भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा हाल ही में जारी उपभोक्ता विश्वास सर्वेक्षण के जुलाई संस्करण में एक सकारात्मक संकेत मिला है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में उपभोक्ताओं की आर्थिक धारणा में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है। यह परिदृश्य भारत की अर्थव्यवस्था में स्थिरता और संभावित पुनरुत्थान की ओर इशारा करता है।
CSI और FEI दोनों में सुधार
आरबीआई द्वारा प्रकाशित उपभोक्ता विश्वास सर्वेक्षण दो प्रमुख सूचकांकों पर आधारित होता है — करेंट सिचुएशन इंडेक्स (CSI) और फ्यूचर एक्सपेक्टेशन इंडेक्स (FEI)। CSI वर्तमान आर्थिक स्थिति, रोजगार, आय और मूल्य स्तरों के बारे में उपभोक्ताओं की धारणा को मापता है, जबकि FEI आगामी एक वर्ष में उपभोक्ताओं की आर्थिक अपेक्षाओं को दर्शाता है।
जुलाई 2025 के आंकड़े बताते हैं कि CSI में मामूली लेकिन निरंतर सुधार हुआ है, जो इस बात का संकेत है कि उपभोक्ता मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों को पहले से बेहतर मान रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष रूप से CSI में सुधार दर्ज किया गया, जहां उपभोक्ताओं ने रोजगार, आय और जीवन यापन की लागत में थोड़ा सकारात्मक बदलाव महसूस किया।
FEI में लगातार छठी बार वृद्धि दर्ज की गई है। इसका मतलब है कि लोग भविष्य की आर्थिक संभावनाओं को लेकर अधिक आशान्वित हो रहे हैं, भले ही कुछ क्षेत्रों में अभी भी चुनौतियाँ बनी हुई हैं।
शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में समान रूप से आशावाद
शहरी उपभोक्ताओं के बीच भी यह विश्वास बढ़ता दिख रहा है। मौजूदा और आगामी आर्थिक स्थितियों को लेकर उनकी धारणा में भी सुधार हुआ है। खास बात यह है कि वर्तमान आय को लेकर लोगों का विश्वास पहले से मजबूत हुआ है, हालांकि भविष्य की आय को लेकर कुछ हद तक सतर्कता भी बनी हुई है। यह यथार्थवादी आशावाद को दर्शाता है — यानी उपभोक्ता अब भी आर्थिक अनिश्चितताओं को लेकर सजग हैं, लेकिन व्यापक रूप से उनमें आशा का भाव मौजूद है।
महंगाई पर धारणा में बड़ा बदलाव
इस विश्वास में सुधार का एक बड़ा कारण खुदरा महंगाई दर में गिरावट रही है। उपभोक्ताओं को अब यह लगने लगा है कि मूल्य स्थिरता आ रही है और आगामी महीनों में कीमतों में और गिरावट हो सकती है। ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष रूप से यह धारणा मजबूत हुई है। यह बदलाव केवल मौजूदा अनुभवों पर आधारित नहीं है, बल्कि भविष्य की अपेक्षाओं को भी दर्शाता है।
खपत पर इस धारणा का सीधा प्रभाव पड़ता है। जब उपभोक्ताओं को लगता है कि महंगाई नियंत्रण में है, तो वे खर्च करने और निवेश करने में अधिक आत्मविश्वास महसूस करते हैं, जिससे आर्थिक गतिविधियों में गति आती है।
ऋण मांग और क्रेडिट आउटलुक
आरबीआई सर्वेक्षण में एक अन्य महत्वपूर्ण संकेत यह मिला कि बैंकिंग प्रणाली में ऋण की मांग स्थिर बनी हुई है। कृषि, खनन, विनिर्माण और व्यक्तिगत ऋण जैसे क्षेत्रों में क्रेडिट डिमांड में निरंतरता बनी हुई है। विशेष रूप से त्योहारों के मौसम के नजदीक आने के कारण उधारी में संभावित तेजी देखी जा सकती है।
वित्त वर्ष 2025–26 की पहली तिमाही में मौसमी कारणों से कुछ गिरावट देखने को मिली थी, लेकिन अब दूसरी और चौथी तिमाही में क्रेडिट ग्रोथ की वापसी की उम्मीद जताई जा रही है। इससे विनिर्माण और सेवा क्षेत्र की गतिविधियों को मजबूती मिलेगी।
लेकिन FY27 में महंगाई के प्रति चिंता बरकरार
जहां एक ओर वर्तमान महंगाई दर नियंत्रित है, वहीं अगले वित्त वर्ष (2026–27) के लिए इसमें संभावित वृद्धि की आशंका जताई गई है। आरबीआई के सर्वेक्षण के अनुसार, FY 2025–26 के अनुमानित 3.1% की तुलना में FY 2026–27 में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.4% तक जा सकती है।
यह अनुमान घरेलू मांग में संभावित तेजी, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान, और जलवायु से जुड़ी चुनौतियों जैसे कारकों पर आधारित है। कोर महंगाई – जिसमें खाद्य और ईंधन जैसे अस्थिर तत्व शामिल नहीं होते – भी ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती है।
नीति-निर्माताओं के लिए मिश्रित संकेत
उपभोक्ता विश्वास में वृद्धि और संभावित महंगाई वृद्धि की यह दोहरी स्थिति नीति-निर्माताओं के लिए एक जटिल परिदृश्य प्रस्तुत करती है। एक ओर, उपभोक्ताओं का आशावाद खपत-आधारित विकास को गति देने में सहायक हो सकता है। दूसरी ओर, संभावित मूल्य वृद्धि दरों में कटौती की संभावनाओं को सीमित कर सकती है।
मौद्रिक नीति समिति (MPC) को भविष्य में ब्याज दरों में किसी भी तरह के बदलाव से पहले उपभोक्ता विश्वास, ऋण प्रवाह, और महंगाई के इन संकेतकों पर सतर्क निगरानी रखनी होगी।
निष्कर्ष
आरबीआई के उपभोक्ता विश्वास सर्वेक्षण के जुलाई 2025 के परिणाम स्पष्ट रूप से इस बात की ओर संकेत करते हैं कि भारत में आर्थिक विश्वास धीरे-धीरे लौट रहा है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में सकारात्मक भावना, महंगाई में गिरावट की उम्मीद, और क्रेडिट आउटलुक में मजबूती – ये सब संकेत देते हैं कि उपभोक्ता अब अर्थव्यवस्था में अधिक भागीदारी को तैयार हैं।
हालांकि, भविष्य की महंगाई की चिंताएं अभी भी बनी हुई हैं, जिन्हें ध्यान में रखते हुए संतुलित और समयबद्ध नीतिगत हस्तक्षेप आवश्यक होंगे। यदि यह संतुलन बनाए रखा गया, तो भारत की अर्थव्यवस्था आने वाले वर्षों में मजबूती से आगे बढ़ सकती है।

