भारत के महत्वाकांक्षी चीतों के पुनर्वास कार्यक्रम (Project Cheetah) ने सितंबर 2025 में एक ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज की है। कूनो राष्ट्रीय उद्यान, मध्य प्रदेश में जन्मी मादा चीता मुखी अब देश की पहली ऐसी चीता बन गई है, जिसने भारत में जन्म लेने के बाद वयस्कता प्राप्त की है। यह घटना केवल एक जीव की विकास-यात्रा नहीं, बल्कि भारत की वन्यजीव संरक्षण रणनीति की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर है।
30 सितंबर 2025 को मुखी की उम्र 915 दिन पूरी हुई, जिससे वह औपचारिक रूप से वयस्क चीता मानी गई। यह मील का पत्थर Project Cheetah की पहली पूर्ण जीवन-चक्र सफलता को दर्शाता है — जन्म से लेकर परिपक्वता तक की यात्रा एक ही देश, एक ही प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र में।
मुखी की जन्म और जीवटता की कहानी
मुखी का जन्म 29 मार्च 2023 को हुआ था। उसकी माँ, ज्वाला, उन आठ चीतों में से एक थी जिन्हें नामीबिया से लाकर कूनो में बसाया गया था। ज्वाला ने एक साथ चार शावकों को जन्म दिया था, लेकिन तीव्र गर्मी और जलवायु की प्रतिकूलता के कारण उनमें से तीन की मृत्यु हो गई। केवल मुखी ही जीवित बच पाई।
मुखी के जीवन की शुरुआत आसान नहीं थी। उसकी माँ ने उसे शुरू में अपनाया नहीं, जिसके कारण वन अधिकारियों और पशु चिकित्सा विशेषज्ञों को हस्तक्षेप करना पड़ा। उसे विशेष देखभाल के तहत पाला गया — पोषण, चिकित्सा सहायता, और बाद में उसे प्राकृतिक परिवेश में ढालने के लिए विशेष प्रशिक्षण भी दिया गया।
धीरे-धीरे, मुखी ने शिकार की तकनीकें सीखीं, जंगल के वातावरण में सामंजस्य स्थापित किया और एक पूरी तरह स्वतंत्र जीवन जीने की ओर कदम बढ़ाया। उसकी यह विकास-यात्रा केवल उसकी जीवटता ही नहीं दर्शाती, बल्कि यह भी प्रमाणित करती है कि भारत की पारिस्थितिकी और संरक्षण ढांचा अफ्रीकी मूल के चीतों की अगली पीढ़ी के लिए उपयुक्त हो सकता है।
प्रोजेक्ट चीता: एक दृष्टिकोण
Project Cheetah की शुरुआत 17 सितंबर 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई थी। इस दिन नामीबिया से लाए गए 8 चीतों को कूनो नेशनल पार्क में छोड़ा गया। यह दुनिया का पहला महाद्वीपीय स्तर पर बड़े मांसाहारी प्रजाति का पुनर्स्थापन था।
इसके बाद फरवरी 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीतों को भारत लाया गया। परियोजना का प्रमुख उद्देश्य था — भारत में 70 वर्षों के बाद चीतों की वापसी और एक स्थायी, स्वतंत्र, और प्रजनन-सक्षम आबादी का निर्माण।
वर्तमान स्थिति (सितंबर 2025 तक)
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कुल चीते (भारत में): 27
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भारत में जन्मे शावक: 16
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अब तक मृत्यु: 19 (9 आयातित वयस्क, 10 भारत में जन्मे शावक)
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जीवित चीते: 24 कूनो में, 3 गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य में
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शावक जीवित रहने का अनुपात (कूनो): लगभग 61%, जो वैश्विक औसत (40%) से बेहतर है
इन आँकड़ों से यह स्पष्ट है कि यद्यपि प्रारंभिक चुनौतियाँ रहीं, लेकिन अब परियोजना स्थायित्व की ओर बढ़ रही है।
मुखी की सफलता का महत्त्व
1. स्थायित्व का प्रमाण
मुखी का वयस्क होना यह दर्शाता है कि भारत में चीता न केवल जीवित रह सकते हैं, बल्कि प्राकृतिक रूप से परिपक्व भी हो सकते हैं। यह पुनर्स्थापन कार्यक्रम की दीर्घकालिक सफलता का पहला संकेत है।
2. शावक मृत्यु दर पर नियंत्रण
वन्यजीव पुनर्वास कार्यक्रमों में शावकों की मृत्यु दर आमतौर पर बहुत अधिक होती है। मुखी की सफलता से यह संकेत मिलता है कि भारत में समुचित देखभाल और हस्तक्षेप के साथ इन दरों को नियंत्रित किया जा सकता है।
3. प्रजनन के नए आयाम
मुखी के वयस्क होने के बाद आने वाले वर्षों में उसके प्रजनन की संभावना है। यदि वह सफलतापूर्वक संतान उत्पन्न करती है, तो यह भारत में पूर्ण रूप से स्वदेशी चीता आबादी के निर्माण की दिशा में एक और बड़ा कदम होगा।
4. प्रेरणा और सार्वजनिक विश्वास
मुखी की यात्रा आम जनता और संरक्षणवादियों दोनों के लिए प्रेरणादायक है। यह भारत में बड़े शिकारी प्रजातियों के पुनरुत्थान में लोगों का विश्वास बढ़ा सकती है और इस दिशा में नीति-निर्माताओं को प्रोत्साहित कर सकती है।
आगे की राह और चुनौतियाँ
हालाँकि मुखी की उपलब्धि उत्साहजनक है, लेकिन Project Cheetah के सामने कई दीर्घकालिक चुनौतियाँ अब भी मौजूद हैं:
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पर्याप्त और सुरक्षित आवास: क्या भारत के जंगल पर्याप्त क्षेत्र प्रदान कर सकते हैं, ताकि बढ़ती चीता आबादी स्वतंत्र रूप से विचरण कर सके?
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शिकार की उपलब्धता: चीता की भोजन श्रृंखला को बनाए रखने के लिए पर्याप्त शिकार प्रजातियाँ मौजूद रहनी चाहिए।
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अन्य वन्यजीवों से संघर्ष: बाघ और तेंदुओं जैसी अन्य शिकारी प्रजातियों के साथ संघर्ष की संभावनाओं का प्रबंधन करना आवश्यक है।
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स्थानीय समुदायों की भागीदारी: संरक्षण तभी सफल होता है जब स्थानीय लोगों को उसका लाभ और महत्व समझ आए। समुदायों की भागीदारी अनिवार्य है।

