भारतीय अर्थव्यवस्था का परिदृश्य

चर्चा में क्यों?

भारतीय रिज़र्व बैंक के हालिया “स्टेट ऑफ द इकॉनॉमी” शीर्षक वाले विश्लेषण में वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर एक सावधानीपूर्ण आशावाद दर्शाया गया है। यह दृष्टिकोण न केवल वर्तमान आर्थिक संकेतकों पर आधारित है, बल्कि आने वाले महीनों में संभावित नीतिगत सुधारों और संरचनात्मक परिवर्तनों को भी इंगित करता है।


भारत की वर्तमान आर्थिक स्थिति

1. मुद्रास्फीति पर नियंत्रण

2023–24 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित खुदरा मुद्रास्फीति 5.4% थी, जो जून 2025 में घटकर 2.1% रह गई — यह जनवरी 2019 के बाद का सबसे निम्न स्तर है। हालाँकि कोर मुद्रास्फीति (जो खाद्य और ईंधन को छोड़कर मापी जाती है) 4.4% तक बढ़ी, जिसके पीछे सेवाओं जैसे कि शिक्षा, व्यक्तिगत देखभाल और मनोरंजन की लागत में वृद्धि प्रमुख कारण रही।

ग्रामीण क्षेत्रों में मुद्रास्फीति में 1.7% की गिरावट आई, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 2.6% रही — जिससे यह संकेत मिलता है कि कीमतों पर नियंत्रण मुख्यतः ग्रामीण भारत में प्रभावी रहा।


2. भुगतान संतुलन और चालू खाता स्थिति

वित्त वर्ष 2024–25 की चौथी तिमाही में भारत ने GDP का 1.3% चालू खाता अधिशेष दर्ज किया। यह पिछले वर्षों की तुलना में एक सकारात्मक संकेत है। वहीं, 2023–24 में चालू खाता घाटा घटकर GDP का 0.7% रह गया।

इसमें सेवाओं के निर्यात का विशेष योगदान रहा है, जो कि भारत की विदेशी मुद्रा स्थिरता और निवेशकों के विश्वास के लिए एक सकारात्मक संकेतक है।


3. राजकोषीय अनुशासन और बजट प्रबंधन

2025-26 में भारत का सकल राजकोषीय घाटा (GFD) बजट अनुमान का केवल 0.8% रहा, जो 2024-25 के 3.1% से एक उल्लेखनीय सुधार है। मई 2025 तक केंद्र सरकार को कुल बजटीय प्राप्तियों का 21% प्राप्त हो चुका था, जबकि कुल व्यय 14.7% रहा, जिसमें पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) पर विशेष जोर दिया गया।

इसका स्पष्ट उद्देश्य है – दीर्घकालिक बुनियादी ढाँचे में निवेश के माध्यम से सतत विकास को सुनिश्चित करना।


4. व्यापार प्रदर्शन में सुधार

मई 2025 में भारत का कुल व्यापार घाटा 30% तक घट गया, जो मुख्यतः तेल की कीमतों में गिरावट और सेवाओं के निर्यात में मजबूती के कारण हुआ। कुल निर्यात में 2.8% की वृद्धि, विशेष रूप से सेवाओं के निर्यात में 9.4% वृद्धि दर्ज की गई, जबकि आयात में 1% की गिरावट आई।

उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले निर्यात क्षेत्र:

  • कॉफी, तंबाकू

  • इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएँ

  • चावल

  • औषधियाँ एवं फार्मास्यूटिकल्स

  • रेडीमेड गारमेंट्स (RMG)

  • इंजीनियरिंग वस्तुएँ और फल-सब्ज़ियाँ

भारत के शीर्ष निर्यात गंतव्य अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, यूएई और फ्राँस रहे, जबकि प्रमुख आयात स्रोत यूएई, चीन, थाईलैंड, अमेरिका और रूस थे।


5. विदेशी निवेश की स्थिति

FDI (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश):

2024–25 में FDI में 14% की वृद्धि हुई, जो 2013–14 की तुलना में 125% अधिक है।

  • सेवा क्षेत्र (19%)

  • सॉफ्टवेयर/हार्डवेयर (16%)

  • व्यापार (8%)

  • निर्माण क्षेत्र में 18% की सालाना वृद्धि

राज्यवार: महाराष्ट्र ने 39% FDI आकर्षित किया।
देशवार: सिंगापुर शीर्ष निवेशक (30%) रहा, इसके बाद मॉरीशस और अमेरिका का स्थान रहा।

