RBI की बड़ी पहल: दर नियंत्रण को मजबूती देने के लिए तरलता ढांचे में बदलाव
RBI की बड़ी पहल: दर नियंत्रण को मजबूती देने के लिए तरलता ढांचे में बदलाव

RBI की बड़ी पहल: दर नियंत्रण को मजबूती देने के लिए तरलता ढांचे में बदलाव

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने 2025 में अपने तरलता प्रबंधन ढाँचे (Liquidity Management Framework – LMF) की व्यापक समीक्षा की है। इस समीक्षा का नेतृत्व RBI की आंतरिक कार्य समूह (Internal Working Group – IWG) ने किया, जिसने कई महत्वपूर्ण सिफारिशें दी हैं।

इस कदम का मुख्य उद्देश्य है –

  • अल्पकालिक ब्याज दरों पर नियंत्रण मजबूत करना

  • बाज़ार में स्थिरता बनाए रखना

  • मौद्रिक नीति का बेहतर प्रसारण (Transmission) सुनिश्चित करना

आइए विस्तार से समझते हैं कि RBI ने किन बदलावों पर विचार किया है और इनका असर बैंकिंग प्रणाली तथा व्यापक अर्थव्यवस्था पर क्या हो सकता है।


14-दिवसीय वेरिएबल रेट रेपो का अंत

अब तक तरलता प्रबंधन का बड़ा हिस्सा 14-दिवसीय वेरिएबल रेट रेपो/रिवर्स रेपो पर आधारित था। लेकिन IWG ने इसे मुख्य संचालन साधन से हटाने की सिफारिश की है।

क्यों?

  1. बैंक लंबे समय तक अधिशेष धनराशि लॉक करने को तैयार नहीं रहते।

  2. सरकारी नकदी प्रवाह और मुद्रा आपूर्ति की अनिश्चितता से अनुमान लगाना कठिन हो जाता है।

नया विकल्प

  • RBI अब साप्ताहिक संचालन पर अधिक भरोसा करेगा।

  • अल्पकालिक उतार-चढ़ाव को संतुलित करने के लिए फाइन-ट्यूनिंग टूल्स का उपयोग किया जाएगा।

यह बदलाव बैंकों को अधिक लचीलापन देगा और RBI को भी तरलता के उतार-चढ़ाव को तुरंत नियंत्रित करने का मौका मिलेगा।


WACR रहेगा परिचालन लक्ष्य

भारतीय मौद्रिक नीति में Weighted Average Call Rate (WACR), यानी भारित औसत कॉल रेट, को परिचालन लक्ष्य के रूप में जारी रखने की सिफारिश की गई है।

चुनौती

  • हाल के वर्षों में ओवरनाइट कॉल मनी मार्केट की गतिविधि घटी है।

  • संकीर्ण ब्याज दर गलियारे (Corridor) ने अंतर-बैंक लेनदेन को हतोत्साहित किया है।

  • बैंक अब सीधे RBI की तरलता विंडो का उपयोग करना पसंद करते हैं।

समाधान

रिपोर्ट का मानना है कि गलियारे की चौड़ाई में उचित संतुलन बनाना ज़रूरी है। इससे दरों में स्थिरता भी बनी रहेगी और बैंकिंग प्रणाली की बाज़ार-आधारित सक्रियता भी बढ़ेगी।


आरक्षित आवश्यकताएँ और औसत तंत्र

IWG ने न्यूनतम आरक्षित आवश्यकताओं (Reserve Requirements) और रखरखाव अवधि में औसत की सुविधा (Averaging Mechanism) को बनाए रखने पर जोर दिया है।

ये उपकरण वित्तीय प्रणाली में सरकारी नकदी प्रवाह और मुद्रा आपूर्ति के झटकों को अवशोषित करने में मदद करते हैं।

लेकिन समस्या यह है कि:

