भारत में क्यों बढ़ रहा है LPG संकट? जानिए गैस की कमी के 5 बड़े कारण
भारत में क्यों बढ़ रहा है LPG संकट? जानिए गैस की कमी के 5 बड़े कारण

भारत में क्यों बढ़ रहा है LPG संकट? जानिए गैस की कमी के 5 बड़े कारण

भारत इस समय एलपीजी (LPG) आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है। बढ़ती मांग, आयात पर निर्भरता और वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों के कारण देश में एलपीजी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। कई रिपोर्टों के अनुसार, ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों और International Energy Agency ने भी यह संकेत दिया है कि भारत में एलपीजी के लिए पर्याप्त रणनीतिक भंडारण का अभाव एक महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा चुनौती है।

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव, वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधान और भारत की बढ़ती घरेलू मांग ने इस स्थिति को और जटिल बना दिया है। विशेष रूप से Strait of Hormuz जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर अस्थिरता के कारण ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बढ़ जाती है।

ऐसे में यह समझना जरूरी है कि भारत में एलपीजी संकट के पीछे कौन-कौन से प्रमुख कारण जिम्मेदार हैं।


1. आयात पर अत्यधिक निर्भरता

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। एलपीजी के मामले में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है। देश की कुल एलपीजी मांग का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा आयात से पूरा होता है

भारत मुख्य रूप से खाड़ी देशों से एलपीजी खरीदता है, जिनमें Saudi Arabia, Qatar, United Arab Emirates और Kuwait प्रमुख हैं।

भारत प्रतिदिन लाखों बैरल कच्चा तेल और गैस इन देशों से आयात करता है। जब भी इन क्षेत्रों में राजनीतिक तनाव या आपूर्ति बाधित होती है, तो उसका सीधा असर भारत के ऊर्जा बाजार पर पड़ता है। आयात पर इतनी अधिक निर्भरता के कारण भारत की ऊर्जा सुरक्षा बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित हो सकती है।


2. भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक संघर्ष

मध्य पूर्व लंबे समय से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का केंद्र रहा है। लेकिन इसी क्षेत्र में अक्सर राजनीतिक और सैन्य तनाव देखने को मिलते हैं। हाल के वर्षों में Iran, Israel और United States के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति शृंखलाओं को प्रभावित किया है।

ऐसे संघर्षों का प्रभाव केवल तेल और गैस की कीमतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे जहाजों की आवाजाही, बीमा लागत और परिवहन समय भी प्रभावित होता है। इसके कारण एलपीजी की आपूर्ति में देरी या कमी की स्थिति बन सकती है।

इसके अलावा, ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों के लिए यह स्थिति मुद्रास्फीति, व्यापार घाटे और मुद्रा पर दबाव जैसी आर्थिक चुनौतियाँ भी पैदा कर सकती है।


3. होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता

खाड़ी देशों से आने वाली अधिकांश ऊर्जा आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरती है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है।

यदि इस मार्ग पर किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव, नाकाबंदी या सुरक्षा खतरा पैदा होता है, तो ऊर्जा आपूर्ति तुरंत प्रभावित हो सकती है। एलपीजी और कच्चे तेल की बड़ी मात्रा इसी रास्ते से भारत तक पहुंचती है।

इस कारण भारत की ऊर्जा आपूर्ति इस समुद्री मार्ग की स्थिरता पर काफी हद तक निर्भर रहती है। किसी भी अस्थिरता की स्थिति में ऊर्जा कीमतों में तेजी से वृद्धि हो सकती है और घरेलू बाजार में कमी का माहौल बन सकता है।


4. एलपीजी की तेजी से बढ़ती मांग

भारत आज दुनिया में एलपीजी का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता बन चुका है। इसका एक बड़ा कारण सरकार की Pradhan Mantri Ujjwala Yojana जैसी योजनाएँ हैं, जिनके माध्यम से करोड़ों परिवारों को स्वच्छ खाना पकाने का ईंधन उपलब्ध कराया गया है।

इस योजना ने ग्रामीण और गरीब परिवारों तक एलपीजी की पहुंच को काफी बढ़ाया है। इसके परिणामस्वरूप देश में एलपीजी की खपत तेजी से बढ़ी है।

हालांकि घरेलू उत्पादन उतनी तेजी से नहीं बढ़ पाया है, जितनी तेजी से मांग में वृद्धि हुई है। इसी कारण आयात पर निर्भरता और बढ़ गई है, जिससे आपूर्ति में बाधा आने पर संकट की स्थिति बन सकती है।


5. सीमित भंडारण क्षमता

भारत में एलपीजी भंडारण क्षमता अभी भी सीमित है। विशेषज्ञों के अनुसार देश में भूमिगत एलपीजी भंडारण लगभग 1.4 लाख टन के आसपास है, जबकि देश में प्रतिदिन लगभग 80,000 टन एलपीजी की मांग होती है।

इसका मतलब है कि उपलब्ध भंडारण क्षमता केवल कुछ दिनों की खपत को ही पूरा कर सकती है।

हालांकि भारत के पास कच्चे तेल के लिए रणनीतिक भंडार मौजूद हैं, लेकिन एलपीजी के मामले में ऐसी सुविधाएँ अपेक्षाकृत कम विकसित हैं। यदि आपूर्ति में अचानक बाधा आती है, तो सीमित भंडारण के कारण बाजार में कमी जल्दी महसूस होने लगती है।

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