FPI (विदेशी पोर्टफोलियो निवेश):

FY24 में भारत को 44.1 अरब डॉलर का सकारात्मक FPI प्रवाह मिला, जो वैश्विक निवेशकों के भारत में विश्वास को दर्शाता है।


6. विदेशी ऋण और मुद्रा भंडार

भारत का बाह्य ऋण 2025 में 10% बढ़ा और Debt-to-GDP अनुपात 18.5% से बढ़कर 19.1% हो गया। हालाँकि, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार जुलाई 2025 तक 696 अरब डॉलर रहा, जो 11 महीनों से अधिक के आयात और 95% बाह्य ऋण को कवर करता है — यह आर्थिक स्थिरता का एक मजबूत संकेत है।


भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक

1. वैश्विक प्रतिकूलताएँ (Global Headwinds)

भूराजनीतिक तनाव:

ईरान-इज़राइल संघर्ष और अमेरिका की टैरिफ नीति में अनिश्चितता के चलते वैश्विक व्यापार अस्थिर हो गया है। यदि टैरिफ दरें 1930 के दशक के स्तर तक जाती हैं, तो इससे भारत के आयात लागत और मुद्रास्फीति पर दबाव बढ़ सकता है।

कमज़ोर वैश्विक मांग:

विश्व स्तर पर उपभोक्ताओं और कंपनियों का विश्वास कमजोर बना हुआ है, जिससे भारत के निर्यात, खासकर IT और विनिर्माण क्षेत्र पर असर पड़ सकता है।

वैश्विक मुद्रास्फीति:

अमेरिका और यूरोप में बढ़ती मुद्रास्फीति से वैश्विक ब्याज दरें बढ़ सकती हैं, जिससे भारत में विदेशी पूंजी प्रवाह प्रभावित होगा और कर्ज़ लेना महँगा हो सकता है।


2. घरेलू कारक

औद्योगिक मंदी:

मई 2025 में औद्योगिक उत्पादन वृद्धि दर घटकर 1.2% रह गई — यह अगस्त 2024 के बाद सबसे कम है। यह उत्पादन, निवेश और रोज़गार पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

ऋण वृद्धि में गिरावट:

NBFC और उद्योगों को दिए गए ऋण में गिरावट आई।

  • NBFC द्वारा ऋण वितरण में 13% की गिरावट

  • शहरी ऋण स्वीकृति में 23% की गिरावट

  • शिक्षा और प्रतिभूति आधारित ऋणों में भी भारी गिरावट

धीमा GST संग्रह:

जून 2025 में GST संग्रह में सिर्फ 6% की वृद्धि हुई — यह पिछले चार वर्षों की सबसे धीमी वृद्धि थी। यह मांग में गिरावट और व्यवसायों की सतर्कता को दर्शाता है।

श्रम बाज़ार दबाव में:

जून 2025 में बेरोज़गारी दर 5.6% रही, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में हीटवेव और कृषि के अवकर्ष मौसम के कारण श्रम भागीदारी घटी। इससे ग्रामीण खपत और कुल मांग पर असर पड़ सकता है।

राज्य सरकारों की वित्तीय स्थिति:

ऋण माफी और मुफ्त सेवाओं के कारण राज्यों पर सब्सिडी का भारी बोझ है, जिससे बुनियादी ढाँचे में निवेश बाधित हो रहा है।


आगे की राह

1. व्यापार समझौतों को गति देना

  • अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख साझेदारों के साथ FTA पर तेजी से निर्णय लेना

  • निर्यात अवसंरचना, गुणवत्ता प्रमाणीकरण और लॉजिस्टिक्स पर निवेश

2. ग्रामीण मांग को प्रोत्साहन देना

  • मनरेगा जैसे कार्यक्रमों का विस्तार

  • कौशल विकास, स्वरोजगार और गैर-कृषि गतिविधियों में निवेश

  • कोल्ड स्टोरेज, सिंचाई और डिजिटल मंडियों को बढ़ावा देना

3. निवेश को आकर्षित करना और स्थिरता बनाए रखना

  • नीति स्थिरता और पारदर्शिता

  • FDI और FPI को आकर्षित करने के लिए नियमों का सरलीकरण

  • विदेशी मुद्रा भंडार का रणनीतिक उपयोग


निष्कर्ष

भारतीय अर्थव्यवस्था वर्तमान में एक ऐसे दौर से गुज़र रही है जहाँ उसे वैश्विक अनिश्चितताओं और घरेलू चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन साथ ही साथ अवसरों की एक नई श्रृंखला भी सामने है।

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