  • बैंक अक्सर रोज़ाना अतिरिक्त आरक्षित रखते हैं।

  • इससे इस तंत्र का वास्तविक लाभ घट जाता है।

सुझाव:
एक कम दैनिक आरक्षित न्यूनतम स्तर तय करने से बैंकों को आर्बिट्राज का अवसर मिलेगा और कॉल रेट में अनावश्यक उतार-चढ़ाव घटेगा।


स्टैंडअलोन प्राइमरी डीलर्स (SPD) की भूमिका

IWG ने खास तौर पर स्टैंडअलोन प्राइमरी डीलर्स (SPDs) की गतिविधियों पर ध्यान दिया है।

समस्या

  • SPDs कॉल मनी दर की अस्थिरता बढ़ाते हैं।

  • वे भारी उधारी करते हैं लेकिन RBI की मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (MSF) तक पहुँच नहीं रखते।

  • नतीजतन, तरलता की कमी के समय दरें RBI द्वारा तय गलियारे की सीमा से भी ऊपर चली जाती हैं।

सुझाव

  • SPDs को MSF की पहुँच नहीं दी जानी चाहिए।

  • धीरे-धीरे उनकी कॉल मनी मार्केट भागीदारी को कम किया जाए।

  • इसके बदले उन्हें सरकारी प्रतिभूति (G-sec) बाजार में सक्रिय रखने के लिए नए तरलता साधन उपलब्ध कराए जाएँ।


संरचनात्मक अधिशेष तरलता: बड़ी चुनौती

भारत की वित्तीय प्रणाली लंबे समय से अधिशेष तरलता (Surplus Liquidity) की स्थिति में है।

असर

  • WACR अक्सर RBI की नीतिगत रेपो दर से अलग हो जाता है।

  • कई बार यह गलियारे की सीमाओं को भी पार कर जाता है।

  • नतीजतन, नीतिगत दर का प्रसारण कमजोर हो जाता है।

आवश्यकता

  • WACR को नीतिगत दर के करीब बनाए रखना ज़रूरी है।

  • इसके लिए RBI को बेहतर तरलता पूर्वानुमान और अधिक लचीले उपकरण अपनाने होंगे।

  • यह भी सुनिश्चित करना होगा कि परिचालन लक्ष्य मौद्रिक नीति के रुख के अनुरूप बना रहे।


ब्याज दर गलियारे की चौड़ाई पर पुनर्विचार

भारत का वर्तमान गलियारा 50 आधार अंकों (bps) का है। यह कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में संकरा है।

फायदे

  • अस्थिरता को कम करता है।

नुकसान

  • अंतर-बैंक गतिविधि घटती है।

  • बाज़ार-आधारित तरलता प्रसारण कमजोर पड़ता है।

IWG ने सुझाव दिया है कि एक प्रायोगिक अध्ययन (Empirical Study) किया जाए ताकि गलियारे की चौड़ाई में संभावित बदलावों का मूल्यांकन हो सके।


निष्कर्ष

RBI की इस समीक्षा से यह स्पष्ट है कि केंद्रीय बैंक अब दर नियंत्रण, बाजार स्थिरता और मौद्रिक प्रसारण पर समान रूप से ध्यान देना चाहता है।

मुख्य संदेश यह है कि –

  • RBI धीरे-धीरे 14-दिवसीय रेपो पर निर्भरता घटा रहा है।

  • WACR को परिचालन लक्ष्य बनाए रखेगा।

  • SPDs की भूमिका सीमित होगी, ताकि अस्थिरता कम की जा सके।

  • गलियारे की चौड़ाई और रिज़र्व तंत्र पर नए सिरे से विचार होगा।

इन कदमों से RBI को तरलता और ब्याज दरों पर अधिक नियंत्रण मिलेगा, जो अंततः आर्थिक स्थिरता और मुद्रास्फीति प्रबंधन के लिए सकारात्मक साबित हो सकता है।

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