यालयों में उनकी रचनाओं पर शोध होते हैं और नए लेखक उनसे प्रेरणा लेते हैं।
एक युग का अंत, लेकिन विचार अमर
शंकर का जाना निश्चित रूप से बांग्ला साहित्य के लिए एक गहरी क्षति है, लेकिन उनकी कहानियाँ, पात्र और विचार हमेशा जीवित रहेंगे। उन्होंने शब्दों के माध्यम से उस भारत को दर्ज किया जो तेजी से बदल रहा था—जहाँ सपने थे, संघर्ष थे और नैतिक सवाल थे।
उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाती रहेगी कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का आईना और बदलाव का माध्यम भी हो सकता है।

