भारत सरकार ने कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने और किसानों की आय को मज़बूत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 1 अक्टूबर 2025 को “मिशन आत्मनिर्भरता इन पल्सेस” (Mission Aatmanirbharta in Pulses) नामक एक छह वर्षीय महत्वाकांक्षी कार्यक्रम को मंजूरी दी। यह कार्यक्रम 2025-26 से 2030-31 तक लागू किया जाएगा और इसके लिए कुल ₹11,440 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
इस मिशन का उद्देश्य भारत को दालों के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना है। सरकार का लक्ष्य है कि वर्ष 2030-31 तक घरेलू दाल उत्पादन 350 लाख टन तक पहुँचे, आयात पर निर्भरता घटे और लगभग 2 करोड़ किसानों की आय स्थिर और सुरक्षित हो सके।
दालों में आत्मनिर्भरता क्यों ज़रूरी?
भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा दाल उत्पादक और उपभोक्ता दोनों है। इसके बावजूद अपनी कुल मांग का लगभग 15–20% हिस्सा आयात पर निर्भर करता है।
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कारण: जनसंख्या वृद्धि, शहरीकरण और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के चलते दालों की खपत लगातार बढ़ रही है।
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समस्या: दालों के आयात से न केवल विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ता है, बल्कि वैश्विक बाजार के उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारतीय उपभोक्ताओं की थाली पर पड़ता है।
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समाधान: घरेलू उत्पादन बढ़ाकर और किसानों को प्रोत्साहित करके आत्मनिर्भरता हासिल करना ही इस मिशन का प्रमुख लक्ष्य है।
मिशन के उद्देश्य और लक्ष्य
“मिशन आत्मनिर्भरता इन पल्सेस” के तहत सरकार ने 2030-31 तक निम्नलिखित लक्ष्य निर्धारित किए हैं:
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कुल क्षेत्रफल: दाल उत्पादन के लिए भूमि को बढ़ाकर 310 लाख हेक्टेयर करना।
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पैदावार: प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादकता को बढ़ाकर 1,130 किग्रा/हेक्टेयर करना।
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कुल उत्पादन: देश का दाल उत्पादन बढ़ाकर 350 लाख टन तक पहुँचना।
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लाभार्थी किसान: लगभग 2 करोड़ किसानों तक मिशन की पहुँच सुनिश्चित करना।
प्रमुख विशेषताएँ और रणनीतिक घटक
1. उच्च गुणवत्ता वाले बीज और अनुसंधान
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किसानों को 88 लाख मुफ्त बीज किट उपलब्ध कराई जाएंगी।
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बीज उच्च उत्पादकता वाले, कीट-प्रतिरोधी और जलवायु-सहिष्णु होंगे।
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राज्यों को पाँच-वर्षीय रॉलिंग बीज उत्पादन योजनाएँ तैयार करनी होंगी।
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126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज 370 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में वितरित किए जाएंगे।
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बीज की गुणवत्ता और वितरण सुनिश्चित करने के लिए SATHI पोर्टल विकसित किया जाएगा।
2. क्षेत्र विस्तार और फसल विविधीकरण
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35 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र को चावल के परती क्षेत्रों और अल्प-उपयोग भूमि में लाया जाएगा।
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दालों को मुख्य फसलों के साथ इंटरक्रॉपिंग और फसल विविधीकरण के रूप में बढ़ावा दिया जाएगा।
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यह प्रयास अन्य योजनाओं जैसे Soil Health Programme और Sub-Mission on Agricultural Mechanization के साथ समन्वयित होंगे।
3. अवसंरचना और पोस्ट-हार्वेस्ट प्रबंधन
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फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को रोकने और मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देने के लिए 1,000 दाल प्रसंस्करण और पैकेजिंग यूनिट्स स्थापित की जाएंगी।
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प्रत्येक इकाई को ₹25 लाख तक की सब्सिडी मिलेगी।
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इससे भंडारण में सुधार होगा, बर्बादी घटेगी और किसानों की आय बढ़ेगी।
4. क्लस्टर-आधारित कार्यान्वयन
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मिशन क्लस्टर-आधारित दृष्टिकोण अपनाएगा।
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इससे स्थान-विशिष्ट किस्मों का चयन होगा, संसाधनों का कुशल उपयोग होगा और स्थानीय बाजार संबंधों को मज़बूती मिलेगी।
5. खरीद और बाजार स्थिरता
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अगले चार वर्षों तक Price Support Scheme (PSS) के अंतर्गत 100% आश्वस्त खरीद की गारंटी दी जाएगी।
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Tur, Urad और Masoor जैसी प्रमुख दालें इसका हिस्सा होंगी।
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खरीद का क्रियान्वयन NAFED और NCCF के माध्यम से होगा।
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दूरदराज़ के किसानों तक पहुँचने के लिए मूल्य निगरानी तंत्र लागू होगा।
मिशन का महत्व
1. आयात घटाना और विदेशी मुद्रा बचाना
इस मिशन से दालों का आयात घटेगा और हर साल अरबों रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत होगी। साथ ही वैश्विक बाजार की अनिश्चितताओं से भारत को सुरक्षा मिलेगी।
2. किसानों की आय बढ़ाना
बेहतर बीज, अवसंरचना, MSP सुरक्षा और पोस्ट-हार्वेस्ट नुकसान में कमी से छोटे और सीमांत किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
3. पोषण और खाद्य सुरक्षा
दालें प्रोटीन और सूक्ष्म पोषक तत्वों का मुख्य स्रोत हैं। उत्पादन बढ़ने से देश में सस्ती और सुलभ पोषण सुरक्षा सुनिश्चित होगी।
4. पर्यावरण और जलवायु लाभ
दलहन फसलें मृदा उर्वरता बढ़ाती हैं, पानी की कम खपत करती हैं और जलवायु-सहिष्णु होती हैं। इनसे टिकाऊ कृषि को बढ़ावा मिलेगा।
चुनौतियाँ
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किसानों द्वारा नई किस्मों को अपनाने की धीमी रफ्तार।
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ग्रामीण इलाकों में प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना और बीज वितरण की लॉजिस्टिक चुनौतियाँ।
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चार साल बाद खरीद गारंटी को बनाए रखने का दबाव।
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लक्षित किसानों तक निधि और संसाधनों की पारदर्शी पहुँच सुनिश्चित करना।
सांख्यिक तथ्य
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भारत दुनिया का सबसे बड़ा दाल उत्पादक, उपभोक्ता और आयातक है।
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प्रमुख दालें: तूर (अरहर), उड़द, मसूर, मूंग और चना।
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ICAR (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) की स्थापना 1929 में हुई, मुख्यालय नई दिल्ली।
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NAFED की स्थापना 1958 में हुई, जो किसानों की उपज खरीदने और विपणन करने वाली प्रमुख संस्था है।
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CACP (कृषि लागत एवं मूल्य आयोग) 22 फसलों के लिए MSP की सिफारिश करता है।

