तमिलनाडु में दिखी दुर्लभ लाल गर्दन वाली फैलेरोप पक्षी प्रजाति
तमिलनाडु में दिखी दुर्लभ लाल गर्दन वाली फैलेरोप पक्षी प्रजाति

तमिलनाडु में दिखी दुर्लभ लाल गर्दन वाली फैलेरोप पक्षी प्रजाति

तमिलनाडु के तिरुप्पूर ज़िले स्थित नांजारायण पक्षी अभयारण्य में हाल ही में एक दुर्लभ प्रवासी पक्षी रेड-नेक्ड फैलेरोप (Phalaropus lobatus) को देखा गया। यह घटना पक्षी वैज्ञानिकों, प्रकृति प्रेमियों और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों के लिए बड़ी उत्सुकता का विषय बनी हुई है। आर्कटिक क्षेत्र में प्रजनन करने वाला यह छोटा तटीय पक्षी अपनी विशिष्ट तैराकी शैली और प्रजनन कालीन लाल-भूरे गले के कारण पहचान में आता है। भारत में इसकी उपस्थिति बेहद कम दर्ज की गई है, जिससे यह अवलोकन पारिस्थितिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


रेड-नेक्ड फैलेरोप: परिचय

रेड-नेक्ड फैलेरोप तटीय और समुद्री पक्षियों की श्रेणी में आने वाली एक प्रवासी प्रजाति है। यह स्कोलोपासिडाए परिवार (सैंडपाइपर परिवार) से संबंधित है। इस प्रजाति की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह सामान्य तटीय पक्षियों की तरह भूमि पर नहीं बल्कि जल में घूमते हुए भोजन करती है।

  • वैज्ञानिक नाम: Phalaropus lobatus

  • परिवार: स्कोलोपासिडाए (सैंडपाइपर)

  • आकार: छोटा तटीय पक्षी, पतली और सीधी काली चोंच के साथ

  • प्रजनन कालीन रूप: गले और किनारों पर गहरा लाल-भूरा रंग, सफेद चेहरा और अधोभाग

इसका भोजन मुख्यतः छोटे जलजीवों और प्लवक (प्लैंकटन) पर आधारित होता है। भोजन पाने के लिए यह पानी में गोलाई बनाकर तेज़ी से तैरती है और सतह के नीचे से जीवों को ऊपर खींच लाती है।


वितरण क्षेत्र

रेड-नेक्ड फैलेरोप की जीवन यात्रा हजारों किलोमीटर तक फैली हुई है।

  • प्रजनन स्थल: आर्कटिक और उप-आर्कटिक टुंड्रा (लगभग 60°–70° अक्षांश)

  • शीतकालीन प्रवास स्थल: खुले महासागर, जिनमें अरब सागर, दक्षिण अमेरिका के तटीय भाग, इंडोनेशिया और पश्चिमी मेलानेशिया शामिल हैं।

भारत में इनका अवलोकन बेहद दुर्लभ है। यही कारण है कि नांजारायण अभयारण्य में इसकी मौजूदगी को असाधारण माना जा रहा है।


व्यवहार और प्रजनन की विशेषताएँ

रेड-नेक्ड फैलेरोप न केवल अपनी प्रवासी प्रकृति बल्कि अपने प्रजनन व्यवहार के कारण भी अनोखा पक्षी है।

  • पॉलीएंड्रस प्रजाति: इस प्रजाति में मादा कई नर से संभोग करती है।

  • नर की भूमिका: अंडे सेने और बच्चों की परवरिश की ज़िम्मेदारी नर की होती है। यह पक्षियों की दुनिया में एक बेहद दुर्लभ परंपरा है।

  • विशिष्ट भोजन तकनीक: यह पक्षी पानी में घूमते हुए भंवर पैदा करता है, जिससे सतह के नीचे का भोजन ऊपर आ जाता है।


नांजारायण पक्षी अभयारण्य का महत्व

तिरुप्पूर का नांजारायण टैंक हाल के वर्षों में प्रवासी पक्षियों का एक उभरता हुआ हॉटस्पॉट बनकर सामने आया है। यहाँ बड़ी संख्या में बार-हेडेड गीज़, पेलिकन, पेंटेड स्टॉर्क, टील और शॉवेलर जैसे पक्षी पहले भी देखे गए हैं। रेड-नेक्ड फैलेरोप का दर्ज होना इस क्षेत्र की जैव विविधता को और समृद्ध बनाता है।

इस अवलोकन से यह संकेत मिलता है कि भारतीय आर्द्रभूमियाँ वैश्विक प्रवासी पक्षियों के लिए लगातार अधिक अनुकूल हो रही हैं। यह न केवल प्रवास मार्ग के विस्तार को दर्शाता है बल्कि इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि दक्षिण भारत की आर्द्रभूमियाँ जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिक संतुलन की दृष्टि से कितनी अहम हैं।


क्यों महत्वपूर्ण है यह अवलोकन?

  1. पहली बार दर्ज उपस्थिति: तमिलनाडु के इस अभयारण्य में रेड-नेक्ड फैलेरोप की मौजूदगी पहली बार दर्ज की गई है।

  2. वैश्विक प्रवासी जैव विविधता का संकेत: यह दर्शाता है कि भारत अंतरराष्ट्रीय प्रवासी मार्गों पर एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव बनता जा रहा है।

  3. संरक्षण की आवश्यकता पर बल: आर्द्रभूमियाँ नष्ट होने और जलवायु परिवर्तन के कारण कई प्रवासी प्रजातियाँ संकट में हैं। यह घटना बताती है कि इन पारिस्थितिक तंत्रों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।


संरक्षण स्थिति

रेड-नेक्ड फैलेरोप को आईयूसीएन रेड लिस्ट में “Least Concern” (न्यूनतम चिंता) की श्रेणी में रखा गया है। वैश्विक स्तर पर इसकी आबादी स्थिर मानी जाती है। लेकिन फिर भी लंबे प्रवास, जलवायु परिवर्तन और आवास ह्रास जैसी चुनौतियाँ इसके अस्तित्व को प्रभावित कर सकती हैं।


मुख्य तथ्य एक नज़र में

  • नांजारायण अभयारण्य (तमिलनाडु) में पहली बार रेड-नेक्ड फैलेरोप दर्ज किया गया।

  • भोजन पाने के लिए पानी में घूम-घूमकर भंवर बनाने की अनोखी तकनीक अपनाता है।

  • मादा पॉलीएंड्रस होती है, जबकि नर अंडे सेता और बच्चों की परवरिश करता है।

  • तटों पर शीतकाल बिताने की बजाय यह पक्षी समुद्र में समय गुज़ारता है।

  • भारतीय आर्द्रभूमियों के महत्व और संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

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