भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने 13 अक्टूबर 2025 को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक और आर्थिक कदम उठाया है। इसके तहत अब भारत के अधिकृत डीलर (AD) बैंक और उनकी विदेशी शाखाएं भूटान, नेपाल और श्रीलंका के निवासी और बैंकों को भारतीय रुपये (INR) में ऋण प्रदान कर सकती हैं। यह नीति न केवल सीमा-पार व्यापार को सरल बनाने की दिशा में है, बल्कि दक्षिण एशिया में रुपये की भूमिका को भी मजबूत करने की कोशिश करती है।
RBI की नई नीति: प्रमुख अपडेट
RBI ने स्पष्ट किया है कि अब भारत के अधिकृत बैंक और उनकी विदेशी शाखाएं निम्न कार्य कर सकती हैं:
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भूटान, नेपाल और श्रीलंका के निवासियों और बैंकों को रुपयों में ऋण प्रदान करना।
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क्षेत्रीय व्यापार और आर्थिक सहयोग को सुगम बनाना।
यह बदलाव दो मुख्य विनियमों में संशोधन के तहत किया गया है:
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विदेशी मुद्रा प्रबंधन (उधार और उधार) विनियम, 2018
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विदेशी मुद्रा प्रबंधन (भारत में निवासी व्यक्ति द्वारा विदेशी मुद्रा खाते) विनियम, 2015
RBI का मानना है कि यह कदम बाहरी व्यापार और भुगतान प्रणाली को सरल बनाने और क्षेत्रीय व्यापार में रुपये की भूमिका को बढ़ाने की दिशा में एक रणनीतिक पहल है।
क्षेत्रीय व्यापार पर संभावित प्रभाव
इस नीति का विशेष महत्व उन देशों के लिए है जो अमेरिकी डॉलर पर अत्यधिक निर्भर हैं, जैसे श्रीलंका। इसके अलावा, यह भूटान और नेपाल के साथ व्यापारिक संबंधों को और अधिक विविध और स्थिर बनाने में मदद करेगा।
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डॉलर की निर्भरता कम होगी: अब दक्षिण एशियाई देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार में भारतीय रुपये का उपयोग बढ़ेगा, जिससे विदेशी मुद्रा पर निर्भरता घटेगी।
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व्यापार में लचीलापन: रुपये में ऋण की सुविधा से दोनों पक्षों को सीमा-पार लेनदेन में अधिक सुविधा मिलेगी।
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पूर्व में लागू रुपये में चालान और निपटान प्रणाली का विस्तार: यह कदम पहले से मौजूद मुद्रा विनिमय और निपटान प्रणाली को और प्रभावी बनाएगा।
इस पहल से भारत अपने पड़ोसी देशों के साथ आर्थिक और वित्तीय सहयोग को मजबूत कर रहा है। इसके माध्यम से क्षेत्रीय व्यापारिक साझेदारी में स्थिरता आएगी और मुद्रा जोखिम कम होगा।
निर्यातक खाता नियमों में बदलाव
RBI ने इस कदम के साथ ही निर्यातकों द्वारा रखे गए विदेशी मुद्रा खातों के नियमों में भी बदलाव किया है।
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जनवरी 2025 से भारतीय निर्यातकों को विदेश में विदेशी मुद्रा खाते खोलने की अनुमति दी गई थी।
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अब भारतीय IFSCs (अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्रों) में रखे गए विदेशी मुद्रा खातों के अव्यवहृत शेष की प्रत्यर्पण अवधि तीन महीने कर दी गई है।
इस बदलाव का उद्देश्य यह है कि भारतीय निर्यातक और उनके विदेशी खरीदार मुद्रा रूपांतरण और लेनदेन में अधिक लचीलापन महसूस करें। इससे सीमा-पार व्यापार और भुगतान प्रक्रियाएं सरल और तेज़ होंगी।
रणनीतिक महत्व
RBI की यह पहल न केवल व्यापार को सुगम बनाने के लिए है, बल्कि इसके पीछे दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति भी छिपी है। दक्षिण एशियाई देशों के साथ रुपये में व्यापार से भारत की वित्तीय साख मजबूत होगी और क्षेत्रीय आर्थिक एकता में वृद्धि होगी।
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भूटान और नेपाल के साथ संबंधों में सुधार: दोनों देशों के साथ ट्रेड को और सुगम और लागत-कुशल बनाना।
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श्रीलंका के लिए राहत: डॉलर संकट से जूझ रहे श्रीलंका को स्थानीय मुद्रा में ऋण उपलब्ध कराकर आर्थिक दबाव कम करना।
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दक्षिण एशियाई व्यापार में स्थिरता: क्षेत्रीय व्यापार के लिए अमेरिकी डॉलर और अन्य विदेशी मुद्राओं पर निर्भरता कम करना।
स्थिर तथ्य
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| घोषक संस्था | भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) |
| घोषणा तिथि | 13 अक्टूबर 2025 |
| मुख्य अपडेट | भारतीय बैंक अब भूटान, नेपाल और श्रीलंका के निवासी और बैंकों को रुपये में ऋण दे सकते हैं |
| कानूनी संशोधन | फेमा (उधार लेना और उधार देना) विनियम, 2018; फेमा (विदेशी मुद्रा खाते) विनियम, 2015 |
| निर्यातक नियम परिवर्तन | भारतीय IFSCs में विदेशी मुद्रा खातों के लिए प्रत्यर्पण अवधि तीन महीने |
| उद्देश्य | सीमा-पार व्यापार और भुगतान को सुगम बनाना |
| क्षेत्रीय फोकस | दक्षिण एशिया (भूटान, नेपाल, श्रीलंका) |

