भारत आज स्वामी दयानंद सरस्वती की 202वीं जयंती श्रद्धा और सम्मान के साथ मना रहा है। वे महान समाज सुधारक, वैदिक विद्वान और आधुनिक भारत के वैचारिक पुनर्जागरण के प्रमुख स्तंभों में से एक थे। 19वीं सदी में जब समाज रूढ़ियों और अंधविश्वासों से जकड़ा हुआ था, तब उन्होंने तर्क, शिक्षा और सुधार की मशाल जलाकर नई दिशा दिखाई।
1824 में जन्मे स्वामी दयानंद ने अपना संपूर्ण जीवन वैदिक ज्ञान के प्रचार, सामाजिक बुराइयों के विरोध और राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में समर्पित कर दिया।
सामाजिक और सांस्कृतिक सुधार के अग्रदूत
स्वामी दयानंद सरस्वती ने समाज को अज्ञान और अंधविश्वास से मुक्त करने का संकल्प लिया।
उन्होंने मूर्ति पूजा, जातिगत भेदभाव और कुरीतियों का खुलकर विरोध किया।
उनका प्रसिद्ध संदेश —
👉 “वेदों की ओर लौटो”
लोगों को तर्कसंगत सोच और नैतिक जीवन अपनाने की प्रेरणा देता था। वे मानते थे कि वेद मानवता के कल्याण का मूल स्रोत हैं।
स्वराज की ऐतिहासिक मांग: आज़ादी की वैचारिक नींव
1876 में स्वामी दयानंद सरस्वती ने पहली बार खुलकर “स्वराज” यानी आत्मशासन की मांग की।
उन्होंने “इंडिया फॉर इंडियंस” के विचार को आगे बढ़ाया, जो उस दौर में बेहद क्रांतिकारी था।
उनकी सोच से प्रेरित होकर आगे चलकर बाल गंगाधर तिलक ने ऐतिहासिक नारा दिया —
“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।”
इस तरह स्वामी दयानंद स्वतंत्रता आंदोलन के वैचारिक मार्गदर्शक बन गए।
आर्य समाज: सामाजिक क्रांति का संगठित मंच
1875 में उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की, जिसका उद्देश्य समाज को सुधार की दिशा में संगठित करना था।
आर्य समाज के प्रमुख लक्ष्य:
✔ वैदिक मूल्यों की ओर वापसी
✔ महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा
✔ जातिवाद और बाल विवाह का विरोध
✔ संस्कृत और नैतिक शिक्षा का प्रचार
✔ सामाजिक समानता की स्थापना
आर्य समाज ने देशभर में गुरुकुलों और स्कूलों की स्थापना कर शिक्षा क्रांति में ऐतिहासिक योगदान दिया।
स्मारक सिक्कों से मिला राष्ट्रीय सम्मान
स्वामी दयानंद सरस्वती के योगदान को सम्मान देने के लिए नरेंद्र मोदी ने विशेष स्मारक सिक्के जारी किए:
उनकी 200वीं जयंती पर
आर्य समाज की 150वीं स्थापना वर्षगांठ पर
यह उनके सामाजिक सुधार और राष्ट्र निर्माण में योगदान की आधिकारिक मान्यता थी।
स्वामी दयानंद सरस्वती के प्रमुख योगदान
🔹 वैदिक दर्शन और संस्कृत शिक्षा को पुनर्जीवित किया
🔹 सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जागरूकता फैलाई
🔹 स्वराज की अवधारणा को सबसे पहले सामने रखा
🔹 आर्य समाज की स्थापना की
🔹 महिलाओं के अधिकार और शिक्षा का समर्थन किया
🔹 राष्ट्रवादी चेतना को मजबूत किया
वे सुधार, साहस और आत्मसम्मान के प्रतीक बन गए।
आज के भारत में उनकी सोच क्यों ज़रूरी है?
आज भी उनके विचार हमें सिखाते हैं कि:
शिक्षा ही असली ताकत है
अंधविश्वास समाज को पीछे ले जाता है
समानता के बिना विकास अधूरा है
आत्मसम्मान से राष्ट्र मजबूत बनता है
उनका जीवन आज के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
निष्कर्ष: एक विचार जिसने राष्ट्र की दिशा बदली
स्वामी दयानंद सरस्वती की 202वीं जयंती हमें याद दिलाती है कि सच्चा बदलाव साहस और विचारों से आता है।
उन्होंने समाज को अंधकार से निकालकर ज्ञान और आत्मसम्मान की राह दिखाई।
आज भी उनका संदेश उतना ही प्रासंगिक है जितना 150 साल पहले था।
एग्ज़ाम-ओरिएंटेड MCQs
Q1. स्वामी दयानंद सरस्वती ने किस आंदोलन की स्थापना की?
✔ (b) आर्य समाज
Q2. उन्होंने स्वराज की मांग किस वर्ष की?
✔ (c) 1876
Q3. “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है” किसने कहा?
✔ (c) बाल गंगाधर तिलक
Q4. वे किस विषय के विद्वान थे?
✔ (c) वैदिक विद्या और संस्कृत
Q5. स्मारक सिक्के किन अवसरों पर जारी हुए?
✔ आर्य समाज की 150वीं वर्षगांठ और 200वीं जयंती

